गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

व्यंग्य // आह ताज वाह ताज // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

ज़ाहिर है, यहाँ मैं जिस “ताज” की बात कर रहा हूँ वह बादशाहों द्वारा अपने सर पर लगाने वाला ताज, यानी मुकुट, नहीं है, यह तो शाब्दिक रूप से ताज-महल का संक्षिप्त भर है। ताजमहल कहें या ताज, बात एक ही है।

चाय का एक ब्रांड है, ‘ताज’। सुबह की चाय हो और चाय के साथ किसी न किसी विषय पर चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। आजकल ताज की चर्चा गरम है सो लोग सुबह सुबह ताज की चुस्कियां लेते हुए ताज की चर्चा में जुट जाते हैं। बेमतलब की चर्चा होती है तो मज़ा आता है। लोग उसमें मतलब ढूँढ़ने लगते हैं। और फिर चाय तो वैसे भी ताज़ा करने के लिए ही पी जाती है। विद्वानों, राजनेताओं, और बुद्धजीवियों को बहस के लिए कुछ मिलना भर चाहिए, बस ले उड़ते हैं।

ताजमहल, जैसा की हम सभी जानते हैं मुमताजमहल का मकबरा है जिसे उसके शौहर शाहजहाँ ने उसकी मौत के बाद बनवाया था - ताकि सनद रहे और याद रहे। शाहजहां तो जीते जी अपना भी एक ऐसा ही संगमरमर के काले पत्थरों का मकबरा बनवाना चाहता था। लेकिन ऐसा वह कर नहीं पाया। उसके बेटे ने उसे कैद कर लिया और मरने के बाद उसे मुमताज़ के बगल में ही दफना दिया गया। ताजमहल इस तरह शाहजहां और मुमताज़ के अमर प्रेम का प्रतीक बन गया। मकबरा तो यह है ही।

ताजमहल कोई पूजा स्थल नहीं है। वह मकबरा है। ताजमहल में घुसते ही आपको लिखा मिलेगा, “हे आत्मा, तू ईश्वर के पास विश्राम कर। ईश्वर के पास शान्ति से रह और उसकी शान्ति तुझपर बरसे।” कोई ऐसा नहीं मानता की ताज पूजा स्थल है। लेकिन बहस के लिए कोई मुद्दा तो चाहिए न ! सो लोग चिल्ला चिल्ला के बताने लगे की ताजमहल मकबरा है मकबरा, मंदिर नहीं है। यहाँ किसी की पूजा-वूजा नहीं होती। लेकिन मज़े की बात यह है कि यह किसने कहा कि ताज पूजा-स्थल है, आजतक पता ही नहीं चला।

एक और मुद्दा उठा। ताज मुहब्बत की निशानी है और बेशक मकबरा भी है। दोनों बातों को बाकायदा जोड़ दिया गया। कहा गया, ताजमहल मुहब्बत का मकबरा है। जवाब में बाहें चढ़ा ली गईं। पलटवार किया गया। जो मुहब्बत जानते ही नहीं और नफ़रत फैलाते हैं, वे मुहब्बत की बात भला क्या समझेंगे। वे तो ताज से नफ़रत ही करेंगे ! और यहीं तक रुका नहीं गया। जो नफ़रत करता है, कुछ भी कर सकता है। आशंका व्यक्त की गई, ताजमहल नष्ट किया जा सकता है, उसे डायनामाइट से उड़ा दिया जाएगा !!

ताजमहल एक अत्यंत सुन्दर, भव्य और अतुलनीय इमारत है। विश्वास ही नहीं होता कि उस ज़माने में जब भवन निर्माण की तकनीक बहुत विकसित भी नहीं थी, इसे कैसे बनाया गया होगा। जाली के मेहराब, जाली का ब्योरा महीन नक्काशी, जड़ाऊ पच्चीकारी, गुम्बद, छतरियां, किरीट कलश, मीनारें, कैसे संभव हो पाई होंगीं ? वैसे कारीगर आज तक नहीं मिले जो इतने कमाल का काम कर सकें। सो बात उड़ा दी गयी कि शाहजहाँ ने ताज बनानेवाले कारीगरों के हाथ ही कटवा दिए। इसका कभी कोई प्रमाण नहीं मिला। ज़ुल्म तो बेशक शाहजहाँ ने कई किए होंगे लेकिन वह अपने ही कारीगरों के हाथ कटवा दे, बात कुछ हज़म नहीं होती। अरे भई, वह तो एक ऐसा ही ताजमहल अपने लिए भी बनवाना चाहता था, तो वह कारीगरों के हाथ क्यों कटवाता ? लेकिन खामखां की बहस के लिए ऐसी बातें बदी मुफीद होती हैं। बहस चालू रहना चाहिए।

ताजमहल, जैसा की हम सभी जानते हैं, एक विश्व प्रसिद्ध इमारत है। आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों में इसे प्रथम स्थान मिला हुआ है। और यह चुनाव विश्वव्यापी मतदान से हुआ है। ताज को प्रथम स्थान पर रखने के लिए दस करोड़ मत प्राप्त हुए थे। दस से चालीस लाख पर्यटकों को हर साल ताजमहल भारत खींच लाता है। एक ज़माना था ताजमहल की स्थिति राजस्थान में बताई जाती थी। और तब भी लोग उसे देखने आगरा ही आते थे। भूल-सुधार करने के बाद इसे उत्तरप्रदेश में बताया जाने लगा। पर पर्यटकों को राजस्थान या उत्तर प्रदेश से कभी कोई मतलब नहीं रहा। उनका उद्देश्य तो ताजमहल देखना ही रहा। ऐसे ताजमहल का नाम उत्तरप्रदेश की पर्यटन की लिस्ट से हटा देने का क्या मतलब है ? क्या इससे लोगों का ताजमहल देखने भारत में आना बंद हो जाएगा ? ऐसा असंभव है, और शायद ‘इसीलिए’ ताज को लिस्ट से हटाया गया हो ! समझा करो जानम ! अरे लिस्ट में वह हो, न हो, लोग तो उसे देखने आवेंगे ही। ताजमहल का लिस्ट में होना कोई मायने ही नहीं रखता। और जब लिस्ट में होने न होने के कोई मायने ही नहीं हैं तो उसे बिलावजह लिस्ट में रखा ही क्यों जाए ? है न समझदारी की बात !

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद –२२१००१

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