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विज्ञान-कथा // लखनऊ // डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

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सम्पादकीय नींद क्यों रात भर नहीं आती यह माना जाता है कि मनुष्य सारे कार्य-काम धन्धों को इस कारण करता है कि वे सुविधा दे सकें और वह रात्रि मे...

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सम्पादकीय

नींद क्यों रात भर नहीं आती

यह माना जाता है कि मनुष्य सारे कार्य-काम धन्धों को इस कारण करता है कि वे सुविधा दे सकें और वह रात्रि में आनन्द से सो सके। यह मानव के परिश्रम का ही फल है कि उसने सभ्यता के विकास के साथ अनेक सुखदायी संसाधन भी विकसित किए। इसका लक्ष्य था सुख की नींद ले सकना, परन्तु इस विकास ने हमारी नींद उड़ा दी है। यह सभ्यता का, विकसित होती अपसंस्कृति का प्रभाव ही तो है कि हम रात्रि में सामान्य आठ घण्टों की नींद सो नहीं पाते। सभ्यता के विकास के साथ शहरीकरण बढ़ेगा और लोगों की नींद घटती जायेगी। ऐसा माना जाता है कि आजकल महानगरों की वासी बड़े, बूढ़ों की तो बात ही अलग है, बच्चे तक पूरी नींद नहीं ले पाते। यही कारण है कि अनिद्राजन्य रोग बढ़ रहे हैं।

पर हमारी नींद के हरण का एकमात्र कारण शहरीकरण नहीं है- हमारी नींद को चुरा रहा है प्रदूषण भी। वैज्ञानिक शोधों से यह स्पष्ट हो सका है कि प्रदूषित शहरों में-नगरों में रहने वाले लोगों की गहरी नींद लेने की सम्भावना- दूसरे अप्रदूषित - कम प्रदूषित स्थलों पर रहने वाले लोगों की तुलना में 60 प्रतिशत कम हो जाती है। अभी तक यह माना जा रहा है कि प्रदूषित नगरों के वासियों के हृदय और फेफड़ों को यह प्रदूषण प्रभावित करता है, परन्तु अब इसमें नींद का नाम भी जुड़ गया है। इस हेतु वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मार्थ ई. बिलिंग्स ने 1862 लोगों पर नींद के प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने इस अध्ययन में अपना ध्यान महानगरों में ट्रैफिकजन्य प्रदूषण अर्थात् नाइट्रोजन-डाई-आक्साइड और पार्टीकुलेट मैटरों पर केन्द्रित रखा। जो परिणाम आयें उनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। अब आप भारत की राजधानी को देखें जहाँ यह श्रेय कि यह विश्व का सबसे प्रदूषित महानगर है-वहाँ के वासियों पर कम नींद का क्या प्रभाव पड़ रहा, इसकी कल्पना की जा सकती है। क्या दिल्ली का रोड-रेज, छोटी-छोटी बातों के लिए हिंसा, इस कम नींद का प्रभाव तो नहीं है?

यह प्रदूषण हमें ग्लोबल-वार्मिंग की ओर ले जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार जैसे-जैसे पृथ्वी गरम होती जायेगी, हमारी नींद घटती जायेगी। इसी कारण कहा जाता है कि सोने का स्थान बाहर की तुलना में कुछ ठन्डा रहे। इसी कारण हम गर्मी में कम और जाड़ों में भरपूर सोते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 30 सालों में धरा का तापमान दो डिग्री सिलेसियस बढ़ जायेगा। यदि ऐसा होता है तो जन सामान्य साल में 6 घण्टे कम सोंयेगे तथा 65 वर्ष के लोगों की नींद प्रतिदिन 7 मिनट कम हो जायेगी। अतः नींद बचाने और स्वस्थ रहने के लिये, हमें प्रदूषण घटाने पर लग जाना चाहिए।

यह तो रही बात दिल्ली और अन्य प्रदूषित महानगरों की। हम लोग इस मामले में खुश नसीब हैं कि छोटे शहर कम प्रदूषित हैं। यही बात आज के लखनऊ पर नहीं लागू होती, और यदि लागू होती थी जो 60 के दशक के लखनऊ पर, जहाँ के विश्वविद्यालय में, मेरी दो पीढ़ियाँ उसी छात्रावास में रहकर शिक्षित हुई थीं जिसमें मैं भी रहा हूँ - मेस्टन हॉस्टल में। मेरे समय में भी लखनऊ की नफासत, तहजीब और तरबियत बरकरार थी। बातें करने, उठने-बैठने और तकल्लुफ की अदायगी, जिन्दा थी। जिन्दा था हजरतगंज और शनिवार की गंजिंग और मेफेयर में अंग्रेजी फिल्मों को देखने का सिलसिला। जब कोई अच्छी फिल्म न लगी हो तो रायल-कैफे में काफी का दोस्तों के साथ लुत्फ लेना। वैसे मुफुलिसी में इण्डिया काफी हाउस भी गुलजार किया जाता था पर सभी कुछ सलीके से था। जुबान में मिठास और अदब की खुशबू रहा करती थी। मुशायरे हुआ करते थे और सुनने वाले सारी रात बुत की तरह बैठ कर शायरी का लुत्फ उठाते थे। बद-अमनी, बद-इंतजामी कहीं नजर नहीं आती थी। छात्र-छात्रायें तहजीब से मिलते, बाते करते थे। उस माहौल का कुछ अन्दाजा मेरी विज्ञान कथा ‘उगंलियाँ' में मिल जायेगा। उसी लखनऊ का जिक्र फिर दोबारा इसी नाम की लम्बी कथा में आपके सामने है। वे सभी जगहें, इमारतें बरकरार हैं, उनके किस्से, चौक का घंटाघर और ठण्ढाई की महक की याद यह शब्द लिखते समय मानस में उभर आए हैं और टुन्डे के कबाब और चौक का नजारा आँखों के सामने नाच उठता है। चिनहट की वह झील झील जिसमें मित्रों के संग मुगार्वियों का शिकार किया था, अब सूख गयी हैं। बुलन्द दरवाजा और भूलभुलैया हनौज हैं, पर आमदरफ्त ने उन्हें बे रौनक बना दिया है। प्रदूषण का दानव, जहाँ पर खस और केवड़े के महक की तरावट बसा करती थी, आज अट्टहास कर रहा है। साठ के दशक में गोमती में आयी बाढ़ ने हजरतगंज-नरही में नाव चलवा दी थी, और जहाँ लखनऊ का कूड़ा डाला जाता था, वहाँ अब कंक्रीट का जंगल गोमतीनगर आबाद है। समय के फेर ने आई.टी. कालेज की रौनक को बदनुमा कर दिया है। उस जमाने में कपूरथला के अमरूद के बागों के पास बने रैदास मंदिर तक शाम को जाने की हिम्मत रखने वाले, बहुत कम लोग थे। लेकिन आज वहाँ सब बदल गया है। इसी समय के फेर में निराकार फँसा था। हजरतगंज से विश्वविद्यालय रात में, वापस दोस्तों के साथ, पहुँचने में ‘‘मंकी-ब्रिज'' पर रुककर चाँदनी में बलखाती गोमती को देखना तथा छतर मंजिल पैलेस की उसमें पड़ती छाया, कभी न भूलने वाली तिलिस्मी तासीर पैदा करती थी। पर आज तो गोमती विधवा की तरह श्रीहीन हो गयी है-आलूदगी से भरपूर। वह गोमती जिसमें बोटिंग क्लब हुआ करता था अब गायब है। उस लखनऊ के यादें ‘‘अतीत के चलचित्रों'' की तरह एकबार फिर उभर आयी हैं और दिल के किसी कोने से यह सदा आती है-

‘‘बीते हुए जमाने का अब तजकिरा ही क्या, जैसा गुजर गया, बहुत अच्छा गुजर गया।'' यही सबब भी है जिसको याद कर, रात भर नींद नहीं आती।

