मंगलवार, 7 नवंबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–6 : 12 बदकिस्मत // सुषमा गुप्ता

12 बदकिस्मत[1]

यह कहानी इटली में कुछ ऐसे कही जाती है – बहुत दिनों पुरानी बात है कि एक राजा और उसकी रानी के सात बेटियाँ थीं। एक बार किसी राजा ने उस राजा पर हमला कर दिया, लड़ाई हुई और लड़ाई में वह राजा हार गया।

दुश्मन राजा उसको पकड़ कर ले गया और उसकी रानी और सातों बेटियों को वहीं छोड़ गया। अब वे सब बेचारे अकेले रह गये।

रानी ने वह महल छोड़ दिया और वह अपनी बेटियों को ले कर एक बहुत छोटे से मकान में चली गयी। उनका समय खराब था इसलिये जब कभी उनको खाना मिल जाता था तो वह उनके लिये बड़ी खुशकिस्मती का दिन होता।

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एक दिन उनके घर के पास एक फल बेचने वाला आया तो रानी ने उसको कुछ अंजीर खरीदने के लिये रोक लिया। जब वह अंजीर खरीद रही थी तो वहाँ से एक बुढ़िया जा रही थी। उस बुढ़िया ने रानी से भीख माँगी।

रानी बोली — “ओह, काश मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकती। पर मैं तुम्हारे लिये कुछ नहीं कर सकती। मैं तो खुद ही बहुत गरीब हूँ।”

बुढ़िया ने पूछा — “तुम कैसे गरीब हो गयीं?”

रानी बोली — “तुम्हें नहीं मालूम? मैं स्पेन की रानी हूँ। मेरे पति के ऊपर हमला हो गया था और वह हार गये। बस तभी से मैं गरीब हो गयी।”

“ओह बेचारी तुम। पर क्या तुमको मालूम है कि तुम्हारे साथ यह बुरा क्यों हो रहा है? तुम्हारे पास तुम्हारी एक बेटी है जिसकी शुरूआत ही खराब हुई है। जब तक वह तुम्हारे घर में है तुम लोग कभी फल फूल नहीं सकते।”

“कहीं तुम यह तो नहीं कहना चाहतीं कि मैं अपनी एक बेटी को कहीं बाहर भेज दूँ?”

“मुझे बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरा यही मतलब है। और तुम्हारी बदकिस्मती का यही एक हल है।”

“यह बदकिस्मत लड़की कौन सी है?”

“यह वह लड़की है जो अपने हाथ एक के ऊपर एक रख कर सोती है। आज की रात जब तुम्हारी बेटियाँ सो रहीं हो तो एक मोमबत्ती लेना और तब तुम उन सबको देखना। तुम्हारी जो भी बेटी हाथ पर हाथ रखे सो रही हो उसको तुम बाहर भेज देना तभी तुम अपना खोया हुआ राज्य वापस पा सकोगी।”

यह सुन कर रानी ने वही करने का विचार किया जो उस बुढ़िया ने कहा था। वह आधी रात को उठी, उसने मोमबत्ती जलायी और अपनी सातों बेटियों को देखने चली। वे सब सो रही थीं।

कुछ हाथ मोड़े सो रही थीं। किसी के हाथ उसके गाल के नीचे रखे थे तो किसी के हाथ उसके तकिये के नीचे रखे थे।

देखते देखते वह अपनी आखिरी बेटी के पास आयी जो उसकी सबसे छोटी बेटी थी। वह भी सो रही थी। उसने देखा कि वह अपने हाथों को एक के ऊपर एक रख कर सो रही थी।

उसको इस हालत में सोता देख कर वह बहुत दुखी हो गयी और रो पड़ी। वह अपनी उस सबसे छोटी बेटी को बहुत प्यार करती थी। उसको घर से बाहर निकालने की तो वह सोच भी नहीं सकती थी पर क्या करती।

वह धीरे से बुदबुदायी — “क्या करूँ बेटी तुझे मुझे घर से बाहर निकालना ही पड़ेगा।”

जैसे ही उसने यह कहा कि तभी उसकी वह लड़की जाग गयी। उसने देखा कि उसकी माँ एक जलती हुई मोमबत्ती लिये खड़ी है और रो रही है।

उसने आश्चर्य से पूछा — “क्या हुआ माँ? तुम क्यों तो यहाँ खड़ी हो और क्यों रो रही हो?”

