सप्ताह की कविताएँ - नवंबर 2017

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सुशील शर्मा अगर लिख सको तो मीरा जैसी लगन लिखो तुम राधा सा मिलना लिखना। सीता का परित्याग लिखो तुम जीवन का जलना लिखना। कैकई का संताप लिख...

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सुशील शर्मा

अगर लिख सको तो

मीरा जैसी लगन लिखो तुम
राधा सा मिलना लिखना।
सीता का परित्याग लिखो तुम
जीवन का जलना लिखना।

कैकई का संताप लिखो गर
उर्मिल का तपना लिखना।
द्रौपदी की व्यथा लिखो तो
सावित्री का निश्चय लिखना।

परशुराम का परशु लिखो तो
अर्जुन का गांडीव लिखना।
चक्र सुदर्शन अगर लिखो तो
पहिया अभिमन्यु का लिखना।

राजे शिवा का छत्र लिखो तो।
प्रताप का तुम चेतक लिखना।
पुरु का गर पौरुष गाओ तो।
शब्द भेद पृथ्वी का लिखना।

गर आज़ाद को लिखना चाहो
भगतसिंह की फांसी लिखना।
बिस्मिल को गर याद करो तो।
प्रिय सुभाष को भी लिखना।

याद आयें गर बेबस बापू
जिन्ना की जिद को लिखना।
शास्त्री की शुचिता को लिख कर।
वो पटेल के तेवर लिखना।

आज़ादी की बात करो गर।
सन सैंतालीस को लिखना।
भारत को लिखना चाहो तो
गांवों की रचना लिखना।


---.

मेरी चाहत

मेरी चाहत है।
एक पत्थर उछाल कर।
आसमान में सुराख कर दूं।
ताकि उस सुराख से
एक गूंज जाए
उस ईश्वर तक
जो हम सबके अंदर है
और वो सुने
उन चीखों को
जो गिद्धों के नोचने पर
मासूम ग़लों को फाड़ती है।
ताकि वो उस छेद से देख सके
कि उसकी बनाई सृष्टि में
कितनी गैरबराबरी हैं।
कितने लोग सिसक कर
रात को बांह के तकिए भिगोते है।
कितने मासूम बच्चे सो जाते है।
चांद को रोटी समझ कर।
उसके बनाये जंगल किस तरह
ले रहे है अपनी अंतिम सांसें।
किस तरह नदियां डूबती जा रही है।
रेत के समंदर में।
और वो जंगली जीव जो
कभी थे इस धरा की शान।
अब सिर्फ किताबों में बचे हैं
किस तरह देश बंधक बनाए हुए है।
नागरिकों के अधिकारों को।
उसकी स्नेह मयी पृथ्वी।
परमाणु हथियारों की आग से
तप्त होकर तैयार है विस्फोट के लिए।
मैं चाहता हूँ कि एक पत्थर उछालूं।
ताकि अपने मन के अंदर बैठे
उस ईश्वर को जगा सकूं।
जो मेरा होकर भी मुझ से
कभी नहीं मिला है।
---.

छन्द-लीला
विधान-चार चरण सम तुकांत प्रत्येक में 12 मात्रा अंत में गुरु लघु)

सुशील शर्मा

जब से प्रभु लगन संग,
           मन हर्षित तन तरंग।
जीवन के अजब ढंग,
           प्रभु दर्शन की उमंग।


भक्ति हरष मन समात,
            प्रभु दरस की है बात।
प्रेम मगन हुलस जात,
            हरि प्रताप पात पात।

मन को कर तू दर्पण,
         वासना का समर्पण।
जाप व्रतों से तर्पण,
          प्रभु प्रणाम सब अर्पण।
---.

मैं कौन हूँ ?


मैं कौन हूँ ?
एक आत्यंतिक प्रश्न
अज्ञेय से ज्ञेय तक
सृष्टि निर्माण से ही गूंजता है।
बाहर के भूताकाश से लेकर
अंदर के चिदाकाश तक।
चेतना की शून्यता से लेकर।
ज्वलंत ऊर्जा तक।
यह यक्ष प्रश्न तैरता है।
अनुप्रस्थ से क्षैतिज
अनुलम्ब से ऊर्ध्वाधर
अतल गहराई से असीम ऊंचाई तक।
मैं कौन हूँ ? का उत्तर
मैं "पर जाकर रुक जाता है।
"कौन हूँ" रहा है हमेशा अनुत्तरित।
स्व "हमेशा अज्ञेय रहा है।
"स्व " "मैं" के रूप में अवस्थित रहा।
"स्व "कौन ? एक पहुंचा ही नहीं।
"मैं" में समाहित हमारा "स्व"
आज भी "कौन हूँ " को ढूंढ रहा है।
जब "मैं" होगा तिरोहित तभी
"स्व" को "कौन हूँ " का उत्तर मिलेगा।
तब स्वधार चैतन्य का परिचय
ज्ञेय होकर बनेगा "कौन हूँ " का उत्तर।
  "स्व "के अस्तित्व से अनभिज्ञ
सब कुछ होता है संयोग
जन्म ,जीवन ,मृत्यु।
स्व "के अस्तित्व से विज्ञ
कौन हूँ " की पहचान है।
उसके लिए
विशिष्ट है जन्म।
विशद है ये जीवन।
और मृत्यु उत्सव है।
जब भी "मैं " के अंदर झाँका
तो देखा शून्य है।
घबराकर उस शून्य से जब
बाहर आया तो
सारे संसार को भर लिया अपने अंदर।
बाहर भी संसार अंदर भी संसार
"कौन हूँ "हमेशा रहा अनुत्तरित।
और मौत ने धकेल दिया
फिर उसी शून्य में
जिससे "मैं "हमेशा डरता है। 
"मैं" के अंदर शून्य है
"मैं" में समाहित ज्ञान ,विज्ञान
धर्म ,मीमांसा ,तत्व,ब्रह्माण्ड
जब सब तिरोहित होंगे।
तब उदय होगा "स्व "
जिसका न नाम हैं न धर्म है और न जाति।
जो न शरीर हैं न कोई प्रजाति।
जिसकी न कोई अवस्था है न नाश है।
जिसकी न कोई वृद्धि है न विनाश है।
जिसमें न मन है न चित्त है।
जिसमें न बुद्धि है न वित्त है।
जिसका न अतीत है ,न वर्तमान।
जो न कभी खोया है न कभी विद्यमान।
जिसका स्वरुप निर्विकार परमात्मा है।
वह " कौन हूँ ?"चिदानंद  शुद्ध आत्मा है ।
--.