विज्ञान-कथा

लखनऊ

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

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व ह आई.टी. के चौराहे पर खड़ा था। लड़कियों के देखने के चक्कर में क्यों पड़ूँ, यही सोचकर उसने रैदास मंदिर की सड़क को देखने, की इच्छा से उधर ही जाने का निश्चय किया। उसे लगा कि आज रैदास मंदिर की दूरी कुछ अधिक हो गयी है अथवा (उसने सोचा) वह पिछली रात ठीक से सोया नहीं है, इस कारण दूरी बढ़ी हुई लगती है। वह आखिर में मंदिर के पास पहुँच गया। थकान मिटाने के लिये वह उसी पुराने नीम के पेड़ के नीचे पहुँच गया जहाँ पर वह कभी बैठा करता था। मंदिर का घण्टा बजा-पूजा शुरू हो गयी थी। पास बैठे एक दूसरे आदमी ने अपनी सुरती में चूना मिलाकर ठोका। सुरती की झर्राहट उसकी नाक में भर गयी। ‘‘मुझे भी दो'', कहकर निराकार ने अपनी हथेली उस दूसरे आदमी की तरफ बढ़ा दी। तम्बाकू को ज्योंही उसने अपने नीचे के होंठ से दबाया, उसका सर तेजी से घूमने लगा। तम्बाकू तेज थी। उसके ब्रेन के टेम्पोरल लोब की गतिविधियाँ तेज हो गयीं। उसको पता था कि इस प्रकार के टेम्पोरल लोब जनित उद्दीपन युक्त वह मात्र अकेला व्यक्ति नहीं है। वह जिन लोगों को देखता है वह उसे भी देख सकते हैं, परन्तु कुछ तो उसको देखकर चीखने लगते हैं, घबरा जाते हैं, आँखें बंद कर भागने का प्रयास करते हैं। वे सोचते हैं कि यह मृतक है अथवा आने वाले समय का कोई प्रतिनिधि है। मैं, निराकार यह जानकर कभी घबराता तो कभी आनन्दित हो उठता था। मैं लखनऊ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था और हूँ भी। मुझे अच्छी तरह आई.टी.कॉलेज के सफेद ग्रीक स्थापत्य की बिल्डिंग के निर्माण का ख्याल है। याद है मुझे वो आई.टी. चौराहे से पश्चिम की तरफ जाने वाली सड़क का, जो चौक तक चली जाती है। आई.टी. के चौराहे से दक्षिण में ब्रिज पार कर, हजरतगंज जाने वाली सड़क पर न जाने मैं दिन-रात में कितनी बार गुजरा था। मुझे ठीक से यह याद है कि उस समय गोमती कितनी साफ थी। कितना पानी रहता था, उसमें। छतर मंजिल कितना सुन्दर दिखता था उसके पानी में भी। मैंने कई बार चाहा था कि कोई मेरी उस टेम्पोरल चिंतन की अवस्था को दूर कर दे। कोई मुझको, निराकार को, इससे मुक्ति दिला दे। लेकिन इस अवस्था से मुझे यदि किसी ने छुटकारा दिलाने का आश्वासन दिया था तो वह था फैजाबाद अवध के पहले नवाब शुजाउद्दौला की बड़ी बहू बेगम का बड़ा लाडला बेटा मिर्जा अमानी आसफुद्दौला, मेरा हम उम्र था। बात यह...1774 के आसपास की है। मिर्जा अमानी आसफुद्दौला का मझला बेटा था, मिर्जा सआदत अली और छोटा भाई था जंगली मिर्जा।

मिर्जा अमानी आसफुद्दौला को लड़कपन से ही खेल-तमाशों का व्यसन था। वह गुण्डों और शोहदों की संगत में रहता था। मैंने देखा है कि उसको अश्लील गालियाँ देने और सुनने में बड़ा मजा आता था। उसके पिता नवाब शुजाउद्दौला ने उसे सुधारने की बहुत कोशिश की थी, पर आसफुद्दौला के कान में जूँ भी न रेंगी थी। सिर्फ इतना ही नहीं...मुझे अच्छी तरह से याद है कि जिस दिन नवाब शुजाउद्दौला की मौत हुई और फैजाबाद के सब छोटे-बड़े लोग, राजा-रजवाड़ों को इसकी खबर होते ही, वे सभी जनाजे में शामिल होने के लिये आये थे, उसी दिन मेरे दोस्त आसफुद्दौला ने अपने पिता के अन्तिम संस्कार में आये लोगों को रोककर, मिर्जा सलारजंग और मिर्जा अली खाँ को बुलाकर तख्तनशीनी की तैयारी करने का हुक्म दे दिया था। निहायत बदगुमान था आसुफद्दौला। लगता है कि उसे गद्दी के हाथ से निकल जाने के खतरे का आभास था, जिसके कारण उसने ऐसी गलत हरकत की थी। बात भी सही ही थी, क्योंकि उसका छोटा भाई मिर्जा सआदत अली खाँ उससे काबिल था। यह सभी जानते थे। नवाब शुजाउद्दौला ने शहर के जिन लुच्चों और शोहदों को कुछ दण्ड दिया था, वे आसुफद्दौला की गद्दीनशीनी के होते ही उसके चारों ओर मँडराने लगे थे। नतीजा जानते हैं आप-नवाब के मरने के दस दिन भी पूरे नहीं हुये थे कि उसने अपनी माँ-बहू बेगन से छः लाख रूपयों की फरमाइश की मौजमस्ती के लिये। मेंहदीघाट पर उसने ऐसी ऐयाशी और बदतमीजियाँ की थीं कि शहर फैजाबाद के शोहदे भी थू-थू करने लगे थे। मैंने अपनी आँखों से उसकी ऐय्याशी का समां देखा था। नशे में डूबा वह अपनी सारी ताकत वेश्याओं को खुश करने में लगाता चला जा रहा था। उसने अपनी ऐय्याशी में छः लाख रुपये एक महीने में उड़ा दिये। उसने फिर अपनी माँ से इतने ही रुपयों की फरमाइश की थी। तीन-चार दिनों तक बड़ी बहू बेगम ने विचार किया, मुझसे भी मशविरा किया था। उन्होंने फिर कुछ सोचकर अपने ऐय्याशी बेटे की चार लाख रुपये दे दिये। उसके लिये हर तरह की औरतें लाने वालों में, हज्जाम, धोबी, महावत, चिकवे, भंगी आदि थे जिन्हें वह भरपूर इनाम इस काम के लिये देता था। आपको अगर मेरी बात पर ऐतबार न हो तो ‘तवारीख करहबक्श' जो मोहम्मद फैजबक्श ने लिखी थी उसे पढ़कर इत्मिनान कर सकते हैं कि मैं गलत बयानी नहीं कर रहा हूँ।

फैजाबाद की बाजार में आसफुद्दौला की काली करतूतों की कहानी दिन-रात गूँजने लगी थी। उसकी माँ-बड़ी बहू बेगम और उसकी दादी को यह नागवार लगता था। वे आसफुद्दौला के टुच्चेपन की मलामत करती थीं। ऊबकर आसफुद्दौला ने फैजाबाद में अपनी माँ द्वारा पिता के मकबरे का निर्माण देखकर (गुलाबबाड़ी) लखनऊ कूच करने का फैसला किया। मैं भी उसके लाव-लश्कर के साथ लखनऊ आया था। हर साल फाल्गुन के महीने में आसफुद्दौला नयी शादी करता था और होली का त्योहार वह इस धूमधाम से मनाता था कि पाँच-छह लाख रुपये मौज-मस्ती में उड़ जाते थे। उसे चिड़ियाखाने का बेइंतिहा शौक था। उसके पास तीन लाख कबूतर थे। मुर्गे, भेड़, बकरे, साँपों और बिच्छुओं के कोई ठिकाना नहीं थे। मैंने उसके इस चिड़ियाखाने में ऐसे-ऐसे अजगरों को देखा है जो एक मन गोश्त अकेले खा जाते थे। नवाब को महल बनवाने का, इमारतों को बनवाने का शौक था। लखनऊ की इमारतें उसी के जमाने में बनी थीं। उसके नौकर, हर जात की सुन्दर, कुरूप औरतें, जो हमला (गर्भवती) होती थीं, लाकर उसके हरम में रखते थे। मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है कि उन काली-कलूटी औरतों के बच्चों को आसफुद्दौला अपनी मरदानगी का सबूत कहता था। अपनी प्रजा को सताने-लूटने में आसफुद्दौला का मुकाबला नहीं था। उसके बारे में मशहूर था कि ‘जिसे न दे मौला, उसे दे आसफुद्दौला' लेकिन मैं तो कहता हूँ ‘जिससे न ले मौला, उससे ले आसफुद्दौला।'

खैर-छोड़िये इस बात को। मैंने आसफुद्दौला के बेटे वजीर अली की शादी का जश्न भी देखा था। इस बारात में बारह सौ हाथी थे, दूल्हा जो शाही खिलअत पहने था उसमें बीस लाख के जवाहरात टंके थे। नाच-गाने के लिये लखनऊ की मशहूर तवायफों की फौज थी और वह जहाँ पर नाच रही थीं उन तम्बुओं की लम्बाई 120 फुट और चौड़ाई 60 फुट थी और वे साठ फुट ऊँचे थे। ऐसे तम्बुओं की तैयारी में दस लाख रुपये का खर्च आया था। नवाब आसफुद्दौला का जब रूमी दरवाजा बन रहा था, उस समय मैं वहीं था और अवध के 1784 के अकाल के वक्त लखनऊ के रईस और अमीर-इमामबाड़े की इमारतों को मशालों की रोशनी में, अपनी शर्मोहया बचाने के लिये रात में तामीर करने थे और गरीब तबका दिन में। मजदूरी सबको मिलती-दुआ आसफुद्दौला को। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि लखनऊ के इमामबाड़े का नक्शा उस जमाने के मशहूर नक्शानवीस किफायतउल्लाह का बनाया हुआ है। यह इमारत 169 फुट लम्बी और 53 फुट चौड़ी है। यह अजीब इमारत है, जिसमें लकड़ी का इस्तेमाल हुआ ही नहीं है। यह चूने और ईंट से बनी है और डाटों पर बनी इतनी लम्बी छत दुनिया में कहीं नहीं है।