“कुछ नहीं बेटी। आज एक बुढ़िया भीख माँगने आयी थी। उसने कहा कि हम तभी खुशहाल होंगे जब हम अपनी उस बेटी को घर से बाहर भेज देंगे जो एक हाथ पर दूसरा हाथ रख कर सोती हो। और वह बदकिस्मत बेटी तुम हो।”

बेटी बड़ी सादगी से बाली — “अरे, तो क्या तुम इसी बात पर रो रही हो? मैं ज़रा कपड़े पहन लूँ माँ, मैं अभी घर से बाहर चली जाती हूँ।”

उसने तुरन्त अपने कपड़े पहने, अपना कुछ जरूरी सामान एक पोटली में बाँधा और घर छोड़ कर चल दी। रानी उसको देखती रह गयी कि उसकी वह बेटी कितनी आसानी से अपना घर छोड़ कर चली गयी।

काफी चलने के बाद वह लड़की एक ऐसे खाली मैदान में आ गयी जहाँ केवल एक मकान खड़ा हुआ था। वह उस मकान तक गयी तो उसने उस मकान के अन्दर उसने कुछ बुनने कातने की आवाज सुनी। उसने झाँक कर देखा तो देखा कि कुछ स्त्रियाँ वहाँ कपड़ा बुन रही थीं।

उसको दरवाजे पर खड़ा देख कर उन बुनने वाली स्त्रियों में से एक स्त्री ने उससे कहा — “आओ अन्दर आ जाओ वहाँ बाहर क्यों खड़ी हो।” लड़की अन्दर चली गयी।

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“बदकिस्मत।”

“क्या तुम हमारे साथ काम करना पसन्द करोगी?”

“जरूर।”

उन्होंने उसको घर में झाडू लगाने और घर के दूसरे छोटे मोटे काम करने के लिये बता दिये।

फिर वे बोलीं “सुनो ओ बदकिस्मत, आज रात हम बाहर जा रहे हैं। जब हम चले जायेंगे तो हम बाहर से दरवाजा बन्द कर जायेंगे। तो जब हम चले जायें और हम बाहर से भी दरवाजा बन्द कर जायें तो तुम भी अन्दर से ताला लगा लेना। जब हम सुबह को वापस आयेंगे तब हम बाहर से अपना दरवाजा खोल लेंगे और तुम हमारे लिये अन्दर से दरवाजा खोल देना।

तुम्हारा काम यहाँ यह है कि कोई भी हमारी सिल्क या बेलें या हमारा बुना हुआ कपड़ा चोरी न करे और उन्हें नष्ट न करे, बस।” इतना कह कर वे चली गयीं।

जब आधी रात हुई तो बदकिस्मत ने कैंची चलने की आवाज सुनी। उसने तुरन्त एक मोमबत्ती जलायी और उसको हाथ में ले कर कपड़ा बुनने की जगह चली।

वहाँ उसने देखा कि एक स्त्री कैंची से कपड़ा बुनने की मशीन से सुनहरा कपड़ा काट रही थी। उसको लगा कि उसकी बदकिस्मती यहाँ भी उसके पीछे पीछे चली आयी है।

सुबह को उसकी मालकिनें लौटीं। उन्होंने बाहर से दरवाजा खोला और इस लड़की ने अन्दर से दरवाजा खोला।

जैसे ही वे अन्दर आयीं तो उनकी निगाहें फर्श पर पड़े कपड़े के टुकड़ों पर पड़ी तो वे उस पर चिल्लायीं — “अरी ओ बेशरम, क्या तुम इस तरह से हमारी भलाई का बदला हमको दोगी? चली जाओ यहाँ से। तुमको एक काम दिया था करने के लिये और वह भी तुमसे हुआ नहीं।”

और यह कह कर उन्होंने उसको घर के बाहर निकाल दिया।

वह लड़की बेचारी फिर चल दी। गाँव गाँव होते हुए अब की बार वह एक शहर में आ पहुँची। वहाँ वह एक दूकान के सामने रुकी जहाँ एक स्त्री डबल रोटी, सब्जियाँ और शराब आदि बेच रही थी।

वहाँ जा कर उसने भीख माँगी तो उस स्त्री ने उसको थोड़ी सी रोटी और एक गिलास शराब दे दी।

तभी उस दूकान का मालिक लौटा तो उसको उस लड़की पर तरस आ गया। उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह उसे रात को अपनी दूकान में बोरियों के ऊपर सोने दे। दूकानदार और उसकी पत्नी ऊपर सो गये और वह बदकिस्मत उस रात दूकान में बोरियों पर सो गयी।।