दोहा बन गए दीप -3

साहित्यिक सार
भाषा संस्कृति समाज ,इन तीनों की बात।
जो अपने मन से करे ,वह साहित्य समात।

मानवीय संबंधों का संवेदन आधार।
कालजयी साहित्य में समकालीन विचार।

जीवन की आलोचना ,जन आचार विहार
सृजनात्मक लेखन लिखे व्यापक दृष्टि विचार।

कुछ नाटक कुछ गल्प हैं कुछ हैं कविता रूप।
उपन्यास अरु लघु कथा ,लेख निबंध स्वरुप।

जीवन सत्य को जो कहे ,वह साहित्य प्रमाण।
अनुभूति अनुप्राणित हों जन साहित्य निर्माण।

सौंदर्य भरा सृजन हो ,चिंतन उच्च विचार।
जीवन की सच्चाईंयाँ स्वतंत्रता आधार।

आत्माभिव्यक्ति ही बने ,लेखन का आधार।
जन मानस की वेदना बने साहित्यिक सार।

काव्य और साहित्य का ,हो एकमेव उद्देश्य।
संवेदन जन चेतना ,प्रतिबद्धता उपदेश्य। 

मन को आंदोलित करे ,सत्य का हो प्रतिरूप।
शिव सुन्दर को जो लिखे ,वह साहित्य सरूप।

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राजकुमार यादव

सोचता हूं कि एक बार को अपने गांव जाता,
कितने दिन हुए मुझे गए
कितना बदल गया होगा मेरा गांव
काश! मुझे वहाँ अभी भी वैसा महसूस होता
जैसा मैं छोड़कर आया था
बिल्कुल शांतिमय पुरवाई ओढ़े मेरा गांव
पल दो पल बैठ जाता मैं
बूढ़े पीपल के छांव में.

मुझे याद है जब मैं छोटा था
तब कैसे पीपल का पेड़ बुलाता था.
दूर-दूर तक फैली उसकी जड़े,
और दूर-दूर तक फैले उसके शाखाएं.
आते जाते राहियों को रूक कर विश्राम करने को
                           मजबूर कर देता था.

पीपल के बगल का कुआँ,
और उसकी चिकनी,सपाट चबूतरा
तरस जाता हूँ पीने के लिए उसका मीठा पानी.

अभी भी मेरे कान सुनना चाहते हैं कोयल और बुलबुल के तराने,.

हू-ब-हू मेरे माँ के सरीखा था मेरा गांव
          और अपने वहाँ के लोग,
मेरे आँखों पे नाचते हैं वे चेहरे जो प्रेमपूर्वक
                        मेरे कपाल को चूमते थे.

जरूर जाऊँगा उस मिट्टी में जहाँ
                मेरा बचपन खेला है
एक वापसी होगी मेरी अपने अतीत में
   कुछ उम्मीदों ,और सपनों के साथ.


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सुनील संवेदी

शीर्षक
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रिश्तों को
समझने एवं निभाने का
व्याकरण विकसित करके
बनने तो लगे... पुस्तक।
लेकिन-
खोज सकोगे वह अलमारी
जिसमें सज सको।
ढूंढ सकोगे वे अंगुलियां
जिनके स्पर्श से फड़फड़ा सको।
वे आंखें
जिनमें बस के रोशन हो सको।

रिश्तों के समीकरणों को
हल करते-करते
कई बार बन जाओगे
समीकरण खुद ही।
मूंद लेना आंखें।
बैठ जाना
सिर घुटनों के बीच फंसाकर।
कोई नहीं आएगा
तुम्हें सुलझाने।

रिश्तों की सुनते-सुनते
कई बार हो जाओगे, बहरे
ऐसे, जिसे अपनी ही आवाज
सुनाई नहीं पड़ती।
हो जाओगे गूंगे
ऐसे, जैसे की बोलना आया ही न हो।
तड़पना चाहे तो
तड़पने देना हृदय को
तुम रोक ही नहीं सकते।

मां पूछेगी
एक बार, दो बार, कई बार
पी-
व्याकुल हिरनी के मानिंद
तकेगी पथ।
तेजी से जाकर दरवाजे तक
लौट आएगी घिसटते-घिसटते।
बच्चे-
चौंचिया-चौंचियाकर खोजेंगे
अपना घोड़ा-गधा।
इसलिये-
या तो बाहर जाना मत
यदि जाना, तो जल्द लौट आना।