1859 में मैंने यहाँ जोरों की तोपों और गोला-बारूद का जमावड़ देखा था-मगर फर्श इस कमाल की बनी है कि उसमें इस दौरान एक गड्ढा भी नहीं बना है। जिस वक्त नवाब चिनहट के पास सौरगाह का महल बनवा रहे थे और जब चारबाग और ऐशबाग की कोशिकें बनीं, उसका नजारा देखा था मैंने। और तो और मैंने अमानीगंज, फतहगंज, नक्खास से लेकर अलीगंज को बसाने का सिलसिला देखा था। मैंने नवाब सआदत अली खाँ की 1798 में गद्दीनशीनी देखी है। देखी है अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की ऐय्याशी, बारादरी और कैसरबाग की बसाहट, उनका जोगी बनकर तमाम शहरियों के साथ गेरुए कपड़े पहन कर शबाब का लुत्फ उठाते और उनके साथ अस्सी बरस के बूढ़े भी इन शबाबों को पाकर जवान हो उठते थे।

लखनऊ ऐय्याशी में डूबा था। कैसरबाग के सालाना मेले की तारीफ में मैं अक्सर यह शेर गुनगुनाता था- परिन हुफ्ता रुखा-ओ-देव, दर करिश्मा-ओ-नाज, ब सौख्त अक्लज हैरत कि इनचे बुल अजवीस्त। (परी ने अपना चेहरा छिपा लिया है और देख-राक्षस नाज नखरे दिखा रहा है-अक्ल हैरान है यह सब हुआ कैसे?) मैं कब रैदास मंदिर से चलता हुआ आई.टी. चौराहे पर आ गया-मुझे याद नहीं है। पूरब को जाती फैजाबाद रोड को देखते ही मेरे दिमाग में पुरानी यादें जवान हो गयीं। लेकिन इतना ही नहीं है। मुझे भविष्य जानने के लिये पंडित विनय नन्दन से मिलना है राजा बाजार में। आप कहेंगे कि मुझको भविष्य जानने की क्या आवश्यकता है? लेकिन है, क्योंकि मैं भी उस अनन्त अनादि समय चक्र का अंश हूँ, जो भूत भी है और वर्तमान होने के साथ ही भविष्य भी। मैं अपनी सामान्य गति से मंकी ब्रिज जो मेरे वक्त में नहीं बना था, उसकी जगह पर नावों को जोड़कर पुल बनाया जाता था, पर चला जा रहा था। किसी पुराने परिचित की आवाज ने मुझे चौंका दिया। मैं ठिठक कर रुक गया। मेरे सामने धनिया महरी खड़ी थी। वैसे कटीले नाक नक्श थे, वैसे ही पतली कमर थी उसकी, जैसे नवाब वाजिद अली के वक्त थी। उसकी आवाज ऐसी थी कि पत्थर पिघल जाए। इसी आवाज-नाजो अन्दाज पर फिदा हो गये थे नवाब, उसके नाम का पुल बना और धनिया बन गयी उसके हरम की चहेती बुलबुल। उसने पूछा, ‘‘किधर चले?'' ‘‘राजा बाजार तक'' मैंने कहा।

‘‘कुछ खास काम है, हुजूर को वहाँ?'' अपनी आँखों को नचाकर वह बोली।

‘‘है कुछ काम।''

‘‘हुजूर, हुक्म करें, मैं उसे करा दूँगी।''

‘‘तुम इतनी दूर खड़ी हो कि मैं उसे जोर से बताना चाहता नहीं'' मैंने कहा।

‘‘हुजूर मेरे साथ आयें'' कहकर धनियाँ तेजी से आगे बढ़कर छतर मंजिल के कंगूरे पर बैठ गयी। मैं दौड़ा, सामने आते आदमी से टकराया और गिर पड़ा। खुली जब मेरी आँख तो देखा, मैं छतर मंजिल की सड़क पर गिरा था और धनिया? कहीं नजर नहीं आ रही थी। ओह! करके मैं बैठा और फिर खड़ा हो गया। समय का तिलस्म टूट चुका था....। मुझे राजा बाजार पहुँचना था...मैं कुछ लँगड़ाता हुआ अमीनाबाद पहुँच गया और वहाँ से राजा बाजार, नादान महल रोड से आगे था। पंडित विनयनन्दन को सभी जानते थे। शिव मंदिर के दाहिनी तरफ उनकी शॉप का प्रवेश द्वार था। कॉलबेल प्रेस करते ही ऑटोमेटिक द्वार खुल गया। ऑफिस में कुर्सियाँ लगी थीं और ठीक सामने की तरफ कम्प्यूटर के पीछे बैठे एक व्यक्ति से मैंने पंडित विनयनन्दन के बारे में पूछा। उस बैठे हुये व्यक्ति ने मुझे ध्यान से देखा, मुस्कुराया और कहने लगा, ‘‘पंडितजी पूजा कर रहे हैं। एक घण्टे के बाद यहाँ आयेंगे। आप अपना काम बताइये।'' मैंने उस व्यक्ति का नाम पूछा। ‘‘मेरा नाम विचित्र नारायण है। मैं पंडितजी का एसिस्टेन्ट हूँ।'' उसने कहा।

‘‘मैं पंडितजी से अपना भविष्य जानने के लिए आया था।'' उसने मुझे ध्यान से देखा और कहने लगा, ‘‘श्रीमान, मेरा कम्प्यूटर दिखा रहा है कि आपका भविष्य बता पाना कठिन है। ...आप तो पुरुष-पुरातन हैं।''

‘‘क्या तात्पर्य है?'' मैंने चकित स्वर में पूछा।

‘‘आप तो आज के नहीं है, निराकारजी! आप तो..'' वह कहते हुए रुक गया।

‘‘मुझे पुराने लखनऊ जाना है, मैं फिर आऊँगा'' कहते हुए मैं पंडित विनयनन्दन त्रिकाल ज्योतिषी के ऑफिस से निकल आया। अपना भविष्य तो मैं कभी भी पंडित विनयनन्दन से पूछ लूँगा, यह सोचकर। विचित्र नारायण का ऑफिस पॉश था, ए.सी. लगा था, कुर्सियों पर धूल नहीं जमीं थीं, परन्तु उसके ऑफिस में मच्छर... वह भी विचित्र नारायण के सिर पर उड़ते हुए.. इस तरह से कि वे एक स्पाइरल की तरह छत की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। मैं सोचने लगा ऐसा क्यों? क्या ‘थॉट-वेव्ज' की ऊर्जा और मच्छरों का सिर पर मँडराना, किसी अदृश्य चेतना के द्वारा नियंत्रित तो नहीं होता है? क्या वह चेतना.... थाट वेव्ज यहाँ....? पुराना चौक अपनी शान से था। बदला था उसका स्वरूप, परन्तु बहुत कुछ बचा हुआ था। मेरे नवाब दोस्त की मशहूर पान की गिलौरी को बेचने वाला दरबारी लाल तो पंचतत्व में कभी का मिल चुका था, लेकिन खानदानी विरासत को उसका प्रपौत्र सँजोये हुये था। वह आज भी पान की गिलौरियाँ चाँदी के वर्क में ही लपेटकर देता था-एल्युमिनियम के वर्क में नहीं। पर वक्त के बदलाव के साथ गिलौरी पेश करने का तरीका बदल गया था। इसमें वह हुनर नहीं रहा जो उमराव जान के वक्त में था। मैंने जाफरानी जर्दा भी गिलौरी में डलवा लिया था। वह पुरअसर था उसकी तेजी मजेदार थी। मुझे लगा कि मुझ पर हल्का-सा सुरुर छा रहा है और वाकई में ऐसा था भी.... उमराव जान वाकई गौहरे लखनऊ थीं। ...सफेद मोती की तरह थी, उसकी शायरी और उसके घने काले बालों की कमर तक नागिन की तरह लटकती चोटी, चुस्त लिबास, उसके कजरारे-मतवाले नयनों के तीर-जब वह रक्स करती थी-नाचती थी, उस वक्त उसके पायजेब की खनक, तबले-सारंगी की संगत के साथ किसी को मदहोश करने के लिये काफी थे। मेरी आँखों के सामने उमराव जान का तिलस्मी नाच, उसका नाजो-अन्दाज कहर ढहा रहा था। मैं उसके तिलिस्म में डूब गया था। मैं उसके पुराने कोठे से उतर रहा था कि सीढ़ियों पर फिसल गया और लुढ़कता हुआ नीचे जा गिरा-मददगारों ने मुझे उठाया। चोट नहीं लगी थी-पर मैं कितनी देर बेहोश रहा याद नहीं, फिर उसी सीढ़ी पर मैं बठै गया। कितनी दे तक बैठा रहा पता नहीं।

‘‘तुम यहाँ सीढ़ियों पर बैठे हुये क्या कर रहे हो?'' किसी की आवाज ने मुझे चौंका दिया। वह परिचित-सी आवाज दूर...कहीं दूर से आ रही थी। मैं उस आवाज देने वाले को देखने लगा।

‘‘इस तरह क्या देख रहे हो मुझे?'' उसने कहा।

‘‘पहचानने की कोशिश कर रहा हूँ।''

‘‘ओह! तुम अब इस तरह के हो गये हो'' कहते हुए उसने मुझे हिलाया।

शरीर में चैतन्यता छा गयी। मैं उसे पहचान गया था।

‘‘क्या तुम नगमा हो?'' मैंने पूछा।

‘‘सही पहचाना'' कहती हुई नगमा पास बैठ गयी।

‘‘तुम यहाँ किसलिये आये थे?''

