मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

विज्ञान-कथा // मक्खी // डॉ. रवीन्द्र अन्धारिया

‘अ जी, सुनते हो?' सेठानी लीलावती ने कहा। परन्तु सेठ नरोत्तम शाह करवट बदल कर सोते ही रहे। वे गहरी नींद में थे। सेठानीजी ने उसके कंधे झकझोरते हुए कहा, ‘सेठजी, मेरी तो नींद हराम हो रही है। और आप है जो कुम्भकर्ण की नींद सो रहे है।' सेठ एकदम होश में आकर बोले, ‘ओहो! क्या हुआ? आधी रात में क्यों जगाया?'

‘श्रीमानजी, मुझे बहुत ही घबराहट हो रही है। सुबह होते ही अखबार में बालको को उठा लेने के समाचार निकलते रहते हैं, क्या आप समाचार सुनते या पढ़ते नहीं है?'

‘ऐसे समाचार तो आते ही रहते हैं, पर इसमें मेरी नींद क्यों खराब कर रही है?' सेठने उबासी लेते हुए कहा।

‘मुझे तो अपने लाडले सुधीर की बहुत चिंता रहती है। शहर में आपका नाम बड़ा, कारोबार बड़ा, इससे लाखों रूपये के लालच में कोई सुधीर को अगवा कर गया तो?' सेठानीजी ने रुआंसी होकर कहा।

‘तुम्हारी बात एकदम सही है' सेठ की नींद उड़ गई। ‘कुछ तो करना ही होगा। कल मैं अवश्य कुछ करूंगा।' दूसरे दिन सुबह सुबह ए.पी. साहब को फोन लगाया। सामने से उत्तर मिला, ‘अभी चुस्त बन्दोबस्त किया गया है, ताकि अब ऐसा कुछ भी नहीं होगा।' तथापि बालकों को उठा ले जाने के समाचारों में या अफवाओमें कोई कमी नहीं आई। इससे सेठ बहुत चिंता में रहने लगे। तो उनके मित्र सेठ नगीनादास ने सलाह दी- आप प्रो. कबीर से मिलिए वह अवश्य ही कोई उपचार करेंगे। तत्पश्चात सेठजी प्रो.कबीर से मिलने रूबरू गये। इस समय प्रो.कबीर अपनी प्रयोगशाला में किसी

प्रयोग में व्यस्त थे। तकरीबन आधे घंटे के बाद वे प्रयोगशाला से बाहर आए, तब सेठजी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

‘ओहो! सेठजी आप! सॉरी, आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी। पर सेठजी मैं एक महत्वपूर्ण प्रयोग में उलझा हुआ था। बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ।' इस पर सेठ जी ने बालकों को उठाने की घटनाओं का जिक्र छेड़ दिया। जब से ये शहर महानगर बनने लगे हैं तब से ऐसी घटनाएँ बढ़ने लगी हैं। परन्तु सेठ जी की बात को बीच में ही काटते हुए प्रो. कबीर बोले, ‘ओहो! तो आपको अपने पुत्रा की फिक्र हो रही है। ठीक हैं न?'

‘हाँ... हाँ... सही कहा आपने। आप मेरी मदद कीजिए' सेठ जी ने विनती के स्वर में कहा।

‘अवश्य... अवश्य... इस विषय में विज्ञान और तकनीकी क्या मदद कर सकते हैं, मैं अवश्य सोचूंगा।' और मन ही मन बड़बड़ाए - आजकल मैं ऐसे ही प्रयोग में व्यस्त हूँ। वैसे भी सायबरनेटिक ओर्गेनिज़्म मेरी रूचि का क्षेत्र है।

एक महीना गुजर गया, पर प्रो.कबीर की ओर से कोई समाचार नहीं। सेठ दम्पति की चिंता बढ़ती जा रही थी। ऐसे में एक सुबह सेठ जी के फोन की रिंग बज उठी। ‘हल्लो, मैं प्रो.कबीर' बीच में ही ‘बोलिए...बोलिए... मैं सेठ नरोत्तम लाल'