रात में पति पत्नी ने नीचे कुछ आवाज सुनी तो वे लोग आवाज सुन कर नीचे यह देखने के लिये दौड़े कि नीचे क्या हो रहा था। उन्होंने देखा कि शराब की बोतलों की डाट[2] खुली पड़ी है और उन बोतलों की शराब सारी दूकान में बह रही थी।

फिर वे लड़की को ढूँढने लगे तो दूकानदार ने देखा कि वह तो डरी हुई बोरों के ऊपर बैठी हुई है जैसे उसने कोई बुरा सपना देखा हो।

वह उस पर चिल्लाया — “ओ बेशरम, तूने ही यह सब किया है। तू ही इस सबकी जिम्मेदार है। निकल जा यहाँ से।”

यह कह कर उसने एक डंडी उठायी और उससे उसको मार मार कर बाहर निकाल दिया।

बिना जाने कि अब वह कहाँ जाये वह बदकिस्मत रोती हुई वहाँ से दौड़ ली। दौड़ते दौड़ते उसको सुबह हो गयी। सुबह को उसे एक स्त्री मिली जो कपड़े धो रही थी। वह वहाँ खड़े हो कर इधर उधर देखने लगी।

वह स्त्री उस लड़की को इधर उधर देखते हुए बोली — “तुम क्या देख रही हो बेटी?”

“मैं रास्ता भूल गयी हूँ माँ जी।”

“क्या तुम कपड़े धो सकती हो और उनको इस्तरी कर सकती हो?”

“हाँ।”

“तब तुम रुक जाओ। मैं इन कपड़ों को साबुन लगाती जाती हूँ तुम इनको धोती जाओ।”

वह लड़की उन साबुन लगे कपड़ों को धोती गयी और सुखाती गयी। जब वे सूख गये तो उसने उनको मरम्मत करने, कलफ लगाने और प्रेस करने के लिये इकठ्ठा कर दिये।

ये कपड़े राजकुमार के थे। जब राजकुमार ने अपने कपड़े देखे तो वह यह देख कर बहुत खुश हुआ कि उसके कपड़े कितने अच्छे तरीके से तैयार किये गये थे।

वह उस धोबिन से यह कहे बिना न रह सका — “फ्रैन्सिस्का[3], तुमने पहले तो कभी इतने अच्छे तरीके से मेरे कपड़े नहीं सजाये। मुझे लगता है कि मुझे तुमको कुछ इनाम देना चाहिये।” और उसने उसको 10 सोने के सिक्के दे दिये।

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फ्रैन्सिस्का ने वह पैसे उस बदकिस्मत के कपड़ों पर और डबल रोटी बनाने के लिये एक बोरा आटा खरीदने पर खर्च कर दिये। उसने उस आटे की दो डबल रोटियाँ बनायीं जो अँगूठी की शक्ल की थीं और उनमें सौंफ और तिल[4] पड़े थे।

उसने वे दोनों डबल रोटियाँ उस लड़की को देते हुए कहा — “इनको तुम समुद्र के किनारे ले जाओ और वहाँ जा कर मेरी किस्मत को इस तरीके से पुकारना –

“हैलोओओओ। ओ फ्रैन्सिस्का की किस्मत” ऐसा तीन बार पुकारना। तीसरी बार पुकारने पर मेरी किस्मत वहाँ आ जायेगी। तुम उसको यह एक गोल डबल रोटी और मेरी नमस्ते दे देना।

तब उससे यह पूछना कि तुम्हारी किस्मत कहाँ है। और जब तुम्हारी किस्मत आ जाये तो उसके साथ भी ऐसा ही करना।”

वह बदकिस्मत धीरे धीरे समुद्र के किनारे की तरफ चली। वहाँ जा कर उसने जैसा उस धोबिन ने उससे कहा था उसी तरीके से उसकी किस्मत को पुकारा –

“हैलोओओओ। ओ फ्रैन्सिस्का की किस्मत। हैलोओओओ। ओ फ्रैन्सिस्का की किस्मत। हैलोओओओ। ओ फ्रैन्सिस्का की किस्मत।”

जैसे ही उसने तीसरी बार उसको पुकारा फ्रैन्सिस्का की किस्मत बाहर आ गयी।

उसने उसे धोबिन का सन्देश दिया और उसकी गोल वाली डबल रोटी दी फिर उससे पूछा — “ओ फ्रैन्सिस्का की किस्मत, क्या आप मुझे मेरी किस्मत के बारे में कुछ बताने की मेहरबानी करेंगीं।”