‘‘तुम्हारी तलाश में।''

‘‘मैं कश्मीरी मोहाल में रहती हूँ। वह काफी नीचे है यहाँ से। चलोगे उधर?''

‘‘अगर तुम चाहो तो?''

‘‘मगर यहाँ तो....'' कहते हुये नगमा रुक गयी। ‘‘बात पूरी करो...।''

‘‘लगता है तुम इस जगह को भूल गये हो। जानते हो यह मोहाल किसका है?''

‘‘मुझे याद आ रहा है.... नगमा।''

‘‘यहाँ तो चूनवालियाँ भी रहती थीं।''

‘‘ओह! अब मुझे याद आया, यह वेश्याएँ तो चूने के रोजगार के साथ नाच-गान और धन्धा करती थीं।''

‘‘ठीक कंचनियों की तरह। जो असली वेश्यायें थीं और नवाब शुजाउद्दौला के समय से फैजाबाद में दिल्ली-पंजाब, कश्मीर से आकर यहाँ बस गयी थीं।''

‘‘मगर इनमें से कोई भी मशहूर गायिका चूने वाली हैदरी की सी शोहरत हासिल नहीं कर सकीं'' निराकार ने बातों की डोर पकड़ ली थी।

‘‘तुम्हारी उमराव तो नागरानियों में से थी। जो गाती भी थी, शायरी भी करती थी और किसी रईस की रखैल भी बनने से ऐतराज नहीं करती थी'' नगमा ने कुरेदते हुये कहा।

‘‘नगमा मैं जानता हूँ कि उमराव भी तो उस डाकू फैज अली के साथ कोठे से भाग निकली थी। लेकिन उसने लखनऊ के आखिरी नवाब के बेटे, वाजिद अली शाह के बेटे विरजिस कदर को अंग्रेजों द्वारा बादशाह बनाये जाने के वक्त गजल गाने गयी थी, वापस कानपुर से लखनऊ आकर'' निराकार का जवाब था।

‘‘तो तुम को यह भी याद होगा कि गदर के बाद, आजादी की पहली लड़ाई के बाद जब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल अपने बेटे विरजिस कदर के साथ लखनऊ की राह छोड़कर बौडी और फिर बहराइच होते हुए नेपाल चली गयी थी, काठमाण्डू में उनकी मजार है, उस सफर में उमराव जान उनके साथ थी। वह बहराइच से अपनी पैदाइश और परवरिश की जगह फैजाबाद भी आयी थी और अपने मुजरे के दौरान, जो उसके पैदायशी मकान के सामने हुआ था, वह अपनी माँ से और बाद में दूसरे दिन भाई से मिली थी'' इतना कहकर नगमा बातों की याददाश्त को तरतीब करने के इरादे से चुप को गयी थी।

‘‘इन सारी घटनाओं का वाकयात का तजकिरा, जिक्र, इन बातों की चर्चा उसने अपनी उस किताब में की है, जिसको उसके दोस्त मिर्जा रुसवा साहेब ने लिखा था'' निराकार ने बात पूरी कर दी और एक गहरी साँस लेकर कहा, ‘‘वह लखनऊ मैं कैसे भूल सकता हूँ...।''

‘‘निराकार, क्या तुमको उस गज़ल का मिसरा (पहला शेर) जो उमराव जान ने विरजिस की ग्यारहवीं सालगिरह पर गाया था, याद है?'' नगमा ने पूछा-

‘‘पूरी गजल तो नहीं पर मिसरा इस तरह था- ‘‘दिल हजारों के तेरी भोली अदाएँ लेंगी, हसरतें चाहने वालों की बलाएँ लेंगी।''

‘‘वाह! क्या याददाश्त है तुम्हारी, मेरे अजीज'' नगमा ने तारीफ में कहा।

‘‘नगमा! तुम रहती कहाँ हो अब?''

‘‘उसी कश्मीरी मोहाल में।''

‘‘कश्मीरी मोहाल, जिसे मेरे दोस्त नवाब आसफुद्दौला ने लखनऊ के कई मोहल्लों के साथ बसाया था'' निराकार ने कहा।

‘‘हाँ, उसी मोहाल में'' नगमा ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।

‘‘ख्वाहिशेवारम-मेरी इच्छा है कि वहाँ चलूँगा तुम्हारे साथ, मगर जरा मुझे सहारा देकर उठाओ तो सही।'' निराकार जो अभी तक आखिरी सीढ़ी पर पड़ा था, नगमा से कह उठा। नगमा ने अपना हाथ बढ़ा दिया। निराकार उसका सहारा लेकर उठा। चोट थी पर हल्की। वह धीरे-धीरे सीधा खड़ा हो गया। दो कदम चलने के बाद निराकार ने नगमा से पूछा,

‘‘तो यह वही मोहालल है जिसे आबाद करने के बाद नवाब आसफुद्दौला ने फागुन में अपनी बीवियों और मुता कर पाली गयी रखैलों के साथ होली की दावत दी थी?''

‘‘हाँ, यह वही जगह है जहाँ पर वह दावत हुई थी जिसके पकवानों की महक आज भी मेरे दिमाग में तरोताजा है'' नगमा ने बताया।

‘‘तब तो तुम्हें काफी कुछ याद होगा, यद्यपि उस जश्न में शरीक हुये तुम्हें एक लम्बा अरसा गुजर गया है'' निराकार ने कहा।

‘‘हाँ, सब तो नहीं पर बहुत कुछ याद है।''

‘‘तो मैं उसके बारे में सुनने को बेताब हूँ।''

‘‘निराकार! उस दावत में पुलाव थे, जर्दा था (जाफरान से भीगा मीठा चावल), बिरयानियाँ थीं, शीरमालें थीं, कोरमा था, कबाब था, बीस तरह की सब्जियाँ थीं, दस तरह की चटनी थी, कई तरह के अचार थे, पराठे थे, नानें थीं और फिर वह ठण्डा फालूदा कि जिसको खाकर सभी वाह-वाह कर रहे थे।''

‘‘तुम्हें याद होगा कि बातों के दरमियान नवाब साहेब ने बताया था कि उसके मरहूम पिता नवाब शुजाउद्दौला का अपने बावरचीखाने पर साठ-सत्तर हजार रुपये हर माह, महज खाने पर खर्च होता था। नौकरों-बावरची आदि की तनख्वा मिलाने पर यह रकम सात लाख बीस हजार रुपये सालाना की थी।'' नवाब शुजाउद्दौला का नियम था कि उनका खासा (शाही थाल) सजाकर, ढँककर जिस पर उनके खास बावर्ची मिर्जा हसनू की मोहर लगी होती थी, उनके दस्तरखान पर रखा जाता था और वे हमेशा बड़ी बहू बेगम के साथ खाना खाते थे और वे ही उनके खाने को दस्तरखान पर चुनकर लगाती थीं।''

‘‘नवाब आसफुद्दौला के मामा नवाब सलारजंग खुद खाने के शौकीन थे। उनका बावर्ची इतना लजीज पुलाव पकाता था कि उसकी शोहरत सभी तरफ थी। नवाब शुजाउद्दौला का भी इस पुलाव का मजा लेने का मन हुआ। उन्होंने अपने साले नवाब सलारजंग से अपने मन की बात कही तो सलारजंग ने इस बात की चर्चा अपने बावर्ची से भी की होगी'' निराकार ने पूछा।

‘‘हाँ! उनका बावर्ची बातों को सुनकर मुस्कुराया और सलारजंग से बअदब कहने लगा-हुजूर! मैं पुलाव पका दूँगा पर आपको ख्याल रखना होगा कि नवाब शुजाउद्दौला तीन-चार लुक्मों-ग्रास से अधिक न खायें, और उनके लिये आप अबदार खाने, सुराही जो सुवासित जल से भरी हो, का इंतजाम जरूर कर दें। नवाब शुजाउद्दौला ने दस्तरखान पर बैठते ही पुलाव की फरमाइश की। पुलाव पेश किया गया। नवाब साहेब ने तारीफ के साथ पुलाव खाना शुरू किया। उन्होंने तीन-चार लुक्मे खाये थे कि उनके साले सलारजंग ने हाथ पकड़ लिया।

‘‘नवाब शुजाउद्दौला चौंक पड़े और पूछा-‘‘यह क्या?'' सलारजंग ने कहा, ‘‘बस, इससे अधिक न खायें'' पर नवाब साहेब ने दो-तीन लुक्मे और खाये कि उनको जोरदार प्यास लगी। अबदार से पानी मँगा-मँगाकर उन्होंने पीना शुरू किया। पानी उस सुराही में थोड़ा रह गया तब जाकर नवाब साहेब की प्यास बुझी। ऐसा था वह लजीज पुलाव'' नगमा ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘‘नगमा पुलाव और बिरयानी में कुछ फर्क है?''