बहन-
जब आयेगी ससुराल से।
बेटी-
जब पांव रखेगी दहलीज के भीतर।
तुम-
प्रारंभ करने वाले ही होगे
चहक कर
उसके हाल -चाल जानने की प्रक्रिया।
उंड़ेलने वाले ही होगे
स्नेह का प्याला।
कि-
मुंह की दीवारों से टकराकर ताड़-ताड़
हलक के भीतर पहुंच जाएगी
लहूलुहान जबान।
जब पढोगे-
उसकी नाजुक पीठ पर गुदी
नीले हर्फों की खौफनाक इबारतें।
जब छुओगे-
उसकी गर्दन पर खुदी
नायलान की क्रूर त्रासदी।

तो-
कौन से पृष्ठ को लपेटकर
रोक सकोगे
टांगों को कांपने से
होठों को थरथराने से
आंखों को बहने से।

अबकी बार-
रखोगे अपनी ी बात पूरी दृढ़ता से।
अस्तित्व को बनाये रखने की
जद्दोजहद द्वारा प्रदत्त
असहनीय पीड़ा की ओर पीठ घुमाकर
हांक लगाओगे , एक तेज स्वर की
अबकी बार।
परंतु-
हथेली पर खुदी
आदमी होने की रेखा को
मुट्ठी में बंद करके
हवा में उछाल देने से
उन्हें, जिंदाबाद के नारे की
महक नहीं आएगी!

पहुंच भी जाओगे
अभिमन्यु की तरह
भीतर से भी भीतर
परंतु-
निकलने का रास्ता सुनने से पूर्व
सामाजिकता, जिम्मेदारी एवं संस्कारों
के रूप में
नींद की गोली खाने से
इनकार कर सकोगे।

तुम-
उदास क्यों हो ?
वही तो बने
जो बनना चाहा।
रिश्तों की किताब का
.. शीर्षक।

अक्सर बाद में चिपकाया
जाता है जो।

      
  -
email- suneelsamvedi@gmail.com

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अशोक सिंह

मैं शराब
लोगों की उमंग
लोगों की पहचान
लोगों का जुनून
लोगों का कर्म
लोगों का धर्म।।
बदनसीब इंसान
उसे नहीं है मेरी पहचान
दोस्त समझता है
खुद से ज्यादा विश्वास करता है
पर उसे क्या पता
मैं उसका दोस्त नहीं
वो मेरा गुलाम
मैं उसे नचाता हूं
गिराता हूं
समाज में नीचा दिखाता हूं
इंसान के अधर पर आते ही
उसे अपनों का दुश्मन बनाता हूं
उसका व्यक्तित्व तक मेरा गुलाम होता है।।
मुझे गर्व है अपने ऊपर
ये बेवकूफ इंसान
मुझे बनाया
और मेरे ही जाल में समाया।।
पर कभी-कभी मैं
परेशान हो जाता हूं
देखकर इनकी बेवकूफियां
क्या भगवान ने इसी लिये अनोखा बनाया
कंप्यूटर से भी तेज दिमाग सजाया
चंद बूंदों की वर्षा में ही बह जाता है
वर्षों का इंसान एक पल में मर जाता है।।
बन जाता है आसुरी
अपनों को भी निगलने की उमंग
देखकर ऐसे वहशीपन को
गर्व होता है अपने आप पर
कि उस इंसान द्वारा निर्मित मैं
आज भी अपने प्रकृति को संजोये हुए हूं।।
काश इंसान
मुझ जैसा समझदार होता
बचाये रखता अपनी इंसानियत तो
ना होती एक पत्नी विधवा
ना छिनता एक बूढ़े मां -बाप का सहारा
एक परिवार का जुनून
और देश का एक कतरा खून।।

आजमगढ़ उत्तरप्रदेश
 
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फूलसिंह कुम्पावत

मुझे मेरा बचपन लौटा दो
दिलों में बसे बचपन के यार लौटा दो
माँ का प्यार पिता का दुलार लौटा दो
बाल्यकाल  की वो  मस्ती   लौटा दो
हे भगवान मुझे मेरा बचपन लौटा दो

तनाव के दौर में मन की शांति  लौटा दो
चंदा मामा की कहानी फिर से सुना दो
दादा दादी के एक बार दर्शन करा दो
हे भगवान मुझे मेरा बचपन लौटा दो

गुरु शिष्यों का अनमोल रिश्ता लौटा दो
बाल दिवस की वो प्यारी  यादें  लौटा दो
वरदान के रूप में ही सही बस एक बार
हे भगवान मुझे मेरा बचपन लौटा दो

गर्मी की छुट्टियों का वो आनंद लौटा दो
धूल मिटटी में खेलने की आजादी लौटा दो
गांव के खेतों में घूमने का वो पल  लौटा दो
खजाने के रूप में ही सही बस एक बार
हे भगवान मुझे मेरा बचपन लौटा दो
 

संपर्क- 29,राधाकृष्ण कॉलोनी , सेंदरा रोड , होटल राजमहल के पास , ब्यावर 305901

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मिथिलेश_राय

मुक्तक

काश तुमको फिर से याद मैं आ जाऊँ!
काश तुमको फिर से जिन्दगी में पाऊँ!
तेरे दर्द को भूल सकता हूँ लेकिन,
कैसे तेरे प्यार को दिल से मिटाऊँ?

--
मेरी शाम जब तेरा इंतजार करती है!
तेरी याद को दिल में बेशुमार करती है!
खुली हुयी सी रहती हैं हसरतों की बाँहें,
ख्वाहिशों को रातों में बेकरार करती है!