‘सेठ जी कल सुबह सुधीर को लेकर मेरी प्रयोग शाला पर आइए।' सुधीर के साथ सेठ पहुंचे। प्रो. कबीर ने स्वागत किया। फिर सेठ जी को प्रतीक्षाकक्ष में बिठा कर सुधीर को लेकर प्रयोगशाला में चले गये। जाते समय कहते गये कि आप तनिक भी चिंता न करें। सुधीर का बाल भी बांका नहीं होगा। लगभग आधे घंटे के बाद सुधीर को सकुशल लौटा देखकर सेठ ने चैन की सांस लीं। प्रोफेसर ने जादूगर की अदा में कहा, अब आप और सेठानी चैन की नींद सोइए, अब सुधीर का अपहरण कोई नहीं कर सकेगा।

‘क्या सचमुच....!!' ‘हाँ, सच में।'

सेठ के घर में चिंता के बादल छंट गये, खुशी का माहौल हो गया... सेठ और सुधीर के साथ एक छोटी सी मक्खी भी सेठ के घर पहुंची थी पर इस की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया और सब निश्चिन्त होकर रहने लगे।

एकायक एक दिन सुधीर विद्यालय से घर नहीं लौटा। सेठ सेठानी ने इसे ढूंढना शुरू किया। किन्तु कोई पता नहीं। रात को सुधीर के बदले एक फोन आया, ‘अब्बे नरोतम सेठ! बच्चे की जान प्यारी है तो एक करोड़ रूपये तैयार रख।' सेठ हल्लो... हल्लो करते रहे फोन कट हो गया। सेठानी बेटे के अपहरण के समाचार सुनते ही बेहोश हो गई। सभी उसकी सेवा में लग गये। दो घंटे बाद फोन की घंटी पुनः बजी। सेठ ने हेल्लो... हल्लो किया पर फोन मौन रहा। फिर भी सेठने हेल्लो... हेल्लो.. जारी रखा तो दूसरी और से आवाज आई, ‘अरे साल्ले कुत्ते की तरह क्यों भौंक रहा है? ले सुन तेरे बेटे की आवाज...पापा... पापा... मुझे बचाओ... ये लोग मुझे मार.....' और उसके हाथ से रिसीवर छूट गया। दूसरी ओर से अपहरणकर्ता गरजा, ‘सुना एक करोड़ लेकर आजा और अपने बच्चे को ले जा, और सुन यदि पुलिस को खबर की तो तेरे लाडले को काट कर टुकड़े करके पार्सल कर दूंगा।' सेठानी का रोना बिलखना शुरू हो गया। मैं तो बार-बार कह रही थी कि कमांडो रखो... कमांडो रखो.. मगर मेरी तो कोई सुनता ही नहीं... उस मास्टर कबीर के ही गुणगान गाते रहे... गाते रहे... हे भगवान मेरे लाडले की रक्षा करना।' सेठ परेशान तो थे... पर करते भी क्या? एक करोड़ का बन्दोबस्त करना ही होगा। मैंने प्रो.कबीर पर भरोसा करके ठीक नहीं किया। पर रुपये लेकर जाऊं कहाँ? साला पता भी तो बता नहीं रहा है..इस तरह बार-बार फोन आते रहे... और सेठ की व्यथा बढती रही... इसी समय प्रो.कबीर के कम्प्यूटर पर बीप... बीप का अलार्म बज उठा। उसने तुरंत कम्प्यूटर खोला तो बहुत बारीक दक्षिणी शिल्पकला का चित्र दिखाई दे रहा था। ये चित्रा मक्खी भेज रही थी। धीरे-धीरे कैमरा फोकस करता गया और चित्र भी स्पष्ट होते गये। प्रो.कबीर ने देखा, दो चार गुंडों के बीच सुधीर बैठा है। काफी डरा हुआ दीखता था। अब प्रो. कबीर को सुधीर के अपहरण की सारी घटना समझ में आ गई। बस, उन्होंने उसी क्षण एस.पी. साहब को फोन किया, तथा मामले की गंभीरता बताई। एस.पी. साहब प्रो.कबीर के घर पहुंचे। कम्प्यूटर पर चित्र देखकर लोकेशन तय करने लगे। लोकेशन तय होते ही सुधीर को आजाद करने की योजना पर विचार करने लगे। चंद मिनटों में खड़े होकर वह बोले, ‘अच्छा प्रो.कबीर! ‘ओपरेशन सुधीर' के लिए जाने की आज्ञा दें।' ‘ऑल ध बेस्ट!' प्रो.कबीर ने सफलता की कामना की।