‘‘हाँ, बिरयानी दिल्ली के मुगल दरबार की देन है और पुलाव नवाबे-अवध की।''

‘‘तो तुम्हें तो बिरयानी पसन्द होगी?''

‘‘निराकार! मजाक मत करो। मैं अवध की हूँ और लजीज पुलाव पकाती भी हूँ और खाती भी हूँ'' नगमा का सधा जवाब था।

‘‘तो तुम्हें तरह-तरह के पुलाव पकाना भी आता होगा?''

‘‘हाँ! मैं गुलजार पुलाव, नूर पुलाव, कोको पुलाव, मोती पुलाव और चम्बेली पुलाव पका लेती हूँ'' नगमा ने सोचते हुए कहा।

‘‘और अनारदाना पुलाव या नौरतन पुलाव?''

‘‘उन्हें पकाने के लिए वक्त चाहिए, इसलिये

उनको कभी पकाया नहीं, पर खाया जरूर है।''

‘‘नगमा! बताओ जरा कि यह पुलाव होते कैसे थे? सुनो! मैंने सुना था कि लखनऊ के बावर्चियों ने नवाबों के शौक देखकर नये तरह के पुलाव ईजाद किये थे'' निराकार ने कहा।

‘‘हाँ, किये तो थे।''

‘‘नगमा, उनका जरा नाम तो बताओ?''

‘‘अरे! पुलाव अनारदाना में आधा चावल अनार के दाने की तरह सुर्ख लाल और आधा शीशे से चमक रखने वाले चावल को मिलाकर तैयार किया जाता था। इसी तरह ने नवरतन पुलाव में नवरत्नों के रंग के चावल तैयार किये जाते थे।''

‘‘उस वक्त लोगों को खाने का शौक था'' निराकार ने कहा।

‘‘हाँ! याद होगा कि मशहूर बावर्ची इन पुलावों पर मेवों के बेलबूटे बनाकर दस्तरखान पर पेश करते थे। वे इतनी सफासत से बने होते थे कि उन्हें देखकर असली बेलबूटों से फर्क करना मुश्किल हो जाता था'' निराकार ने अपने माथे पर हाथ फेरकर बीते वक्त की बातों को याद करते हुए बताया।

‘‘और नगमा, तुम्हें लखनऊ के हकीम बंदा मेंहदी, जो खाने और नफीस कपड़ों के लिये मशहूर थे, की एक पहलवान की दी गयी दावत याद है?''

‘‘हाँ! बखूबी। मेरा उन हकीम साहेब से घर का रिश्ता था। वे मेरे चाचा के दोस्त थे और जिस बात की तरफ तुम इशारा कर रहे हो, वह मैंने अपने चाचाजान से ही सुनी थी'' नगमा चहक कर बोली।

‘‘सुनकर मुझे पुराना लखनऊ याद आ जायेगा, इसलिए तुम एक बार फिर वही दावत की बात बताओ'' निराकार ने इसरार करते हुए कहा।

‘‘वह पहलवान रोज सुबह बीस सेर दूध पीता था और उसी के साथ ढाई तीन सेर मेवा यानी बादाम और पिश्ते खाता था। खाने के वक्त ढाई-तीन सेर आटे की रोटी और एक बकरे का गोश्त खा जाता था। उसका जिस्म भी इसी गिजा के मुताबिक था। हकीम साहेब की दावत उसने कबूल कर ली। नाश्ते के वक्त से ही वह भूख से बेचैन था और बार-बार तकाजा करा कि नाश्ता या खाना जो भी तैयार हो मँगाइए। मगर हकीम साहब जान-बूझकर तसल्ली देते हुए टालते रहते। दोपहर हो चली थी, वह भूख की सख्ती से बेचैन हो उठा। आखिरकार वह नाराज होकर उठने लगा। तब हकीम साहब खाना भेजने का वादा कर अन्दर चले गये। थोड़ा समय और बीता। वह पहलवान परेशान हो गया। भूख अब नाकाबिले बर्दाश्त हो चुकी थी। यह देखकर हकीम साहेब ने एक महरी के हाथ एक रव्वान भेजा। उसे देखकर पहलवान के जान में जान आई। मगर जब उसे खोला तो एक तश्तरी में थोड़ा-सा पुलाव था। पहलवान बहुत नाराज हुआ। उसे बेइंतिहा गुस्सा आया और वह उठकर जाने लगा। लोगों ने उसे समझाया तब वह रुक गया।

उसने गुस्से से तश्तरी उठाई और पुलाव को बिना मुँह लगाये निगल गया। पाँच मिनट बाद उसने पानी माँगा और पाँच मिनट बाद फिर पानी माँगा, उसे पीकर डकार ली। अब हकीम साहेब के घर के अन्दर से तैयार किया हुआ खाना (रव्वान) आया, दस्तरखान बिछा। खुद हकीम साहेब भी आये। खाना चुना गया और वही पुलाव जिसे वह पहलवान खा चुका था एक प्लेट में आया। वह करीब दो पाव रहा होगा। हकीम साहेब ने वह प्लेट पहलवान को पेश की और कहा-‘‘देखिए यह वही पुलाव है या कुछ और?'' पहलवान ने कहा, ‘‘हाँ, यह वही है।'' हकीम साहेब ने कहा, ‘‘तो अब खाइये। मुझे अफसोस है कि हमारी तैयारी में देर हुई और आपको तकलीफ उठानी पड़ी।'' पहलवान ने कहा ‘‘मुझे माफ करें, मैं पहले ही लुक्में में तृप्त हो गया हूँ। एक चावल भी अब नहीं खा सकता। मेरे पेट में जगह नहीं है।'' हकीम साहेब ने बहुत कहा मगर उस पहलवान ने खाना मंजूर नहीं किया। हकीम साहेब ने सारा प्लेट का पुलाव लेकर खा लिया और कहने लगे, ‘‘बीस-तीस सेर खाना खा जाना, इंसान की गिजा नहीं है। यह तो गाय-भैंस की गिजा है। इंसान की गिजा है कि चंद लुक्मे खायें और उससे कूबत और तावनायी (शक्ति) आये जो बीस-तीस सेर गिजा में न आ सके। आप दो लुक्मे में सेर (तृप्त) हो गये। कल मैं आपको फिर दावत देता हूँ और आकर बताइयेगा कि इस पुलाव ने आपको वहीं कूबत और तावनायी दी जो कि आपकी बीस-तीस सेर गिजा देती थी।'' दूसरे दिन उस पहलवान ने मेरे सामने दावत पर बताया, ‘‘हकीम साहेब! जो कूबत और तावनायी उस पुलाव से मिली थी, वह मेरी गिजा से बेश्तर (अधिक)थी।''

‘‘नगमा! अब इस बाइसवीं सदी में जब आदमी एनर्जी पिल खाकर सारा काम कराता है, वह इन बातों पर एतबार कैसे कर सकता है?'' निराकार का चिंताग्रस्त स्वर कहीं दूर से नगमा को आता लगा।

‘‘बात सही है तुम्हारी, जिसने दीवारें-कहकशाँ, भूल-भुलैया और मिस्र का गीजा का पिरामिड नहीं देखा है, वह इनको बिना लोहे-सीमेंट के इस्तेमाल से, बना हुआ जानकर चकरा जाये तो क्या ताज्जुब'' नगमा बोली।

‘‘खाने के मामले में लखनऊ की ईजाद, वह भी नवाबी के वक्त की कई चीजें हैं, जिसमें से शीरमाल (एक रोगनी रोटी जो दूध में आटा गूँधकर बनायी जाती थी'' निराकार ने, जैसे उस शीरमाल का स्वाद उसको याद आ गया हो, अपने होंठों को जीभ से तर करते हुए बताया।

‘‘हाँ, वाकई यह रोटी इर्रान की नाने-रोगनी का विकसित लखनवी रूप है'' नगमा ने संशोधन किया।

‘‘और नान जिलेबी?'' निराकार का प्रश्न था।

‘‘तुम तो जानते हो कि अरबों की ‘‘जिबलिए'' लखनऊ आकर या कहूँ कि भारत आकर जिलेबी बनी और यही खमीर देकर तैयार होने के बाद लखनऊ की मशहूर नान जिलेबी बनी।''

‘‘हाँ, नगमा मुझे बखूबी याद है'' निराकार ने कहा।

‘‘लखनऊ की नफासत और नजाकत से तो तुम वाकिफ हो मगर तुमको पता है कि पराँठे बनाने का सिलसिला इस देश में क्योंकर शुरू हुआ?'' नगमा ने निराकार को कुरेदने के इरादे से पूछा।

‘‘रुको! जरा सोच लूँ।''

‘‘हाँ, दो मिनट का समय है, तुम्हारे पास।''

‘‘तुम तो क्लास टीचर की तरह बात करती हो?''