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संस्कार जैन

ईश्वरीय संवाद
मनुष्य –
काश ! जिंदगी के शाख के ,
वो लम्हे ऐसे न होते..
तो कुछ सपने अपने होकर भी,
बेगाने से न होते..
सात स्वरों के बीच में ,
ये दुनिया नश्वर न होती..
दो दिलों के बीच के,
ये रिश्ते झूठे न होते..
ईश्वर –
अगर अँधेरे न होते तो ,
रौशनी की कीमत होती कैसे ?
रस्ते लम्बे न होते तो ,
मंजिल की कीमत होती कैसे ?
अब एक रंग से तो तस्वीर बनती नहीं,
अगर गम न होते तो ख़ुशी की कीमत होती कैसे ?
                                       ..........

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महेन्द्र देवांगन माटी

हाइकु
मेरी प्यारी माँ

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(1) ममता मयी
करुणा का सागर
मेरी प्यारी माँ ।

(2) याद सताती
जब दूर है जाती
मेरी प्यारी माँ ।

(3) हमें खिलाती
भले न खुद खाती
मेरी प्यारी माँ ।

(4) हमें पढ़ाती
तजुर्बा सिखलाती
मेरी प्यारी माँ ।

(5) लोरी सुनाती
पेट पर सुलाती
मेरी प्यारी माँ ।

(6) जीना सिखाती
सत्य मार्ग बताती
मेरी प्यारी माँ ।

(7) गुनगुनाती
आंचल लहराती
मेरी प्यारी माँ ।

पंडरिया  (कवर्धा )
छत्तीसगढ़
8602407353
mahendradewanganmati@gmail.com

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मुकेश कुमार


महकाने बनकर मेरे दिलों में ...
ग़ज़लों की रूहानी शाम गुज़रती हैं
महकाने बनकर मेरे दिलों में ...
शमसीर बनके आँखों में चुभती है
महकाने बनकर मेरे दिलों में...
दिन रात तेरे वादों की ख़िलाफ़त होती रही
महकाने बनकर मेरे दिलों में...
उम्र गुज़र गयी तुझे भुलाने में
महकाने बनकर मेरे दिलों में ...
हर शाम किसी टेबल के कोने पर
मय्यसर शाम गुज़रती हैं तेरे मेरे अफसानों
को तकियों से शिकायतें कर करके
महकाने बनकर मेरे दिलों में ...
हर शाम तुझको पैमाने के साथ भूल जाता हूँ
महकाने बनकर मेरे दिलों में ...

सीकर राजस्थान (332001)

mukeshkumarmku@gmail.com

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कुमारी अर्चना

"मैं पुरूष बनना चाहती हूँ"
जो सृष्टि की सृजन के बाद
जीवों में मुख्यकर्ता बन जाता है
वो एक साथ क्रिया व कर्म
दोनों की भूमिका निभाता है!
एक स्वं को संतुष्ट द्विजा
स्त्री की तृप्त करता है
मैं पुरूष बनना चाहती हूँ!
जो इतिहास बनाता है
और इतिहास लिखकर
भविष्य पीढ़ी को संरक्षित करता है!
प्रकृति और स्त्री दोनों उसपर आश्रित है
उसके कुशाग्र बुद्धि व बाहुबल से!
इसलिए स्त्री व प्रकृति दोनों ही
सदा उसके ऋणी रहेंगे!
मैं पुरूष बनना चाहती हूँ
जो घर के प्रधान मुखिया बन
परिवार को संयुक्त रखता है !
वो संततिकर्ता ही नहीं केवल
उसका पोषणकर्ता भी करता है!
पीढ़ी दर पीढ़ी पैतृक वंशावली की
परम्परा को आगे बढ़ता है !
जो नित प्रगतिशील विचारों से
समाज व देश को आगे बढ़ता है!
जो विज्ञान व प्रौद्योगिक की नवीन
तकनीकियों को विकसित करता है
मैं पुरूष बनना चाहती हूँ !

कटिहार,बिहार

ईमेल-kumariarchana720.ka@gmail.com


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सीताराम साहू

बहुत वर्षों में जागा हूं तुम्हारा प्यार पाने में ।
मुझे लग जायेगी सदियां तुम्हें राधे भुलाने में ।
तुझे बांटा नहीं दुख-दर्द रक्खा है छुपा दिल में ,
ये जीवन बीत जायेगा दर्द तुझको बताने में ।
न कोई आरजू जीवन की  नहीं कोई तमन्ना हैं,
तुझे न पा सका कोशिश बहुत की तुमको पाने की ।
तुम्हारे बिन ये जीवन कैसा होगा कह नहीं सकता,
जमाने भर ने कोशिश की तेरे दर को भुलाने की ।
मेरी उलझी समस्याओं को तुमने दिल से सुलझाया,
संवर जीवन गया चाहत थी शायद तुमको पाने की है।
निभाया फर्ज तुमने मेरे खातिर मिट गए खुद ही,
बहुत बेशर्म हूँ हिम्मत नहीं वादा निभाने की ।
जो न दे रोशनी किस काम का दीपक भला राधे,
जरूरत ऐसे दीपक की नहीं, मिट्टी बनाने की ।

---.


