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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 11 तीन व्यापारियों के तीन बेटों की तीन कहानियाँ // सुषमा गुप्ता

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11 तीन व्यापारियों के तीन बेटों की तीन कहानियाँ [1] एक बार तीन व्यापारी थे जिनके तीन बेटे थे। तीनों आपस में बड़े अच्छे दोस्त थे। एक दिन उन ती...

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11 तीन व्यापारियों के तीन बेटों की तीन कहानियाँ[1]

एक बार तीन व्यापारी थे जिनके तीन बेटे थे। तीनों आपस में बड़े अच्छे दोस्त थे। एक दिन उन तीनों ने साथ साथ शिकार पर जाने का प्रोग्राम बनाया सो वे लोग उस दिन जल्दी सो गये।

आधी रात को एक लड़के की आँख खुली तो उसने चाँद देखा तो उसको लगा कि वह तो सूरज है। सो उसने अपने शिकारी वाले कपड़े पहने अपने कुत्तों को साथ लिया और अपने दोस्तों को जगाने चल दिया।

उसके दोनों दोस्त भी जाग गये और इस तरह तीनों रात में ही शिकार के लिये चल दिये। आसमान में बादल छाये थे सो बीच में बारिश भी होने लगी।

पर उन लोगों को कोई ऐसा घना पेड़ नहीं मिला जिसके नीचे वे लोग बारिश से बचने के लिये खड़े भी हो जाते। हाँ कुछ दूर पर उनको एक महल दिखायी दे गया।

वे वहाँ पहुँचे और जा कर उस महल का दरवाजा ज़ोर ज़ोर से खटखटाया।

एक नौकरानी ने दरवाजा खोला और बोली — “यह कोई समय है दरवाजा खटखटाने का? कुछ मालूम भी है कि इस समय क्या बजा है? यह आधी रात का समय है।”

शिकारियों ने पूछा — “क्या हमको यहाँ रुकने की जगह मिलेगी? बाहर बहुत तेज़ बारिश है?”

नौकरानी बोली — “ठहरो मैं अपनी मालकिन से पूछ आऊँ।”

वह अपनी मालकिन के पास गयी और अपनी मालकिन से कहा — “मैम, दरवाजे पर तीन आदमी खड़े हैं। तीनों पानी में खूब भीगे हैं। घर में रुकने के लिये जगह माँगते हैं। क्या मैं उनको अन्दर बुला लूँ?”

“हाँ, उनको अन्दर बुला लो।”

वे लोग अन्दर आ गये और महल की मालकिन के सामने आ कर बैठ गये। उस महल की मालकिन एक सुन्दर विधवा थी। वह बोली — “अपने भीगे कपड़े उतार कर ये सूखे कपड़े पहन लो। ये मेरे पति के कपड़े हैं। और कुछ खा पी भी लो।

फिर तुम लोग मुझे एक एक कहानी सुनाओगे – एक ऐसी कहानी जो तुम्हारे अपने साथ घटी हो। तुम लोगों में से जिसकी भी कहानी सबसे ज़्यादा रोमांच पैदा करने वाली होगी मैं उसी से शादी कर लूँगी।”

उन लोगों ने सबसे पहले तो अपने कपड़े बदले, फिर कुछ खाया और फिर सबसे बड़े लड़के ने सबसे पहले अपनी कहानी सुनानी शुरू की —

“तो सुनिये मैम। मैं एक व्यापारी का बेटा हूँ। एक बार मेरे पिता ने मुझे किसी काम से भेजा तो रास्ते में मुझे एक आदमी मिला जिसने अपने दोनों कान कस कर ढक रखे थे।

मैंने उस आदमी को वहाँ पहले कभी देखा तो नहीं था पर ऐसा लगता था कि वह वहाँ के रास्ते जानता था।

रात हुई तो उसने मुझसे कहा — “आओ मेरे साथ आओ। मुझे एक अच्छी जगह का पता है जहाँ हम लोग सो सकते हैं।”

मैं उसके साथ चल दिया। हम एक अकेले मकान में घुसे और मेरे घुसते ही उस मकान का दरवाजा बन्द हो गया। मैं एक बहुत बड़े कमरे में खड़ा था जिसमें लोहे का एक बड़ा पिंजरा रखा हुआ था। वह पिंजरा आदमियों से भरा हुआ था।

मैंने पिंजरे में बन्द उन आदमियों से पूछा — “कौन हो तुम लोग?”