‘‘अच्छा सुनो! हिन्दुस्तान में बनती हुई पूरियों को देखकर विदेशियों ने पराँठे बनाने की शुरूआत की थी। लखनऊ के बावर्चियों को इसमें महारत हासिल थी।''

‘‘तुम तो जानती ही हो कि नवाब गाजीउद्दीन हैदर को पराँठे पसन्द थे। उनका बावर्ची छः पराँठे पकाता था और फी पराँठा (प्रत्येक पराँठे) 5 सेर घी के हिसाब से 30 सेर घी लेता था और इन पराँठों का जायका कैसा होता था यह तो वही बता सकता था, जिसने उन्हें खाया हो'' निराकार ने बीते जमाने की याद में, उसके गुजर जाने का एहसास करते हुए, गहरी साँस लेकर कहा।

‘‘लखनऊ के बाज बावर्ची इतनी नफासत से करैला पकाते थे कि वह पूरी तरह से हरा दिखता था, मगर खाने के समय काटने पर जो कुछ उससे निकलता था, वह लाजवाब होता था।''

‘‘ठीक उस कद्दू की की तरह जो देखने में समूचा कद्दू लगता था, काटने पर उसमें से तरह-तरह के लाजवाब खाने की चीजें निकल आती थीं'' निराकार ने याद दिलाया।

‘‘मुझे उम्मीद है कि तुम उन समोसों को नहीं भूले होंगे जिनको तोड़ने पर उनमें बंद लाल पक्षी निकलकर उड़ जाते थे। इन समोसों को लखनऊ का मशहूर बावर्ची पीरअली तैयार करता था।''

‘‘इतना ही नहीं, इस करतब, पकाने के करतब को देखकर अंग्रेज दम्पती आनन्दित हो जाते थे'' नगमा ने याद दिलाया।

‘‘मुझे अच्छी तरह से याद है'' निराकार का उत्तर था। ‘‘कमाल का हुनर था, उन बावर्चियों का।''

‘‘लेकिन नगमा, उस जमाने के हिसाब से तुमने भी खाना पकाना ही नहीं सीखा था वरन् संगीत की शिक्षा ली थी'' निराकार ने नगमा से कहा।

‘‘हाँ, क्यों नहीं?''

‘‘नगमा, क्या कभी तुम वाजिदअली शाह के कैसरबाग में होने वाले ‘रहस' में हिस्सा लिया था?''

‘‘हाँ, मैंने उनके उस जश्न को देखा था।''

‘‘क्या होता था उसमें?''

‘‘निराकार! उसमें वाजिदअली शाह जोगी बनते थे और उनकी रखैलें जोगिनियाँ। वाजिदअली शाह मोतियों को जलाकर उनसे बनाई गई राख शरीर में लगाते थे। नाच-गान की हवा बहती थी। उसमें बहुत कुछ होता था क्या कहूँ?''

‘‘लेकिन नगमा! इसके बावजूद वाजिदअली शाह ने कत्थक नृत्य को इर्जाद किया। भारतीय संगीत की नई राग-रागिनियाँ, जैसे-जोगी, कन्नड़ (श्याम) जूही, ठुमरी, भैरवी, पीलू, तिलक कमोद आदि बनाई। उनका विकास और प्रचार भी खूब हुआ था, क्योंकि वाजिदअली शाह खुद अच्छे संगीतज्ञ थे'' निराकार बताने के मूड में था।

‘‘इतना ही नहीं, उस जमाने में शरीर का चुस्त-दुरुस्त होना भी जरूरी था। इसलिये लोग कुश्ती, जोर आजमाइश और हथियार चलाना जानते थे।''

‘‘निराकार तुम भी तो ‘लकड़ी चलाना', ‘पाटा भाजना' और वाँक चलाने में माहिर थे। तुम्हारी शोहरत एक मैं वंकैत के रूप में रह रही है'' नगमा ने बात बढ़ाने के लिहाज से कहा।

‘‘लेकिन उस जमाने के ब्राह्मण लोग अपने जनेऊ में एक चाभी, या लोहे का छल्ला बाँधे रहे थे। इसी का प्रयोग करके वे दुश्मन के हाथ की तलवार गिरा देते थे'' निराकार ने कहा।

‘‘वह कैसे?''

‘‘क्योंकि उन्हें आदमी के शरीर की सारी मांसपेशियों की स्थिति का ज्ञान रहता था। उन पर पड़ी चोट किसी भी अंग को ढीला कर सकती थी। यह हुनर सिर्फ ब्राह्मण वंकैतों में या और किसी जात में नहीं'' निराकार ने बताया।

‘‘और यह पंडित विचित्र नारायण वंकैत वाजपेयी का प्रपौत्र है।''

‘‘इसीलिये तुम उससे मिलने गये थे'' नगमा ने चुटकी ली। निराकार मुस्कुराया-कुछ बोला नहीं। वे दोनों धीरे-धीरे कर, समय की सीढ़ियों की तरह कश्मीरी मोहाल जाने वाली सीढ़ियों पर उतर रहे थे। सीढ़ियाँ थीं कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। वाकई कश्मीरी मोहाल काफी नीचे था। एक दूसरा लखनऊ-नीचे बसा लखनऊ।

हम कितनी गहराई पर खड़े थे कह पाना मुश्किल था। मैं निराकार-आँखों को फाड़कर चौड़ी फोर ट्रैक सड़क को, सुन्दर मकानों को, सड़क के दोनों तरफ लगे सायादार आम, जामुन, बरगद, पीपल और नीम के पेड़ों को देख रहा था। उन सड़कों पर भीड़ नियंत्रित ढंग से चल रही थी। निराकार इन दृश्यों को अपलक नेत्रों से देख रहा था। वह हकीकत और ख्वाब में फर्क नहीं कर पा रहा था। वह कुछ पलों तक मौन खड़ा रहा। ऐसा लग रहा था कि वह अपने विचारों को सुव्यवस्थित कर रहा हो। मौन छाया था।

‘‘क्या यहाँ पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है?'' नगमा से निराकार का प्रश्न था।

‘‘है क्यों नहीं, परन्तु उसके चलने का समय नियंत्रित है।''

‘‘क्या सिर्फ इसी सड़क पर?''

‘‘नहीं निराकार, इस क्षेत्र की सभी सड़कों पर।''

‘‘लेकिन यहाँ अन्डरग्राउन्ड रेल या ट्रामें या ऑटो नहीं चलते?''

‘‘खूब चलते हैं'' नगमा का उत्तर था।

‘‘मगर इतनी शान्ति क्यों है?''

‘‘निराकार! यहाँ ध्वनि प्रदूषण की सीमा नियंत्रित है। इस कारण कोई यहाँ ध्वनि-किसी प्रकार की ध्वनि नहीं करता'' नगमा ने बताया।

‘‘और क्या वायु प्रदूषण भी नहीं है, नगमा!'' निराकार का प्रश्न था।

‘‘नहीं है।''

‘‘वह कैसे?''

‘‘हम पेट्रोल से वाहन या ट्रामें नहीं चलाते। हमारे इंजन वातावरण की कार्बन-डाइ-ऑक्साइड को तोड़कर डिकम्पोज कर, उसकी ऑक्सीजन से चलते हैं। इस प्रकार कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की सीमा वातावरण में नियंत्रित रखी जाती है।''

‘‘आश्चर्य है नगमा, इस नीचे के लखनऊ की प्रौद्योगिकी पर'' निराकार ने कहा।

‘‘क्या यहाँ फैक्ट्री आदि भी है? निराकार ने सहजता से पूछा।

‘‘हैं, पर सभी नैनो प्रौद्योगिकी पर आधारित हैं। इस कारण वे सभी अन्डरग्राउन्ड सेक्टर में हैं, ऊपर नहीं।''

मैं चकित था नगमा की बात पर। हम चलते हुए नगमा के फ्लैट में पहुँच गये। द्वार अपने आप खुला। जैसे ही हम सेंट्रल टेबिल के पास बैठे एक ट्राली अपने आप सुगंधित भोज्य पदार्थों को लेकर आ गयी। सभी कुछ बेक्ड था, तेलरहित, वसारहित। नगमा ने बताया कि हमारा पूरा जीवन नियंत्रित है। हमारी नैनो फैक्ट्रियाँ इतना अच्छा सामान बनाती हैं कि उसका एक्सपोर्ट होता है। हमारा प्रबंधन पूर्ण स्वतंत्र है। उस लखनऊ से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारा लखनऊ बिल्कुल अलग है। जमीन के सौ मीटर नीचे हैं, हमारा लखनऊ और इस ऊपर के लखनऊ तक हम विमान द्वारा आते-जाते हैं। विमान भी पानी से चलने वाले आक्सीजन, हाइड्रोजन से चलने वाले...।

‘‘नगमा यह तुम्हारा लखनऊ मुझे हैरतअंगेज लगता है। मैं तो यहाँ तुमसे मिलने आया था, पर जहाँ तक मैं समझता हूँ कि यह मेरी गलतफहमी थी। यह लखनऊ एक तिलिस्म की तरह लगता है, मुझे।''

‘‘ओह तो तुम घबरा गये, मेरे अजीज दोस्त!'' नगमा कुछ इस अंदाज से बोली कि जैसे वह कुछ और करना या दिखाना चाहती हो।

‘‘हाँ, मुझे घबराहट तो हो ही रही है'' निराकार ने अपने को संभालते हुए कहा।

‘‘तो तुम उस गुजस्ते-लखनऊ की कुछ यादगारों को, उनके मन-बहलाव को वसायिलों-साधनों को देखना चाहोगे'' नगमा ने पूछा। ‘‘क्यों नहीं?''