माँ ये चिट्ठी हमारी तू ले लीजिये ।
जब समय हो सही उनको दे दीजिये ।
मुझको पाला ,सम्भाला ,बनाया बहुत ।
मैं ही भूला हूँ तुमने निभाया बहुत ।
तेरे अहसान मै कुछ नहीं मानता,
मानता हूँ कि मैंने मंगाया बहुत ।
पुत्र का मैंने रिश्ता निभाया नहीं,
किन्तु माँ का तू रिश्ता निभा दीजिये।
माँ ये चिट्ठी हमारी तू ले लीजिये ।
जब समय हो सही उनको दे दीजिये ।
मातृशक्ति को करता रहे सर नमन ।

मातृभूमि का खिलता रहे ये चमन।
कर करे काम केवल तुम्हारे लिए,
दीन दुखियों के दुख में दुखे मेरा मन ।
अपना ही सबको समझूं ये वर दीजिये ।
मौत से झूमने का हुनर दीजिये ।
माँ ये चिट्ठी हमारी तू ले लीजिये ।
जब समय हो सही उनको दे दीजिये ।
माँ कोई भय मुझे अब सताए नहीं ।
तेरी छवि के सिवा कुछ भी भाये नहीं ।
तेरी ही गोद में सोऊं अंतिम समय,
मौत मेरी किसी को रूलाये नहीं ।
अंतिम इच्छा यही पूरी कर दीजिए ।
अपने चरणों मे मुझको जगह दीजिये ।
माँ ये चिट्ठी हमारी तू ले लीजिये ।
जब समय हो सही उनको दे दीजिये ।

नर जीवन में जब तक प्राणी पाता न विश्राम है ।
सांस सांस में जब तक न आता प्राणी में राम है ।
जिस जिस ने भी पाया प्रभु को रास्ता स्वयं बनाया है ।
किया समर्पण जिसने भी उसने ही प्रभु को पाया है ।
नहीं दिया दुख कभी किसी को वह प्रभु के मन भाया है
जो भी देख रहा तू प्राणी सब ईश्वर की माया है ।
रोम रोम जो रमा हुआ है वही हमारा राम है ।
सांस सांस में जब तक न आता प्राणी में राम है ।।
जीवन हो उथल-पुथल तो प्रभु परीक्षा लेते हैं ।
धीरज को धारण करना प्रभु साहस भी भर देते हैं ।
परमारथ के काम करो उस धन से जो प्रभु देते हैं ।
तन से सेवा कार्य करो प्रभु इसीलिए तन देते हैं ।
दुखी जनो की सेवा में तन मन पाता विश्राम है ।
सांस सांस में जब तक प्राणी पाता न विश्राम है ।।
दुखियों का दुख देख तेरा दिल नहीं दुखे तो क्या दिल है
अपने ही खातिर तू जीता यह तो पशुता  का बल है ।
जो औरों के खातिर बहता वह बनता गंगाजल है।
जो भी तू करता है प्राणी देख रहा प्रभु प्रति पल है ।
दीनों में देखे जो प्रभु को उसको मिलता राम है ।
सांस सांस मे जब तक प्राणी पाता न विश्राम है ।
----.

न मैं पा सकूं न भुला सकूं ये अजीब सी मेरी जिंदगी ।
न मैं आ सकूं न बुला सकूं ये अजीब सी मेरी बन्दगी ।
मेरी आरजू तुझे जान लूं, मेरी आरजू तुझे मान लूं
न मैं खा सकूं न खिला सकूं ये अजीब सी मेरी जिंदगी
मेरी आरजू तुझे मान दूं,मेरी आरजू सम्मान दूं,
न ही पास, दूर न रह सकूं बदनसीब है मेरी जिंदगी ।
तेरा हाल दिल न मुझे पता, तू सुने न मेरी दास्तां ,
न बता सकूं न मैं सुन सकूं ये अजीब सी मेरी जिंदगी ।
तेरा दर्दे दिल न मिटा सका, तेरा दर्दे दिल न भुला सका,
न दबा सका न दुआ सका , ये अजीब सी मेरी जिंदगी

000000000000000.

शरद अजमेरा "वकील"

प्रीत का दीप जला तुमने किया मेरे दिल में उजियारा.
रोशन हुई अँधेरी दुनिया मिटा इस दिल का अंधियारा..

मदहोश हुआ इस कदर तेरे प्यार में ये दिल.
अब तो होश में आना ही नहीं चाहता दोबारा..

क्या कहा ऐसा तुम्हारे दिल ने मेरे इस दिल से.
सुनके ना रोया ना सोया बस जाग जाग के किया गुजारा..

खामोशियों ने तुम्हारी क्या गजब असर कर दिया.
आँखों ही आँखों में बातें हो रही आँखों ही आँखों में इशारा..

दिल की खुशी बताते हैं जिसे सब जमाने वाले.
  इस इश्क की खुशी ने लूट लिया है घर हमारा..

तुम्हारा प्यार इस कदर बस गया है मेरी रूह में.
जल बिन मछली की तरह तड़पता है दिल बेचारा..

अजीब दर्द देती है ये बिना मौसम की बरसात "वकील"
खाने दौड़ता है ये घर ये गली ये चौबारा..

----.

भारत को विश्व गुरू बनाना है

निशा का गढ़ तोड़ कर
पूरब की गोद छोड़ कर
नव प्रभात लालिमा संग
उदित हो रहा दिनकर..

सामने उत्तंग तूफान हो
विघ्न भयंकर उत्तम हो

हथेली पर निज प्राण हो

धूप सत्य की खिलेगी
बुझी लौ फिर जलेगी
उम्मीद का कर आव्हान
मंजिल तुझे अवश्य मिलेगी

हो आत्मोत्सर्ग कोई डर नहीं
दया की फरियाद तू कर नहीं
युक्ति संग शक्ति कर संगठित
तेजस्वी बन तू कायर नहीं.