“सुनो, तुम यह खच्चर वाला रास्ता पकड़ कर इस पर चलती चली जाओ जब तक तुम एक भट्टी तक न पहुँच जाओ। भट्टी के पास एक गड्ढा है जिसके पास एक बुढ़िया जादूगरनी बैठती है।

बहुत ही नम्रता से उसके पास जाना और यह गोल वाली डबल रोटी उसको देना क्योंकि वही तुम्हारी किस्मत है। वह यह डबल रोटी लेने से मना कर देगी और तुम्हारा अपमान भी करेगी। पर यह डबल रोटी तुम उसके लिये उसके पास ही छोड़ देना और वापस आ जाना।”

सो वह लड़की उस खच्चर वाले रास्ते पर चल दी और चलती रही जब तक वह भट्टी नहीं आ गयी।

वहाँ उसको एक बुढ़िया भी बैठी मिल गयी। उस बुढ़िया में से इतनी ज़्यादा बदबू आ रही थी कि वहाँ पहुँच कर उस लड़की का जी मिचलाने लगा।

पर फ्रैन्सिस्का की किस्मत की बात याद करके वह उसके पास बड़ी नम्रता से गयी और उसको वह गोल डबल रोटी देते हुए बोली — “ओ मेरी प्यारी किस्मत, क्या तुम मेरी यह . . .”

पर उस लड़की की बात पूरी होने से पहले ही वह बुढ़िया बोली — “चली जाओ यहाँ से। तुमसे डबल रोटी किसने माँगी?” और वह उसकी तरफ से पीठ फेर कर बैठ गयी।

उस बदकिस्मत ने वह गोल डबल रोटी वहीं उसके पास रख दी और फ्रैन्सिस्का के पास लौट आयी।

अगला दिन सोमवार था – धुलाई का दिन। फ्रान्सिस्का ने कपड़े साबुन के पानी में डुबो कर रखे और फिर उनमें झाग उठाने लगी। बदकिस्मत उनको मलने लगी और धो कर सूखने के लिये डालने लगी।

जब वे सूख गये तो उसने उनकी मरम्मत की और उनको इस्तरी किया। फ्रान्सिस्का ने उनको एक टोकरी में रखा और उनको राजा के महल ले चली।

कपड़े देख कर राजा ने कहा — “फ्रान्सिस्का, अब तुम यह नहीं कहना कि तुमने इससे पहले भी कभी कपड़े इतनी अच्छी तरह से धोये थे और इस्तरी किये थे।” इस मेहनत के लिये उसने उस दिन भी उसको 10 सोने के सिक्के और दिये।

अब क्या था फ्रान्सिस्का ने और आटा खरीदा और फिर से दो अँगूठी की शक्ल वाली डबल रोटियाँ बनायीं और बदकिस्मत को उनको समुद्र के किनारे उन दोनों की किस्मत को देने के लिये भेज दिया।

अगली बार बदकिस्मत ने राजकुमार के कपड़े धोये। राजकुमार की शादी होने वाली थी सो उसको बहुत बढ़िया धुले और इस्तरी किये गये कपड़े चाहिये थे। इस काम के लिये उसने फ्रान्सिस्का को 20 सोने के सिक्के दिये थे।

इस बार फ्रान्सिस्का ने न केवल दो डबल रोटी का आटा खरीदा बल्कि बदकिस्मत की किस्मत के लिये एक बहुत सुन्दर सी पोशाक, एक बहुत बढ़िया स्कर्ट, कुछ नाजुक से रूमाल, एक कंघा, बालों में लगाने वाला खुशबूदार तेल और कुछ और चीज़ें भी खरीदीं।

वह बदकिस्मत यह सब सामान ले कर उस भट्टी की तरफ चल दी और वहाँ जा कर गड्ढे के पास बैठी अपनी किस्मत बुढ़िया से बोली — “ओ मेरी प्यारी किस्मत, यह तुम्हारी गोल डबल रोटी है।”

वह किस्मत अब उस बदकिस्मत से ज़्यादा हिलती मिलती जा रही थी सो वह डबल रोटी लेने के लिये उसके पास तक आ गयी।

जैसे ही बदकिस्मत की किस्मत उसके पास आयी तो बदकिस्मत ने उसको पकड़ लिया। उसने उसको साबुन लगा कर नहलाया। फिर उसने उसके बाल बनाये और उसको उसके नये कपड़े पहनाये।