दूसरे पल नगमा ने किसी रिमोट का बटन को प्रेस कर दिया। सामने की दीवार चमकने लगी। ‘‘ध्यान से देखना'' नगमा ने कहा। मैं नवाब नसीरुद्दीन हैदर बादशाह की उस ‘मुबारक मंजिल' जो मोती महल के पास थी, की छत पर बैठा हुआ देख रहा था। मेरी नजर के सामने एक मैदान था, कोसों लम्बा। ‘मुबारक मंजिल' से आठ सौ फुट की दूरी पर गोमती बह रही थी। उसके दूसरे पार बाँस और लोहे की छड़ों से घिरा एक मैदान था जिसमें एक काले रंग का काफी मजबूत कद-काठी का घोड़ा कूद रहा था। इस घोड़े को कोई न तो पकड़ सकता था और न कोई उस पर सवार हो सकता था। यह अपने पास आते हुए लोगों को पैरों से कुचल कर मार डालता था। उन आदमियों की हालत को ऐसा बना देता कि उनकी लाख पहचानी नहीं जा सकती थी। इस घोड़े के बारे में मैंने भी सुन रखा था।

‘‘देखो वह भूरिया-शेर-जो बादशाह नसीरुद्दीन हैदर का बहुत प्यारा है और खूँखार है। उस मैदान में घोड़े से लड़ने के लिए लाया जा रहा है'' नगमा ने कहा।

‘‘मैं देख रहा हूँ।''

घोड़े को मैदान में देखकर शेर ने उस पर झपटने का दाँव लगाया। शेर घोड़े पर कूदा मगर घोड़े ने अपने अगले जिस्म को झुकाया और शेर उसके पीछे जा गिरा। उसके खंजर जैसे नाखून घोड़े के पुट्ठे पर थे। इसी के साथ घोड़े ने पूरी ताकत से दुलत्ती लगायी कि शेर कलाबाजियाँ खाता हुआ दूर जा गिरा, पर चन्द मिनटों के बाद उसने फिर छलाँग लगाई और घोड़े पर कूदते ही घोड़ा झुका और घोड़े की जोरदार दुलत्ती से शेर का जबड़ा टूट गया। सभी यह नजारा देख रहे थे। शेर फिर घोड़े पर नहीं झपटा, वह मैदान से भागने लगा। सभी यह देखकर हैरान थे। फिर बादशाह के हुक्म से तीन-अरने भैंसे घोड़े पर छोड़े गये। उन्हें देखते ही घोड़े ने एकाएक बीच में खड़े भैंसे पर इस तरह जोर से दुलत्ती मारी कि उसका सींग टूट गया। दोनों बाकी बचे भैंसे भाग लिये। बादशाह कह रहे थे ‘‘इस नायाब बहादुर घोड़े के लिये मैं अलग लोहे का कटघरा बनवाकर, इसे पूरी हिफाजत के साथ रखूँगा। यह बहुत बहादुर घोड़ा है।'' उसके बाद मैंने दुबारा चीतों की, तेंदुओं की, हाथी की, ऊँट की, गैंडों की, बारहसिंहों की, भेड़ (मेढ़े) की लड़ाइयाँ इसी छत से देखीं।

‘‘क्या अब कबूतरबाजी, मुर्गबाजी, बटेरबाजी, बुलबुलबाजी देखना चाहोगे?'' नगमा की आवाज आई।

‘‘नहीं, यही काफी रहा। बाकी तो मैंने हकीकत में देखी हैं। उनको मैं तुम्हारी इस तिलिस्मी दुनिया में देखना नहीं चाहता'' मेरा जवाब सुनकर नगमा ने कन्ट्रोल बन्द कर दिया।

‘‘तुम हवा में क्या देख रहे हो?''

‘‘वक्त को, समय को। नगमा तुम तो जानती हो कि बुढ़ापे में पुरुष की कामवासना उसकी जबान से निकलती है, बातों से निकलती है और कायर पुरुष की बहादुरी इस तरह के तमाशों में झलकती है। मेरे दोस्त आसफुद्दौला के वक्त से ही लखनऊ के नवाब अपनी बहादुरी (कायरता छिपाने के लिए) का इजहार इस तरह की नुमाइशों में करते रहे हैं।''

‘‘मैं इस बाबत क्या कहूँ?'' नगमा ने मुस्कुराने का प्रयास करते हुए कहा।

‘‘क्या हम यह दूरी बनाये रखेंगे, नगमा?''

‘‘नहीं मैंने ऐसी कोई कसम नहीं खाई है'' इठलाती हुई नगमा मेरी बगल में थी।

‘‘एक बात पूछूँ?''

‘‘जरूर।''

‘‘क्या तुम उमराव जान की हमशीरा हो?''

‘‘नहीं! तुम्हारा अन्दाज गलत है।''

‘‘फिर तुम उसकी उस पुरानी ड्योढ़ी पर क्या कर रहे थे? उसने पूछा।

‘‘क्योंकि पंडित विनयनन्दन ने मुझे वहाँ किसी को मैसेज देने के लिये भेजा था'' नगमा मेरे पास यह सुनकर आ गई। उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया। मुझे लगा कि मेरे जिस्म में हजारों वोल्ट की बिजलियाँ उतर आईं। मैं बेहोश हो गया। नगमा अब कहीं नहीं थी। उस घने पीपल के पेड़ की छाया में मैं देर तक सोया रहा। मुझे उनसे मिलना था। मैं उनसे मिलने के लिये बेताब था। इधर-उधर किसी सवारी के आने का इंतजार करने लगा। मैं टाँगे वाले की तरफ बढ़ा... और उस टाँगे वाले को आवाज देकर रोका। मैं करीब आया कि मेरी सूरत देखते ही वह चिल्लाकर घोड़े को चाबुक मारता हुआ भाग निकला। लोग देख रहे थे.... वे कह रहे थे यहाँ तो कुछ भी नहीं दिख रहा है, क्या देखकर टाँगे वाला भाग खड़ा हुआ। किसी दूसरे शख्स की आवाज गूँजी... उसकी नजर को धोखा हुआ होगा। मैं उनकी बातें सुनता हुआ अपने रास्ते पर चला जा रहा था। मेरे सामने दो कहार एक पालकी उठाए चले आ रहे थे। मैं उन्हें एक अशर्फी दिखायी और राजा बाजार तक ले चलने के लिये कहा। इत्तेफाक से पालकी खाली थी, उसी पर बैठकर मैं पंडित विनयनन्दन के ऑफिस के सामने उतर गया। गनीमत थी कि कहार मेरी हकीकत समझ नहीं सके।

‘‘पंडितजी आये?'' मैंने विचित्र नारायण से पूछा।

‘‘पंडितजी आजकल मौन व्रत धारण किये हैं, वे किसी से बातें नहीं करते। सिर्फ कम्प्यूटर से मैसेज देते हैं।''

‘‘देखता हूँ'' विचित्र नारायण ने कहा। वह कम्प्यूटर के की-बोर्ड को प्रेस करने लगा। प्रत्येक प्रयास के फलस्वरूप कभी उसके सिर पर घूमने वाले मच्छरों की संख्या घटती तो भी बढ़ जाती थी। थोड़ी देर में प्रिंट आउट निकल आया। विचित्र नारायण उसे विचित्र निगाहों से देखता हुआ कहने लगा, ‘‘निराकार! समय सापेक्ष्य है वह स्थिर भी और गतिमान भी। वह प्रकाश की भाँति है जो सीधी रेखा में और तरंगों की भाँति चलता है, पर रहता वह प्रकाश ही है। जैसे बीता हुआ कल आने वाले कल में समाहित हो जाता है उसी प्रकार यह चक्र अनादि है और अनन्तकाल से गतिमान है। हम-तुम इसी के अंश हैं। तुम्हारा भविष्य-यह रहा'' कहते हुए उसने मुझे एक हाथ वह प्रिंट आउट दे दिया। मैंने ध्यान से उसे उलट-पुलट कर देखा। उस पर विभिन्न ढंग से अंक और लाइनें बनीं थीं। मैं उन्हें प्रत्येक कोण से देख रहा था-भविष्य तो दूर-दूर तक लिखा नहीं दिखा, परन्तु एक कोण पर देखने से एक छाया का आभास होता था जो कभी किसी लड़की का चेहरा लगता तो कभी मात्र अंकों का समूह।

‘‘क्या यही है मेरा भविष्य?''

