गुरुवार, 9 नवंबर 2017

14 नवंबर बाल दिवस पर विशेष // बच्चों में आर्थिक अनुशासन समय की जरूरत // डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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० बच्चों के निर्माण में परिवार का वातावरण रखता है महत्व

मानवीय जीवन में मनुष्य का बचपन पूरे जीवनकाल में सबसे महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। बचपन उस स्वच्छ दर्पण की भांति है, जिसमें झूठ और फरेब की कोई गुंजाइश नहीं होती। कहने का तात्पर्य यह कि एक बच्चे की बपचन की बाल सुलभ शरारत इस ओर इशारा कर जाती है कि बच्चे की भविष्य किस दिशा में संवारा जा सकता है। उसके भावी व्यक्तित्व की झलक बचपन रूपी दर्पण में दिख जाता है। जरूरत यह कि हम उसे बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से मूल्यांकित कर सही दिशा में उसके मार्गदर्शन करें। महापुरूषों की जीविनियां हमें बताती है कि किस तरह उनका जीवन बचपन में अनुशासित, सुसंस्कृत और और आत्म सम्मान से भरा हुआ था। यही बाल्यावस्था की पारिवारिक सुव्यवस्था ने उन्हें महापुरूष के मंच तक पहुंचा दिया। इसके ठीक विपरीत अपराध की दुनिया से गहन रिश्ता रखने वालों के प्रारंभिक दिनों की कहानियां बताती है कि कैसे उनका बचपन कुंठा और उपेक्षा के साये में बीता। इस बात से नकारा नहीं जा सकता है कि बच्चे ही भावी समाज की नींव हुआ करते है। हम उस नींव को जिस प्रकार से तैयार करेंगे, उस पर खड़ा किया गया महल अपनी उम्र की कहानी स्वतः ही कहता दिखेगा। बहुत कमजोर नींव पर दीर्घकालीन निर्माण की कल्पना दिवा स्वप्न ही हो सकती है।

आर्थिक अनुशासन की चिंता भी जरूरी

प्रायः बच्चे माता-पिता की जवाबदारी के बीच आर्थिक अनुशासन की शिक्षा के विमुख रह जाते है। इसका मुख्य कारण यह है कि हम बच्चों की जरूरत को पूरा करने के बाद उन्हें इस बात की जानकारी देना उचित नहीं समझते कि वास्तव में उस जरूरत को पूरा करने के लिए कितने रूपये खर्च किये गये है। यदि हम उन्हें इस बात की जानकारी दे और अपना मानसिक बजट उनके सामने रखे तो मैं समझता हूं कि बच्चे के अंदर पनप रही गैर जरूरी आवश्यकताएं रोकी जा सकती है। मैं इस बात का प्रबल समर्थक हूं कि बच्चों की मांग पूरी की जानी चाहिए, किंतु अनेक अवसरों पर की जाने वाली मांग या तो वक्त के अनुसार उचित नहीं होती है, या फिर उन्हें कुछ दिनों के लिए प्राथमिकता सूची के क्रम में टाला जा सकता है। इसे हम जब तक बच्चों के साथ साझा नहीं करेंगे तब तक बच्चे वास्तविकत अर्थ तंत्र को नहीं समझ पायेंगे। इस प्रकार की शिक्षा का एक ही उद्देश्य है कि बच्चे फिजूल खर्ची के अवगुण से बचाये जा सके। पारिवारिक जरूरतों को समझे और समय के अनुसार उचित और अनुचित खरीदारी को बेहतर रूप से जान सकें। यह शिक्षा बच्चों को तब दी जानी चाहिए, जब वह 15 वर्ष की उम्र से गुजरते हुए अपनी वयस्कता वाली उम्र की ओर अग्रसर हो रहे हो। कोमलमन या बालपन कही जाने वाली उम्र में ऐसा कदापि न करे।