चाँद तारे जमी पर लाना है
पत्थर पर फूल खिलाना है
मधु रितु में सृष्टि सजाना है
भारत को विश्व गुरू बनाना है..

---.

मृत्यु पाथ

पचपन पार की अवस्था
जवानी से जरा की प्रवेश व्यवस्था.
प्राणों की भी होती है सीमा
समय अब चलने लगा है धीमा
क्या कैसा होगा आने वाला कल
कभी भी टूटेगा ये पका हुआ फल
रक्त चाप की आँख मिचौली
मधुमेह बन गया हमजोली
खलने लगा है तापमान
मौसम का ये प्रतिमान
नहीं रहा गर्म खून वाला वो तेवर
खा नहीं सकते लड्डू पेड़ा घेवर
आधी होने लगी है थाली
कम लो चाय की प्याली
झुर्री वाली रह गई मुस्कान
कमर खिंचने लगी है कमान
होना पड़ता स्वयं के प्रति निर्मम
जीवन पथ लगता है दुर्गम
बता नहीं सकता उर का घाव
बंधते नहीं घर में अब पाँव
मृत्यु आती निस्तब्धता के साथ
ना रोकता मैं नव निर्माण पाथ.
ना रोको तुम नव निर्माण पाथ
----.

लाख कोशिश की ये जमाने ने.
कसर कहाँ छोड़ी मुझे आजमाने में..

सारी उम्र के नासूर अभी ताजे हैं.
तुम नमक ना लगा देना अनजाने में.
आग से खेलना है इश्क करना भी.
पर मजा आता है इश्क में जल जाने में..
बेवफा जख्मों की चुभन का क्या भरोसा.
दर्द दें जाती है कभी मरहम लगाने में.
जिस्म और जान पिघलने को है
तेरे प्यार की चिता जलाने में..
प्यार ही तो करते हैं गुनाह तो नहीं.
मजा जमाने को आता खंजर चुभाने में..
तुम्हारी उदासी बता रही तुम मेरी हो.
मगर देर करदी मुझे दिल में बसाने में..

---.


ज्ञान शुन्य क्रीड़ामय बालपन
ले भर आ स्वर्गिक नवयौवन
उठ खड़ा हो सब आलस्य छोड़
लक्ष्य रख साथ चाहे हो स्वपन.

निर्बल नहीं तू है सबल संग्रामी
निष्प्राण नहीं तू है प्राण सहित प्राणी
विस्तार कर चेतना का बन विज्ञानी.

इतिहास है बदलना भर हुंकार
पलट कर रख जो विपरीत है धार
व्यक्ति बन व्यक्तित्व सहित तू
मचा दे तू अरिगण में हाहाकार.

असंभव कहाँ कुछ तू जो ठान ले
पूर्ति चरम लक्ष्य की पहचान ले
आत्म प्रपंचक ना बन तू बन साधक
अंत सत्य अति सुगम तू मान ले.

----.

वो अलबेले दिन अब भी याद आते हैं
तुम सुकुमार सलोनी अवनत नयन वाली
अंतर में रंग अनूठे और उम्र थी बाली
देख तुम्हें हम सम्मोहित हो कहीं खो जाते हैं
वो अलबेले दिन अब भी याद आते हैं..

मादकता से भरी भरी मन में कुछ सकुचाती
कुछ कुछ शरमाती सामने से जब निकल जाती
मधुर रंगीली आँखों में सपने सजाती
चपल चितवन सी आँखों में हम अपने को डुबाते हैं
वो अलबेले दिन अब भी याद आते हैं..

मेरे जीवन में मोहक बन कर वो क्षण आया
यौवन से लदी देखी मैंने जब तुम्हारी काया
तुम कली थी सुन्दर सी मुस्काती
हम भी छैल छबीले लिये चौड़ी छाती.
घूम घाम मौज उड़ा देर रात घर आते हैं
वो अलबेले दिन अब भी याद आते हैं..

ये मधुर अधर मुझे प्रेम गीत जब सुनाते
प्रेम डोर में बंधे हम आपस में खिंचे चले आते
वसंत की मधुमय बयार हमें और पास बुलाती
मुक्त पवन फूलों की महक हमें दे जाती
बादल प्रीति वाले हम पर प्रेम रंग बरसाते हैं
वो अलबेले दिन अब भी याद आते हैं



0000000000000

हिमांशु सिंह 'वैरागी'

मुझमें और तुझमें,
फ़ासला एक दून का है
थोड़ा थम जाने के बाद लगा,
प्यास से तड़प जाने के बाद लगा,
मुरझाने के बाद लगा,
यार ये मौसम जून का है...
ये सोचकर मैं,
मुस्कुराता रहा,आंसू बहाता रहा,
साथ में,
तसल्ली भी देता रहा,
चुप हो जा यार;
कौन सा ये रिश्ता खून का है...

मुझमें और तुझमें,
फ़ासला एक दून का है
फिर भी मुझे सामीप्य लगा,
अंततः हाल बेहाल हुआ
तुझे पास ना पाने के बाद लगा,
यार ये मौसम तो कुसगुन का है...
ये सोचकर मैं,
फिर भी तेरा परित्राता रहा,आंसू बहाता रहा,
साथ में,
सांत्वना भी देता रहा,
मत रो यार
हमारा रिश्ता तो गेहूं और घुन का है...
     --------.

मैं मरा नहीं हूँ,
जिंदगी से हारा हूँ
हाँ मैं किस्मत का मारा हूँ,
तुम जो सोच रहे हो ना
सही है वो
एक खास नाता
मुझसे और विरहातिरेक से है
लेकिन मैं अभी मरा नहीं हूँ...