‘‘पंडित विनयनन्दनजी ने बताया है कि जब वह लड़की तुम्हें मिल जायेगी तुम अपना भविष्य जान जाओगे'' विचित्र नारायण ने उत्तर दिया।

‘‘कहाँ जाना होगा मुझे।''

‘‘गन्दे लखनऊ में।''

‘‘कहाँ है वह?''

‘‘गोमती के तट पर, कूड़े के ढेर पर बसा हुआ'' विचित्र नारायण का स्पष्ट उत्तर था। मैं गन्दे लखनऊ की तलाश में चल पड़ा। मेरे लिये यह लखनऊ सर्वथा नवीन था। कैसे वहाँ तक पहुँचूँ, मैं सोचने लगा। रिक्शा मुझे अजीब लगता था। मैं टाँगे पर, इक्के पर, पालकी पर, घोड़े पर, हाथी पर बैठने का तो अभ्यस्त था, पर आटो-रिक्शा-वह भी चार-पाँच सहित, न उस पर रकाब लगती है और न लगाम ही, बैठूँ कैसे उस पर यही मैं सोच रहा था। एक बूढ़ा आदमी मेरी बगल चल रहा था। उसका दम फूल जाता तो वह धीरे-धीरे चलता और कभी तो रुक जाता। उसके एक बार रुकने पर मैंने उससे पूछा, ‘‘आपकी मैं कैसे मदद करूँ?''

‘‘मुझे एक सायकिल रिक्शे पर बैठा दो, मैं अपने घर जाना चाहता हूँ...मगर...'' कहते हुए वह रुक गया। ‘‘आपने बात पूरी नहीं की'' मैंने कहा।

‘‘हकीकत में मेरे पास पैसे नहीं है। रिक्शे वाले को पचास रुपये देना होगा... क्या करूँ?'' ‘‘मैं आपको दे दूँगा। आप एक रिक्शा रोकिये।'' उस बूढ़े ने एक रिक्शे को हाथ दिखाकर रोका।

‘‘कहाँ जाना है?''

‘‘गन्दे लखनऊ के सेक्टर-सी में'' उस बूढ़े ने कहा।

‘‘कितना लोगे?''

‘‘अकेले का पचास और तुम दोनों का नब्बे रुपये'' रिक्शे वाले का जवाब था।

‘‘क्या आप भी चलेंगे मेरे साथ?'' उस बूढ़े ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।

‘‘चलना तो मुझे भी है उसी तरफ...।''

‘‘तो साथ चलिये।'' उस बूढ़े की आवाज में गुजारिश थी। जिस तरह बूढ़ा सायकिल रिक्शे पर बैठा, मैं भी उसी तरह दूसरी तरफ से रिक्शे पर चढ़ गया। रिक्शा नादान महल रोड से चलता अमीनाबाद की तरफ बढ़ा। अमीनाबाद नाम मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा था।

‘‘क्या यह जगह हमारे दोस्त नवाब अमानी आसफुद्दौला के यादगार से जुड़ी नहीं है?'' मैं मन ही मन सोच रहा था। अगर रिक्शा उधर से चलता है तो मैं भी उस जगह को देख सकूँगा, पर हुआ ऐसा नहीं। रिक्शा लाल बाग से होता हुआ हजरतगंज और उससे आगे बढ़ता जा रहा था।

गन्दा लखनऊ हकीकत में उतना गन्दा नहीं था। उसकी चौड़ी सड़कों पर रिक्शे कम, कारें ज्यादा दौड़ रही थीं। दोनों तरफ सड़क के किनारे छाया देने वाले वृक्ष तो लगे थे, परन्तु वे छोटे थे। लगता था यह जगह जल्दी ही आबाद हुई थी। इसीलिये लगाये गये पेड़ छोटे थे-नये थे। रिक्शा वाला अपनी गति से चल रहा था। मैंने उससे पूछा ‘‘गन्दा लखनऊ आ गया।'' रिक्शा वाला हँसा और बोला ‘‘यह गोमती नगर है-साहब।'' उसको हर सेक्टर पता था और उसका रिक्शा चलाने का अन्दाज साफ जाहिर करता था कि वह सेक्टर-सी को अच्छी तरह से जानता है। इस सेक्टर के सारे मकान सफेद थे और करीब-करीब सभी पाँच मंजिलें थे। जिनको देखकर मुझे विचित्र नारायण के सिर पर उड़ते हुए नीचे से ऊपर जाते हुए मच्छरों की याद आ गयी। इन मकानों में रहने वाले भी तो इन्हीं मच्छरों की तरह सीढ़ियाँ चढ़के ऊपर जाते होंगे। ऐसे मकान मुझे सख्त नापसंद हैं-मैं तो इनमें घुसने से घबराता हूँ। वह बूढ़ा एक पार्क के बगीचे के पास उतरा। मैंने रिक्शे वाले को रुपये दिए। वह बूढ़ा, दुआएँ देता हुआ सामने के एक मकान में घुस गया। रिक्शा वाला जा चुका था और मैं पार्क में लगाई मुलायम घास पर बैठ गया। मुझे थोड़ी इस्तेराहत की-आराम की जरूरत

थी।

मुझे अब जरूरत थी उस चेहरे की तलाश की जिसके बारे में विचित्र नारायण ने मुझे बताया था, पर उसे मैं कैसे पहचान सकूँगा। यह प्रश्न मुझे परेशान कर रहा था। मैंने उसी पार्क के आसपास रहते हुए उसे देख पाने का, तलाश लेने का निश्चय किया। उस पार्क के बगल में लगे नीम के बड़े वृक्ष पर मैं बैठा रहता और जब निगाहें आने-जाने वाले चेहरों को देखते देखते थक जातीं तो उसकी मोटी शाखा पर मैं लेट जाता। इस तरह उसका इन्तजार करते हुए आज तीसरा दिन था।

मैं नीम के पेड़ से उतर कर पार्क की गुदगुदी घास पर बैठा था। मुझे लगा कि किसी ने मेरा नाम लेकर पुकारा। मैं चैतन्य होकर चारों तरफ देखने लगा। कहीं यह मेरे मस्तिष्क का भ्रम तो नहीं है? मैं सोच ही रहा था कि इतने में वही आवाज फिर मेरे कानों में गूँज उठी। मैंने मुड़कर पीछे देखा। एक लड़की जो शायद तीस बसन्त देख चुकी थी, मुझे बुला रही थी। मैं तेजी से उसके पास पहुँचा... उसका चेहरा बिल्कुल प्रिंट आउट से मिलता था।

‘‘निराकार! तुमने मुझे पहचाना नहीं?'' उसने कहा।

‘‘क्या तुम शगुफ्ता हो?''

‘‘ओह, तुमने मुझे पहचान लिया।''

‘‘मैं तुम्हें न पहचान सकूँ, यह असंभव है'' मेरी बात सुनकर वह मुस्कुरायी।

‘‘इतने दिनों तक कहाँ थी?''

‘‘शुरू के कुछ दिन तो नवाब आसफुद्दौला के हरम में बीते और... फिर वहाँ से निकलने के बाद मैं तुम्हारी तलाश में भटक रही थी...'' कहती वह नीम की उसी

डाल पर जाकर बैठ गयी जहाँ मैं बैठा था। मैं भी नीम की उसी डाल पर उसकी बगल में बैठ गया। वहीं बैठकर हम दोनों इस गन्दे लखनऊ में छायी धूल, प्रदूषित विषाक्त धुएँ को, दम घोंटती हुई हवा में बढ़ी हुई कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की मात्रा को, अपने फेफड़ों में भरते हुए, लखनऊ के भूगर्भ में स्थिल जल में बढ़ी हुई आरसेनिक की मात्रा की बातें करते उस प्रदूषित गोमती को देखकर आहें भरते, बैठे थे। एक-दूसरे को कुचलती निर्दयी भीड़ हमें देख नहीं पा रही थी, पर हम उसे देख रहे थे, समय गुजरे हुए, आने वाले और मौजूद समय की भाँति निरपेक्ष्य। समय की तरह तटस्थता से... जिसे कोई देख नहीं पाता।

ई-मेल ः rajeevranjan.fzd@gmail.com

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रचनाकार: विज्ञान-कथा // लखनऊ // डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
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