चार कमांडों को लेकर लोकेशन पर पहुँच गए। पूर्व योजित योजना के अनुसार धावा बोलकर गुंडों को दबोच लिये तथा सुधीर को मुक्त करा लिया। गुडों की समझ में ही नहीं आया कि पुलिस इतनी जल्दी यहाँ तक कैसे पहुँच गई? एस.पी. सीधे पहुंचे प्रो.कबीर के घर। मक्खी सुधीर के साथ ही थी पर इस पर किसी का ध्यान नहीं था। तुरंत ही प्रो.कबीर ने सेठजी को फोन लगाया, दूसरी ओर से सेठ की रुआंसी आवाज आ रही थी। ‘हेल्लो... हेल्लो...' प्रोफेसर ने आवाज बदलकर कहा,

‘साल्ले! चिल्ला क्यों रहा है? पैसे लेकर आ नहीं रहा है। क्या बेटा प्यारा नहीं है?'

‘भाई, पैसे तो तैयार ही है किन्तु मैं आऊँ कहाँ?' मरियल सी आवाज सुनाई पड़ी।

‘तो सुन, ध्यान से सुन। यदि पुलिस को बताने की कोशिश भी की तो समझ अपना बेटा जान से गया।'' ‘हाँ भाई हाँ... अभी तक तो किसी को भी नहीं बताया है... और नहीं बताऊंगा। आप जल्दी से अपना ठिकाना बताइए।'

‘शाबाश! तो सुन, लक्ष्मी सदन, हेवन पार्क, तिलक गार्डन के पास, अहमदाबाद।' सेठजी यह पता सुनकर अवाक हो गये। अरे यह तो मेरे घर का ही पता है। वह सोच में पड़ गये कि क्या गुंडे मेरे घर की चौखट पर आ गये है? सेठ पैसे लेकर जैसे ही कमरे से बाहर निकले, घर का दरवाजा खोला, पापा... मम्मी... कहता हुआ सुधीर दौड़कर पापा के गले लिपट गया। सेठ ने देखा तो पीछे... प्रो.कबीर तथा एसपी. साहब खड़े खड़े मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। सर पर मंडरा रही मक्खी की ओर किसी का ध्यान नहीं था। घर में नन्द घर आनंद भयो। सेठानी अति भावविभोर होकर कहने लगी, आपका बहुत बहुत आभार... भगवान आपका भला करें... सेठजी प्रो.कबीर का आभार व्यक्त करने के लिए आगे बढ़े की प्रो.कबीर ने बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘सेठजी!! आभार के असली हकदार तो एस.पीसाहब हैं।' प्रोफेसर को बीच में ही रोकते हुए एस.पीसाहब कहने लगे, ‘नहीं बिलकुल नहीं। यदि प्रोफेसर साहब ने हमे गुंडों का सही सही पता न बताया होता तो हम अब तक व्यर्थ में ही घूमते रहते। अतः वास्तव में आभार के सही हकदार तो प्रोफेसर साहब ही हैं। प्रोफेसर साहब के पास गुंडों का पता ठिकाना!!! सेठजी के मन में तरह तरह के विचार आने लगे। सेठजी के मन में उठी आशंका को समझ प्रोफेसर ने तुरंत हकीकत स्पष्ट करते हुए कहा, ‘आभार का हकदार तो मक्खी ही हैं।' सुधीर के सर पर मंडरा रही मक्खी की ओर संकेत कर कहा। मक्खी!!!? सभी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।

‘हां, मक्खी!! यह कोई सामान्य मक्खी नहीं है। इसी ने मुझे गुंडों का स्थान बताया था। यह मक्खी तो सायबर मक्खी है, अर्थात सायबर प्राणी है। इसका आधा शरीर कीट है, तथा बाकी आधा शरीर मशीन है। वह रिमोट कंट्रोल से जासूसी का काम करती है।

‘ओहो! अद्भुत!! आपका विज्ञान अनूठा है' अब तक विज्ञान को तथा प्रोफेसर को कोसनेवाली यह महिला अब विज्ञान तथा प्रो.कबीर के गुणगान गाने लगी। उधर सेठजी, अत्यंत विस्मित होकर बुत बनकर खड़े थे। उन्हें जागृत करते हुए सेठानी जी ने तनिक ऊँची आवाज में कहा, ‘रुपयों की बैग लिए इस तरह खड़े होकर किसका मुँह देख रहे हो? प्रोफेसर महोदय को दे दीजिए। ये रकम उनके शोध कार्य में उपयोगी होगी।

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ई.मेल ः rrandhariya@gmail.com

(विज्ञान कथा अक्तूबर – दिसंबर 2017 से साभार)

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