विरह का मारा हूँ,
हाँ हाँ मैं तेरा ही मारा हूँ
भूल हो गई थी मुझसे,
मैंने ये सोच लिया था,
की मैं खरा तुम्हारा हूँ.
सच तो यह है
ना मैं तुम्हारा था,
ना मैं तुम्हारा हूँ.
दुख नहीं इस बात का
क्योंकि मैं अभी मरा नहीं हूँ,
मैं मरा नहीं हूँ...
---.

मेरा वादा है तुझसे
एक दिन,
सबसे नाता तोड़ दूंगा...
बेशक़ ये मेरे लिए हाड़तोड़ होगा
लेकिन याद रख ले,
तुझे जवाब मुँहतोड़ दूंगा...
अगर ना हो पाया
तो खुद के अंजर-पंजर तोड़ लूंगा.

मेरा वादा है तुझसे
एक दिन,
सबसे नाता तोड़ दूंगा...
बेशक़ ये मेरे लिए खंखोड़ होगा
लेकिन याद रख ले,
तुझे लिखकर जरूर दित्साक्रोड़ दूंगा...
अगर ना हो पाया
तो खुद के पमार को तोड़ लूंगा.

मेरा वादा है तुझसे
एक दिन,
सबसे नाता तोड़ दूंगा...
बेशक़ ये मेरे लिए निगोड़ होगा
लेकिन याद रख ले,
तुझे अकेला रण में छोड़ दूंगा...
अगर ना हो पाया
तो जग से भी नाता तोड़ लूंगा.
      

★ ★
0000000000000000

महादेव मुंडा

मीत तुम्हें तो लौटना ही होगा
नहीं तो
इस जिन्दगी का क्या होगा
राहे देख रही है एक बेबस दिल
तड़प रही है आज उस प्यार की उम्मीद में
जो खोया था कभी दुनिया की भीड़ में
टूट चुकी है लाखों हसरतें इस दिल की
पर भी ढूंढती है खुशी बहते नीर में
मीत तुम्हें तो लौटना ही होगा
नहीं तो
इस जिन्दगी का क्या होगा

सालती है जिन्दगी अपनी
हर याद एक दर्द बनकर
क्या तुम्हें एहसास नहीं
जी रहा हूँ इस जहाँ पर
अकेला और मजबूर बनकर
जरूरत है हमें तुम्हारी
इस जिन्दगी के वास्ते
नहीं तो जिन्दगी सारी
बिखर जाएगी धूल बनकर
क्या नहीं आओगे
हमारी जख्म भरी आसुँओं के पोंछने
जो पानी तो है पर
गिर रहे हैं खून बनकर
मीत तुम्हें तो लौटना ही होगा
नहीं तो..........

---.
खुशी से दिल को आबाद करना
और गम को दिल से आजाद करना
हमारी बस इतनी गुजारिश है कि
हमें भी दिन में एक बार याद करना

साँसों में डालकर रखना
दिल के पिंजरे में पाल के रखना
टूटे दिल को सुकून देगी ये यादें
इन यादों को सदा संभाल के रखना

भूल से कभी हमें भी याद करना
प्यार ना सही शिकायत ही करना
इतना भी गैर ना समझना की बात ही नहीं करना
बात ना सही संदेश जरूर करना

मिल जाए कोई नया तो हमें ना भुला देना
रूला दे आपको कोई तो हमें याद कर लेना
हम भी एक दोस्त है आपके
खुशी ना सही गम ही बांट लेना

कभी दिल से जुदाई का जिक्र मत करना
इस दिल से रूसवाई कभी मत करना
जब दिल भर जाए हमसे तो बता देना
चुप रहकर बेवफाई मत करना
जिंदगी में ऐसे भी मुकाम आते हैं
कुछ लम्हे हँसाते हैं कुछ रूलाते हैं
किसी बहाने हमें याद करते रहना
वरना लोग नाम लेना भी भूल जाते हैं
---.

न मोहब्बत मिला ना वफा मिला
ना जाने क्यों हर खुशी हमसे खफा हुई
झूठी मुस्कान लिए हम अपना गम छुपा लेते हैं
सच्चा प्यार करने की क्या सजा मिला

पल ही ऐसा था कि हम इनकार ना कर पाये
जमाने के दर्द से इकरार ना कर पाये
ना थी जिनके बिना जिन्दगी मुनासिब
छोड़ दिया साथ उन्होंने
और हम सवाल ना कर पाये

निभाया वादा हमने शिकवा ना किया
सहे दर्द मगर रूसवा ना किया
जल गया सपना अरमां खाक हुआ
सब उसने किया मगर
मैंने चर्चा तक ना किया

रिश्ते टूटकर चूर हो गये
धीरे-धीरे वो मुझसे दूर हो गये
हमारी खामोशी हमारे लिए गुनाह बन गयी
और वो गुनाह करके भी बेकसूर हो गये

एक कसक दिल में दबी रह गयी
जिन्दगी में उनकी कमी रह गयी
कोशिश के बाद भी वो ना मिली
शायद मेरे ही चाहत में कोई कमी रह गयी
---.
डर था तुम्हें खो देंगे
इसलिए कभी पा ना सका
यादों को तेरी दिल से भुला ना सका
शिकवा आज भी है तुमसे दूर जाने का
नाम तो ओठों पर था
पर कभी तुम्हें बुला ना सका

सिर्फ तुम्हीं हो जिन्दगी में
पर मैं
तुम्हें पा ना सका
रहेगा दुख हमेशा
तुम्हें ना पाने का
पर अपनी खुशी के लिए
तुम्हें रूला ना सका

