व्यंग्य // आतिशबाजी कभी ख़त्म नहीं होती // डा. सुरेन्द्र वर्मा

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अक्टूबर का महीना आतिशबाजी के लिए एक मिला-जुला माह रहा। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में दीवावली के मौके पर आतिशबाजी का सामान बेंचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। ज़ाहिर है, यह सिर्फ बेंचने पर ही बैन था, पटाखे छुटाने पर नहीं। सो यार लोगों ने मांग कर, चुरा कर, (खरीद कर नहीं) आतिशबाजी का प्रबंध किया और पटाखे बेशक छुटाए गए। बेंच तो सकते नहीं थे सो कुछ उदार दूकानदारों ने अपने परिचितों को उपहार स्वरूप पटाखे बाँट दिए। फिर भी दीवाली को देखते हुए दिल्ली में पटाखे कम ही छूटे। दिल्ली के मन में थोड़ी हाय रह गई। सो भरपाई के लिए दिल्लीवालों ने इस बार मौखिक आतिशबाजी खूब की। सरकार को निशाना बनाकर फुलझड़ियाँ छोडी गईं, चिढा-चिढा कर स्वादिष्ट अनारों का भरपूर सेवन किया गया, रोकेट उड़ाकर आदेशों की धज्जियां कर देने की कोशिशें में कोई कमी नहीं रखी। बहरहाल जितना जो कर सकता था उसने किया। व्यंग्यकारों की बन आई। खूब व्यंग्य-बाण छोड़े गए। पर कुछ न हुआ। सारी फुलझाड़ियाँ, और सारे बम फुस हो गए। सरकार तो सरकार।

दिल्ली की गूँज अन्य शहरों में भी खूब सुनी गई। यहाँ आतिशबाजी का सामान बेंचने पर प्रतिबन्ध नहीं था, और हमारे वाचाल मुल्क में मौखिक आतिशबाजी की तो कभी कमी रही ही नहीं। प्रतिभाशाली रचनाकारों ने मौखिक आतिशबाजी को बम-फटाकों से जोड़ दिया। फिर क्या था, नए उत्तेजक नामों से आतिशबाजी के सामान की खूब बिक्री हुई। ‘नोटबंदी फुलझाड़ियों’ से बाज़ार पट गया। इसके बारे में दावा किया गया कि यह ये फुलझड़ी एक बार अगर चल गई तो ख़त्म ही नहीं होती। बेशक यह एक अतिशयोक्ति ही है, लेकिन इसमें जो सच्चाई छिपी है भला उससे कौन इनकार कर सकता है ? इसी तरह एक पटाखे का नाम “जीएसटी पटाखा” रखा गया। यह भी खूब बिका। इसके तो फुस होने की आवाज़ तक इतनी पटाखा थी कि सरकार तक हिल गई। व्यापारियों को खूब मज़ा आया। लेकिन सरकार तो सरकार। नोट-बंदी और जी-एस-टी फुलझड़ियाँ और पटाखे आम जनता को निश्चित ही बहुत मंहगे तो पड़े लेकिन अच्छे दिन की उम्मीद में जनता इन्हें छोड़ती रही, भुगतती रही। मैंने भी गलती से अपनी भाभीजी को किसी दुर्बल क्षण में सिर्फ पटाखा न कहकर जीएसटी पटाखा कह दिया। बहुत मंहगा पडा।

सरकार तो सरकार ठहरी। वह बाहरी बम-पटाखों को फुस करने का काम भी करती रही और अपना काम भी करती रही। लेकिन सरकार के बाहर जो मरणासन्न दल हैं, वे ताल ठोंक ठोंक कर बम पटाखे छोड़ते रहे। जीएसटी उनके लिए “गब्बर सिंह टैक्स” बन गया। वे भूल गए कि इस गब्बर सिंह से मुकाबला तो उन्हें ही करना है ! लेकिन बम छुटा कर पप्पू खुश हुआ।

दीपावली हर साल आएगी। हर साल आतिशबाजी होगी। लेकिन पुराने अच्छे दिन (गुड ओल्ड डेज़) फिर नहीं आवेंगे। हम अच्छे दिनों का इंतज़ार ही करते रहेंगे। ‘इक वो भी दिवाली थी, इक ये भी दिवाली है’ गाकर हर साल दीवाली मनाएंगे। आमीन।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

1 टिप्पणी "व्यंग्य // आतिशबाजी कभी ख़त्म नहीं होती // डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. आखिरकार आपने आपके लेख के जरिये दिवाली माना ही ली। क्या ख़ूब पटाखे छुड़ाए। मन व तन रोशन हो गया। आप ही सरकार है। सरकार तो सरकार है। खैर दिवाली की देर से ही सही, बधाई और नए साल की मुबारकबादी स्वीकार करें।

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