बच्चों के लिए परिवार प्रयोगशाला से कम नहीं

जिस तरह वैज्ञानिक प्रयोगशाला में अनुसंधान करते समय सतर्कता बरतते है कि किसी भी चीज का मिश्रण सही अनुपात से नहीं हुआ तो परीक्षण अथवा नवनिर्माण असफल हो सकता है। ठीक उसी तरह परिवार में बच्चों की देखभाल उचित वातावरण और अनुशासन में न की गई तो भविष्य का नागरिक पुष्ट होने से पहले ही अंधेरे में खो सकता है। इस संदर्भ में परिवार ही वह पाठशाला है, जहां बच्चा जो सीखता है, वही उसके संस्कार बन जाते है। बच्चों के नवनिर्माण में हम उसे एक पेड़ की कोमल डाली से संयोजित कर सकते है, जिसे शुरूआती कोपलों के साथ किसी भी दिशा में घुमाया जा सकता है, अथवा आकार दिया जा सकता है। ठीक उसी तरह हम उन्हें कुम्हार की मिट्टी से भी तुलना कर सकते है, जिससे कुम्हार अपनी इच्छानुसार रूप प्रदान करता आ रहा है। बच्चों के विकासक्रम में परिवार ही प्रयोगशाला होता है और बच्चे को जन्म देने वाली उसकी मां उस प्रयोगशाला की मालिक। बच्चे की मां ही वह प्रधान उपकरण मानी जा सकती है जो किसी भी प्रयोग को सही दिशा में ले जाने का काम करते है। वही बच्चे के साथ सर्वाधिक समय गुजारती है। उसके बाल मनोविज्ञान को वही बेहतर समझ सकती है। यदि बच्चे की इस पारिवारिक प्रयोगशाला में सुसंस्कृत एवं सभ्य तथा आत्म-सम्मानी बच्चों का निर्माण करना हो तो उन्हीं के अनुरूप प्रयत्न एवं प्रयोग के तरीके उपयोग में लाने होंगे। पालने से लेकर ठीक ढंग से होश संभालने तक एक बालक अपनी माता के ही संरक्षण में रहता है। यदि जिम्मेदार माता द्वारा उसकी उचित देखभाल की जाये तो ऐसा कोई कारण नहीं की वह बच्चा महामानवों की श्रेणी में अपना स्थान सुरक्षित न कर सके।

धार्मिक भावनाओं का समावेश भी पारिवारिक सदस्यों की जिम्मेदारी

बच्चों के कोमलमन में धार्मिक भावनाओं का बीजारोपण करना भी पारिवारिक जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाना चाहिए। इस प्रकार की भावनाएं एक उम्र के बाद किसी भी युवक को नहीं सिखायी जा सकती है। इसलिए उस उम्र में जब वे अपने माता-पिता और अन्य सदस्यों के दिशा निर्देश को अकाट्य मानते है, उस वक्त इसका महत्व समझाया जाना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है वे अपने धर्म के मूल्य को समझ सके। ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास यहीं से जन्म लेना शुरू करता है। इस प्रकार की भावना जब बच्चे के मन में पनपने लगती है तो यह निश्चित मान लेना चाहिए कि वे बड़े होकर अनीतिगामी नहीं होंगे और समाज में एक अच्छा स्थान बना पायेंगे। आदर, सम्मान और शिष्टाचार की बातें भी धार्मिक भावनाओं के साथ प्रस्पुटित होने लगती है। हमारी अपनी भारतीय परंपरा में अपने से बड़ों के चरण स्पर्श की परंपरा है। यही हमारे अभिवादन का तरीका है। परिवार में अन्य सदस्यों से इसी तरह के संस्कारों को देख-देखकर एक छोटा बच्चा इसे अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानकर अपने व्यवहार में शामिल कर लेता है। धार्मिकता के साथ ही बच्चों को सादगी और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की शिक्षा भी परिवार में अवसरों को तलाशते हुए दी जानी चाहिए। बच्चों के साथ पर्यटन स्थल का आनंद लेते हुए उन्हें दार्शनिक और प्राकृतिक स्थल के प्रति प्रेम भावना से भी अवगत कराया जाना चाहिए, ताकि प्रकृति का सम्मान बच्चों के हृदय में स्थापित हो सके।

जहां तक मैं समझता हूं कि परिवार तथा माता-पिता यदि बच्चे की बढ़ती उम्र से ही उसकी हर क्रिया कलाप पर ध्यान रखें तो बच्चों की बहुमुखी प्रतिभा को विकसित होने से नहीं रोका जा सकता है। ऐसी स्थिति में सुसंस्कारित, आत्म विश्वास, स्वाभिमानी, निडर तथा आत्मनिर्भर बनकर समाज का आधार स्तंभ सिद्ध हो सकते है।

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

sk201642@gmail.com

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