पहले तो वह बुढ़िया कुछ बल खायी पर फिर बाद में यह देख कर ठीक हो गयी कि वह तो एक बदला हुआ इन्सान हो गयी थी।

उसने कहा — “ओ बदकिस्मत, अब तुम मेरी बात सुनो। मेरे लिये तुम्हारी इन सब मेहरबानियों के लिये मैं तुमको यह एक छोटा सा बक्सा भेंट में दे रही हूँ।”

ऐसा कह कर उसने उसको एक दियासलाई की सींक रखने जैसा छोटा सा बक्सा दिया।

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बदकिस्मत उस बक्से को ले कर तुरन्त ही फ्रान्सिस्का के पास भाग गयी। घर जा कर उसने वह बक्सा खोला तो देखा कि उसमें कपड़ों पर लगाने वाली बेल का एक टुकड़ा[5] रखा हुआ था।

फ्रान्सिस्का और बदकिस्मत दोनों ही उस छोटे से बेल के टुकड़े को देख कर बहुत निराश हुईं। उनके मुँह से निकला “क्या बेकार की चीज़ है।” और उसको आलमारी के एक खाने में नीचे की तरफ ठूँस दिया।

अगले हफ्ते जब फ्रान्सिस्का धुले हुए कपड़े ले कर महल गयी तो उसको राजकुमार काफी उदास लगा। क्योंकि वह राजकुमार को अच्छी तरह से जानती थी सो उसने उससे पूछ लिया — “राजकुमार, क्या बात है आप इतने उदास क्यों हैं?”

“क्या बात है? अरे, यहाँ मैं शादी के लिये बिल्कुल तैयार हूँ और हमें अभी पता चला हे कि मेरी दुलहिन की पोशाक में लगने वाली बेल का एक टुकड़ा नहीं मिल रहा है। और वैसी बेल का टुकड़ा हमारे सारे राज्य में कहीं नहीं मिल रहा है।”

“राजकुमार, ज़रा रुको।” कह कर फ्रान्सिस्का घर दौड़ गयी। घर जा कर तुरन्त ही उसने वह आलमारी खोली जिसमें उसने बदकिस्मत की किस्मत की दी हुई बेल का टुकड़ा रखा था।

उसने बेल का वह टुकड़ा निकाला और दौड़ी हुई राजकुमार के पास वापस आयी। उन्होंने उस बेल के टुकड़े को दुलहिन की पोशाक की बेल से मिला कर देखा तो वह तो बिल्कुल ही उससे मेल खा रही थी।

राजकुमार खुशी से बोला — “ओह आज तुमने मुझे बचा लिया, फ्रान्सिस्का। मैं तुमको इस बेल की तौल के बराबर सोना देना चाहता हूँ।”

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सो उसने एक तराजू[6] मँगवायी। उसके एक पलड़े में उसने वह बेल रखी और दूसरे पलड़े में सोना। पर उसने कितना भी सोना तराजू के पलड़े पर रखा वह उस बेल के वजन के बराबर नहीं हो सका। बेल का पलड़ा हमेशा भारी ही रहा।

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फिर उसने उस बेल का वजन एक दूसरी तरह की तराजू[7] से लेना चाहा पर उससे भी कुछ नहीं हुआ।

तो वह अपनी धोबिन से बोला — “फ्रान्सिस्का सच बोलना। इतना छोटा सा बेल का टुकड़ा इतना भारी कैसे हो सकता है? तुमको यह बेल का टुकड़ा कहाँ से मिला?”

अब फ्रान्सिस्का के पास पूरी कहानी बताने के अलावा और कोई चारा नहीं था। कहानी सुनने के बाद राजकुमार ने उस बदकिस्मत से मिलने की इच्छा प्रगट की।

धोबिन ने उस बदकिस्मत के लिये कुछ अच्छे कपड़े और गहने इकठ्ठे कर लिये थे सो वे उसने उसको पहनाये और उसको महल ले कर आयी।

क्योंकि वह एक राजा की बेटी थी और दरबार की रस्मों को बहुत अच्छी तरह जानती थी सो जब वह बदकिस्मत राजा के कमरे में घुसी तो उसने उसको शाही तरीके से झुक कर नमस्ते की।

राजकुमार ने उसका स्वागत किया और उसको बैठने के लिये एक सीट दी। फिर पूछा — “मगर तुम हो कौन?”