अफसोस है शिकायत नहीं
कि
चाहकर भी तुम्हें पा ना सका
पाकर भी तुम्हें अपना ना सका
दूर रहकर भी तुम्हें भुला ना सका
अफसोस है शिकायत नहीं
---------.
देव
किसे कहूँ कि
ये दूरियाँ सताती है
हर वक्त आपकी याद आती है
आँखों में सिवा आपके
किसी का चेहरा नहीं भाता है
जब भी बैठता हूँ पढ़ने
किताबों से मन उब जाता है
कानों पर बस आपकी ही
आवाज आती है
देव
किसे कहूँ कि
ये दूरियाँ बहुत सताती है

ये गली
ये चौराहा
ये सड़क और ये आँगन
सब सूना सा लगता है
सन्नाटा सा लगता है
आज एहसास हुआ
आपके जाने के बाद
आज एक जिन्दगी बेजान है
आपसे दूर होकर
आपकी यादों में रो-रोकर
कैसे निकालूँ
इन यादों को
जो दिल में बसे हैं अपना बनकर
कुछ भी नहीं लगता अच्छा
एक कमी है मन में हमेशा
देव
किसे कहूँ कि
ये दूरियाँ बहुत सताती है
-------.
ऐसा क्यों होता है
कि
किसी की आँसुओं में
कोई दूजा रोता है
किसी और की यादों में
कोई और तड़पता है
टूटते हैं रिश्ते
दर्द दिल को होता है
पर आँख रोता है

ऐसा क्यों होता है

ऐसा क्यों होता है
कि
बिछड़ने से पहले
मिलना जरूरी होता है
किसी की गम में
कोई और जलता है
नशा आँखों में होती है
लड़खडा़ना पैर को पड़ता है

ऐसा क्यों होता है


---
कोई खता नहीं कोई खबर नहीं
आपको शायद
हमारी दोस्ती की कदर नहीं
हम आपको याद करते हैं
हर सांस के साथ
और आपको
शायद हमारी सांसों की फिकर नहीं

सबेरा क्या हुआ
आप सितारों को भूल गये
सूरज क्या उगा
आप बहारों को भूल गये
गुजरा क्या कुछ पल
हमारे बिना
आप हमें ही भूल गये

ऐसा भी क्या कसूर कर दिया हमने
इस तरह से गैर हमें कर दिया
माफ करना हमारी गलतियों को
जिनकी वजह से हमें आपने
याद करना छोड़ दिया
---.
बैठ जाऊँ मैं थककर
बीच राहों में
तुम कदम हमेशा
हौसलों से आगे बढा़ना

मैं बुझ जाऊँ दीपक बनकर
तुम चमकना आसमान में
सूर्य बनकर

हमारी गमों से कोई
वास्ता मत रखना
गर मैं बिखर जाऊँ
जमीं पर
धूल बनकर

फिर भी तुम
हमेशा छूना ऊंचाइयों को
आसमान बनकर
---.

वो बड़ी आहत है
ये मैं नहीं कहता
उसकी चेहरा बता रहा है

कभी सामने आती है
कभी छिप जाती है
कभी मुस्कुरा कर
नजर झुकाती है

दिल में उसकी चाहत है
ये मैं नहीं कहता
उसकी चेहरा बता रहा है
वो बड़ी आहत है

उसे चाहत है मुझसे
उसे मोहब्बत है मुझसे
वो मुझे जानती है
वो मुझे पहचानती है
मेरा हर बात उसे
अच्छा लगता है
हो गयी उनको प्यार है

वो बड़ी आहत है
ये मैं नहीं कहता
उसकी चेहरा बता रहा है
वो बड़ी आहत है

00000000000

नमन खंडेलवाल


* वो अमीर हैं *

बदनसीब हैं वो और लाचार हैं
अपनी हालत से वो परेशान हैं
कोई पूछता ही नहीं उन्हें क्यों
पूछो तो आखिरकार वो भी तो इंसान है ।।

दिनभर सूरज के ताप को चूमते हैं
नंगे पांव सड़क पर घूमते हैं
बदन पर फटी उतरन लपेट कर
बिना खुशी के भी झूमते हैं ।।

खाने की तलाश उन्हें रोज रहती है
आज कुछ नया मिल जाने कि उम्मीद रहती है
खाली पेट कहीं फिर न सोना पड़े
जिंदगी उनकी इस अफसोस में रहती है ।।

घर उनकी एक छोटी झोपड़ी है
उनके लिए तो वही उनकी कोठी है
कोई उजाड़ दे उन कोठियों को अगर
कान लगा कर सुनो कितनी मासूमियत तब रोती है ।।

जग जा़हिर और फैली हुई यह बात है
नहीं आते समझ किसी को उनके हालात हैं
मदद दो -चार जरूर कर देते होंगे
बाकी करोड़ों के क्या खयालात हैं।।

फिर भी हर हालत में मुस्कुराते हैं
चैन से सोते ना हो मगर आराम से जागते हैं
फरेब करना उन्होंने कभी सीखा ही नहीं
इसलिए अपनी ईमानदारी का खाते हैं।।

माना कि वो बहुत शरीफ हैं
हां कौन कहता है कि वो गरीब हैं
पैसो के होने न होने से पता नहीं चलता
वो दिल से बहुत अमीर हैं ।।

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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,616,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,50,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: सप्ताह की कविताएँ - नवंबर 2017
सप्ताह की कविताएँ - नवंबर 2017
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