गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

कविता / संवाद संग्रह // रवि भुजंग

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1) कुछ न कहो,
बस यूं ही कहते रहो
होठों को देखने दो
आँखों को कहने दो

तुम्हारे मन का इक
कोना होना चाहता हूँ
रानो, तुम कहां ठहरती
हो कहो....,

मेरे ह्रदय की नसों पर 
या मेरी आँखों के
रोम-रोम में....फिर
सभी को तुम दिख भी
तो जाती हो.....
मुझमें
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2) तुम हवा बनकर
गुज़रने वाले थे न,
मैं यहां नीम के नीचे
कब तक खेलूं तिनकों से,

उस कपोत से नज़रें मिलीं
तो तिनका उसे दे दिया
बेचारा कबूतर, अब उसके
घर पर मेरा भी योगदान है,

तुम हवा के बहाने भी
नहीं आए..देखो न
कितना सन्नाटा पसरा है,

उस कबूतर के पंख से
निकली हवा तुम तक
कहां पहुंची होगी
ये वही हवा है...हां...वही
प्रेम पत्र पहुंचाने वाले की..,
-----


3) एक अदना सा नाटक मेरे
ह्रदय की नसों पर
मंचन होने को तत्पर रहता है ।

अभिनय की सीमाएं तोड़ते हुए
कोई आँखों से मिलता है,
ठीक दर्शकों की कतार में
एक असामान्य अभिनेता की तरह।

मेरे बदन को छू जाता है
एक-एक संवाद., जैसे कोई
किसी फूल को मेरे पूरे बदन पर
फेर रहा हो, मैं उस एहसास को
वहीं रोक देना चाहती हूँ।

वहीं...जहां उस नाटक का
कोई अभिनेता मंच पर
प्रवेश करता है, बस......वहीं...,
और मैं केवल एक अदना सा
दर्शक।
-----
4) उस मन मोह लेने वाले

खेल की बांसुरी के स्वर
इन कानों को फुसलाते,

उस डमरु से कहो न
इतने डुब-पन से न बजे
मेरे अंग का हर रस
बिखरने को बेताब होता है।

इतवार की हर धूप में
तुम आओगे न किशन
कहो न.....,

क्या आँखों का मिलना ही
तुम्हारी आमदनी है
कहो न......
डमरु और बांसुरी को
रख दो न उस झोले पर।
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5) कुछ कहती नहीं
तुम इन्हें, दिन-बा-दिन
सिर पर बैठ रही है।

मनमानी करती है
बार-बार डांटने पर,
फिर आ जाती है।

थोड़ा ग़ुस्सा दिखाया
करो इन्हें, झूठा सही,
हवा में तो ये बेकाबू
हो जाती है कितनी,

तुमने ही सिर पर
बैठा रखा है अपनी
इन ज़ुल्फों को.....,
------
6) इस कमरे में
कोई जानता है मुझे,
हां इस बंद, वीरान, सुनसान
कमरे में..,

कोई है मुझ-सा या
लगभग मुझ-सा, थोड़ा,
नहीं पूरा, कभी मुझ-सा
कभी हर एक उसके
जैसा जो उसके सामने हो।

मैं श्रृंगार करती हूँ तो
वो भी करता है,
मैं वहां रहती हूं तभी
वो वहां आता है।

मैं उसे देखती रहती हूँ
और वो मुझे देखता
रहता है..।
-----


7) इक तिनका याद का
और में समन्दर
सा हुआ।

तुम मुझमें करवट
लेती हो रानो।

तुम गर मुझमें ना होती
तो याद की मौज़ूदगी
दो गुनी होती।

और प्यार की लहरे
मन के समन्दर में
बेकाबू हो जाती।

तुम नहीं हो, पर तुम
मुझमें ही होकर
नहीं हो।

मिलने के लिए भी
हमें बिछड़ना होगा
रानो, तुमसे मुझे
मुझसे तुम्हें।
------
8) आज तुम फूल ना
ले आए किशन
हमसे मत बतियाओ आज।

फूल तुम ना लाते और
हमसे रुठ जाती ये ज़ुल्फें
तुम्ही मनाओ इन्हें।

अरे...वो कौन पुकारे किशन,
ये गुलाब मुझे छेड़ता है
देखो न किशन

अब ना रुठो न तुम
मेरे किशन
लो अब गुलाब को
कोई ले गया मारकर
मनाने के लिए किसी को,

अब तो..मान जाओ
किशन..।
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9) मेरी निर्मल जड़ों को
जुदाई के जंग लगे
हथियार नहीं काट पाते।

ये तुम तक आने
वाली जड़ें हैं,
जो भीतर तक
घर कर चुकी है।

असम्भव नहीं अब
प्रेम का मिटना,
जड़ें फैल चुकी
रोम के कोनों में।

तुम प्रेम अमृत
जड़ों पर बरसाते
रहो किशन।

अब न बरसा तो
जड़ें धरती चीरकर
निकल आती है
सूखकर मर जाने को।
------
10) पहुंच ह्रदय की उस
अनंत गहराई में
जहां तेरे और हमारे
सिवा कुछ भी न हो।

और पूछ उस तन्हाई से
की तू क्या पाना चाहती
है।

मेरे खेल की बांसुरी को
थाम लेना, और डमरु
को उसी डुब-पन से,
पागलपन से बजाना।

बालों के बिखरने तक
बजाना, माथे पर
जब तक पसीने की
बुंदे जमा ना हो तब तक।

तू इसी पागलपन में
खोना चाहती है,
प्रेम का पागलपन।
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11) अब दो मोड़ हैं रानो
हमें बिछड़कर एक
होना होगा।

हमेशा के लिए एक,
दो होकर एक,
तुम बालमन हो
हठ ना करना।

तुम मुझमें ही तो हो
जब चाहे तब आँखें
खोल लिया करो,
मैं तस्वीर तुम्हारे
भीतर।

मेहंदी की महक से
कह दे ना मुझ तक
ना आएं,
और याद को भी।

तुम होने चली रानो
किसी की, में अदना
नाटक तुम्हें रंग-रस
ना दे पाऊं।

तुम एक दूजे निर्देश
पर बहने चली,
केवल निर्देश पर,
उस अभिनेता से
हार ना जाना तुम,
जीवन मंच पर।
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12) रात चुप क्यों है किशन
कहो न, ये हवा क्यों
उदास है,

मेरे किशन कहो न
तुम मुझमें हो तो
बांसुरी चुप क्युं है।

वो तुम्हारा डमरु भी
कुछ कहता नहीं
बस तकता है।

मुझे अपने साथ
कुछ बांसुरी, डमरु
के स्वर दे दो न।

मैं सहज कर रखूंगी
इन्हें, किसी कोने में,
उड़ने नहीं दूंगी इन्हें
कभी भी।

कहो न किशन
क्या वहां भी आओगे
तुम, हर इतवार की धूप,
अपना खेल दिखाने,
कहो न..।
------ © ®

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