तब उस बदकिस्मत ने बताया — “ंमैं स्पेन के राजा की सबसे छोटी बेटी हूँ। मेरे पिता को लड़ाई में हरा कर उनकी गद्दी छीन ली गयी थी और उनको जेल में डाल दिया था।

मेरी बदकिस्मती ने मुझे घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। दुनियाँ में मुझे बहुत अपमान मिला, बहुत मार मिली और बहुत बार मुझ पर इलजाम लगाये गये।”

और फिर उसने राजकुमार को सब बता दिया।

इसके बाद राजकुमार ने सबसे पहला काम तो यह किया कि उसने उन कपड़ा बुनने वालियों को बुलवाया जिनका कपड़ा और बेलें उस बदकिस्मत की किस्मत ने कटवाया था।

उसने उनसे पूछा — “तुम्हारा कितना नुकसान हुआ?”

उन्होंने कहा — “200 सोने के क्राउन[8]।”

राजकुमार ने उनको 200 सोने के क्राउन दिये और कहा — “ये लो अपने 200 क्राउन। और एक बात यह जान लो कि वह बेचारी लड़की जिसको तुमने अपने घर से बाहर निकाल दिया था वह स्पेन के राजा की बेटी है। बस, अब तुम लोग जाओ।”

फिर उसने उन दूकान वालों को बुलवाया जिनकी दूकान में उस बदकिस्मत की किस्मत ने शराब बिखेरी थी। उसने उनसे भी पूछा — “तुम्हारा कितना नुकसान हुआ?”

उन्होंने कहा — “300 सोने के क्राउन।”

“यह लो अपने 300 सोने के क्राउन। पर किसी राजा की बेटी को मारने से पहले दो बार सोच लेना। जाओ और मेरी ऑखों के सामने से दूर हो जाओ।”

फिर उसने अपनी होने वाली पत्नी को भी शादी करने से मना कर दिया और उस बदकिस्मत से शादी कर ली। उस बदकिस्मत को उसने उसकी इज़्ज़त के तौर पर फ्रान्सिस्का दे दी।

अब हम इस खुश जोड़े को यहीं छोड़ते हैं और बदकिस्मत की माँ के पास चलते हैं।

जब रानी की सबसे छोटी बेटी घर छोड़ कर चली गयी तभी से उसकी किस्मत का पहिया उलटा घूमने लगा। इससे उसको ऐसा लगा कि वह बुढ़िया सच बोल रही थी।

एक दिन उसका भाई और भतीजा एक बड़ी सेना ले कर आये और उन्होंने अपनी बहिन के राज्य को फिर से जीत लिया। रानी और उसकी छहों बेटियाँ फिर से अपने महल में चली गयीं और फिर से अपने पुराने ऐशो आराम से रहने लगीं।

पर उनके दिमाग से उनकी सबसे छोटी बेटी और बहिन की याद नहीं गयी। उसके बारे में तो जबसे वह घर छोड़ कर गयी थी तबसे किसी ने अब तक कुछ सुना ही नहीं था।

इस बीच राजकुमार ने सुन लिया कि बदकिस्मत की माँ अपने महल में वापस चली गयी है तो उसने बदकिस्मत की माँ को यह सन्देश भेजा कि उसने उनकी बेटी से शादी कर ली है।

उसकी माँ यह सुन कर बहुत खुश हुई और अपने कुछ नौकरों ओर दासियों को ले कर अपनी बेटी से मिलने के लिये चल दी। इसी तरह से बेटी भी अपने कुछ नौकरों और दासियों को ले कर अपनी माँ से मिलने के लिये चल दी।

वे दोनों अपने अपने राज्यों की हदों पर मिलीं। वे सब खुशी के मारे एक दूसरे से बार बार लिपट जातीं थीं। बेटी के मिलने पर दोनों राज्यों में बहुत खुशियाँ मनायी गयीं।



[1] Misfortune (Story No 149) – a folktale from Italy from its Palermo area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino”. Translated by George Martin in 1980.

[2] Translated for the word “Cork”.

[3] Francisca - the name of the washerwoman

[4] Translated for the words “Anise seeds and Sesame seeds”

[5] Translated for the word “Braid”. Braid is a narrow, ropelike band formed by plaiting or weaving together several strands of silk, cotton, or other material, used for trimmimng garments, drapery. etc.

[6] Scale. See its picture above.

[7] This type of scales is called Steelyard. See its picture below the picture of “Scale”

[8] Crown was the currency of Europe in those days

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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