मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

व्यंग्य // मेरे मित्र का पद्मश्री दर्द... // सूर्यकांत मिश्रा

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भारत सरकार द्वारा नागरिकों को दिये जाने वाले अवार्ड्स में पद्मश्री का चौथा नंबर है। यह अवार्ड भारतीय नागरिकों को दिया जाता है। इसे प्रदान करने से पूर्व सरकार द्वारा गठित कमेटी इसे ग्रहण करने वालों में कला से लेकर शिक्षा, उद्योग, साहित्य, विज्ञान, खेल, चिकित्सा और समाजसेवा जैसे योगदान पर नजर रखती है। इसे हमारे देश की सरकार ने सबसे पहले 1954 में प्रदान किया था। अब तक लगभग 2350 से अधिक लोगों को यह सम्मान प्राप्त हो चुका है। इसे प्राप्त करने के बाद छाती चौड़ी होना सामान्य बात है और साथ ही जिसे यह सम्मान मिला है, उससे खुद की तुलना करते हुए सम्मान के लायक समझने वालों की भी संख्या में कम नहीं है। पद्मश्री अवार्ड पाने की लालसा रखते हुए सपना देखने और राजनीति के क्षेत्र में दबदबा रखने वालों सहित मीडिया में खुद के प्रचार प्रसार के लिए हर संभव प्रयास करने वाले अवसरवादी और चापलूसों की करतूत भी आम नागरिकों के बीच आना नई बात नहीं है। चाहे दुनिया कुछ कहे, खुद कुछ करें या न करे, अपने आपको मसीहा की श्रेणी में रखते हुए पद्मश्री का तमगा गले में लटकाने कई गर्दनें बार बार झुकती देखी जा रही है।

कला, शिक्षा, उद्योग, साहित्य, विज्ञान, खेल चिकित्सा एवं समाजसेवा से दूर दूर तक नाता न रखने वाले मेरे एक या यूं कहूं मेरे अपने मित्र का पागलपन को पूरा शहर और जिला देख ही रहा है। कभी साहित्य की चकाचौंध में खुद को पूर्णिमा का चांद सिद्ध करने की कोशिश तो कभी समाजसेवी का ढोंग, फल और चंद पुस्तकों के वितरण द्वारा प्रदर्शित करना लोगों की सस्ती लोकप्रियता में शामिल हो चुका है। कभी ग्रामीण क्षेत्रों में चार दबे कुचले बच्चों के बीच खड़े होकर उन्हें वस्त्र प्रदान करना, या फिर वृद्धाश्रम से लेकर हॉस्पिटल में दवाई बांट आना भी पद्मश्री की कतार के लिए पर्याप्त आधार माना जाने लगा है। अपने कक्षाओं में जाकर अध्यापन कार्य न करना और महानगरों में पहुंचकर मातृभाषा से लेकर देशभक्ति का ढिंढोरा पिटते हुए फोटो सेशन कराना, फिर समाचार पत्रों की सुर्खियां बनना भी पद्मश्री के लिए लालायित लोगों की व्यस्तता में सम्मिलित देखा जा रहा है। यह कोई छोटा सम्मान नहीं बल्कि छाती चौड़ी करने वाला तमगा कहा जा सकता है। हमारे एक मित्र ने भी ऐसी कोशिश शुरू की है, कि उनके शर्ट के बटन टूटे, इसके लिए उन्होंने अपने आसपास ऐसा वातावरण बनाना शुरू किया है, कि लोगों की नजर उनके कामों पर पड़े।

विगत कई वर्षों से मेरे उस मित्र ने बड़े बड़े मंचों से लच्छेदार शब्दों के बाण छोड़ने शुरू कर दिये है। इन शब्दों में उन्होंने खुद को बहुत बड़ा समाजसेवी और प्राणी प्रिय चरित्र वाला निरूरित किया है। जब उन्हें पता चला कि मेरे अपने शहर में भी पद्मश्री का पर्दापण हो चुका है, तो उनका हृदय भी उसे पाने के लिए तड़प उठा। उन्होंने बच्चों को कभी एक पेंसिल कभी तो उसे पूरे स्कूल में शैक्षणिक सामग्री के निःशुल्क वितरण के रूप में प्रचारित किया। फोटो खींचवाकर और समाचार पत्रों की सुर्खियां भी बनाई। उन्हें पत्रकार साथियों ने बाकायदा प्रचारित करने में सहयोग भी किया। शायद इतने से बात न बनती देख उनका मन और अधिक विचलित हो उठा और उन्होंने शहर से बाहर यहां तक की दीगर प्रांतों में जाकर नामी गिरामी महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के साथ फोटो सेशन कराकर उसे अन्य रूप में प्रसारित किया ताकि लोग उन्हें शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने के क्षेत्र में पहचान सके। सामान्य से खास लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने मातृभाषा हिंदी के बड़े सेवक के रूप में भी खुद की प्रतिष्ठा बनानी चाही, किंतु यहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया। सरकार के किसी भी नुमाइंदे ने पद्मश्री के लिए उनका नाम अब तक आगे नहीं बढ़ाया है।

अपने मित्र की व्याकुलता और पद्मश्री की उनका मोह देखकर मुझे ऐसा लगने लगा कि मुझे अपना मित्र होने का कर्तव्य निभाना चाहिए। चूंकि मैं भी पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हुआ शख्स हुआ इसलिए मैंने अपना अंशदान करते हुए उनके हर प्रकार के दिखावटी तामझाम को फोटो और आकर्षण के साथ समाचार पत्र के उस स्थान पर लगाने का प्रयास किया, जिससे हर पाठक की नजर उस पर अवश्य पड़े। अब तो मुझे भी इंतजार है कि मेरे मित्र के गले में पद्मश्री का तमगा लटके हुए देखू। मन में यह दुविधा भी है कि इतना बड़ा सम्मान पाने के बाद वह कहीं मुझे ही न भुल जाये, किंतु जो भी हो मैं दिल से चाहता हूं कि मेरा मित्र पद्मश्री पाकर अपना सपना पूरा कर सके। साथ ही उसके चेहरे पर बढ़ती व्याकुलता से होने वाला शारीरिक नुकसान भी रूके सके।


(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

sk201642@gmail.com

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