उन्होंने मुझे इशारे से बताया कि वे तो पिंजरे में बन्द हैं ही मगर बाद में मैं भी उनके साथ साथ उस पिंजरे में बन्द कर दिया जाऊँगा। पर वे यह बात बोल नहीं सकते थे क्योंकि एक बड़े साइज़ का आदमी[2] वहीं खड़ा उनकी चौकीदारी कर रहा था।

यह वही आदमी था जो आदमियों को पकड़ता था और यहाँ ला कर बन्द कर देता था। मुझे भी उस बड़े साइज़ के आदमी ने ला कर पिंजरे में बन्द कर दिया।

मैंने अपने साथी कैदियों से पूछा कि “अब आगे क्या होगा।”

उन्होंने कहा “चुप रहो। रोज सुबह यह बड़े साइज़ वाला आदमी हममें से एक को खा जाता है। इसलिये हम बस चुपचाप बड़े डरे डरे से रहते हैं कि पता नहीं कल किसकी बारी है।

जब वह बड़े साइज़ वाला आदमी हमारे पिंजरे के पास आता है तो हम लोग एक दूसरे के और पास आ जाते हैं।”

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उन्होंने आगे बताया कि समय समय पर जब वह बड़े साइज के आदमी का मन नहीं लगता तो वह अपना गिटार उठाता है और उसको बजाने लगता है।

एक बार जब वह गिटार बजा रहा था तो उसका तार टूट गया तो वह बोला — “अगर पिंजरे में से कोई मेरे गिटार का तार ठीक कर देगा तो मैं उसको आजाद कर दूँगा।”

उसी समय मैंने कहा कि मैं गिटार बनाता हूँ, मेरे पिता भी गिटार बनाते हैं। यहाँ तक कि मेरे बाबा और मेरे कई रिश्तेदार भी गिटार बनाते हैं।”

उस बड़े साइज़ के आदमी ने कहा — “अच्छा अभी पता चल जाता है।” और उसने मुझे अपना गिटार थमा दिया।

clip_image005मैंने उसका गिटार लिया उसके तार को कहीं से कसा कहीं से ढीला किया और ठीक कर दिया। उस बड़े साइज के आदमी ने मेरा सिर थपथपाया और मुझे एक अँगूठी दे कर कहा — “इस अँगूठी को पहन लो तुम आजाद हो जाओगे।”

जैसे ही मैंने वह अँगूठी पहनी तो मैंने अपने आपको पिंजरे के बाहर पाया। अपने आपको पिंजरे से बाहर देख कर तो मैं बहुत खुश हो गया।

बस मैं तुरन्त ही वहाँ से भाग लिया और खेतों से होता हुआ भागता चला गया पर आश्चर्य कि मैं फिर से उस बड़े साइज़ के आदमी के मकान के दरवाजे पर ही खड़ा था।

“अरे यह क्या? मैं तो वहीं आ गया जहाँ से मैं चला था।” सो अब की बार मैं दूसरी दिशा में भागा और भागता ही चला गया पर मैं तो फिर से वहीं उसी के दरवाजे पर आ गया था।

मैं रो पड़ा “मैं यहाँ से कैसे बचूँ?”

उसी समय मुझे लगा कि किसी ने श श श करके मेरा ध्यान खींचने की कोशिश की तो मैंने ऊपर देखा। वहाँ एक खिड़की पर एक छोटी सी लड़की बैठी हुई थी। उसने बहुत ही धीरे से कहा “अगर तुम यहाँ से भागना चाहते हो तो यह अँगूठी हाथ में से निकाल कर फेंक दो।”

मैंने उसको अपनी उँगली में से निकालना चाहा पर वह नहीं निकली। मेरे मुँह से निकला “मैं इसको नहीं निकाल पा रहा।”

“तो अपनी उँगली काट डालो पर इसको निकाल डालो। जब तक तुम यह अँगूठी पहने रहोगे तब तक तुम बार बार यहीं आते रहोगे। जल्दी करो।”

“पर मेरे पास तो चाकू भी नहीं है।”

उस बच्ची ने तुरन्त ही एक चाकू नीचे फेंक दिया और बोली “यह लो चाकू।”

दरवाजे के बराबर में एक खम्भे की तली थी। वहीं मैंने अपना हाथ रखा और उस चाकू के एक ही वार से मैंने अपनी अँगूठी वाली उँगली काट दी। उसके बाद ही मैं अपने घर वापस लौट सका।”

जब तक वह लड़का अपनी कहानी सुनाता रहा वह विधवा बेचारी “ओह बेचारे तुम, ओह बेचारे तुम” ही करती रही। कहानी खत्म होने पर ही उसने चैन की साँस ली।

अब उसने दूसरे शिकारी की तरफ देखा तो उसने अपनी कहानी शुरू की —

“मैम मैं भी एक व्यापारी का बेटा हूँ। एक बार ऐसा हुआ कि मेरे पिता ने किसी दूसरे व्यापारी को देने के लिये मुझे कुछ पैसे दिये। मैं समुद्र में जहाज़ ले कर निकल गया कि थोड़ी ही देर में वहाँ बहुत ज़ोर का तूफान आ गया।

इस तूफान ने हमको मजबूर कर दिया कि हम अपना अपना सामान समुद्र में फेंक दें सो हमने अपना अपना सामान समुद्र में फेंक दिया। इस तूफान के बाद समुद्र बिल्कुल शान्त हो गया और हम समुद्र के बीच में ही चलते रहे।

पर इस बीच हमारा खाने पीने का सामान जल्दी ही खत्म होने लगा और हमारे पास खाने के लिये कुछ भी नहीं बचा।

एक दिन जहाज़ का कप्तान बोला — “भाइयों अब खाने का अकाल पड़ गया है। खाना बिल्कुल भी नहीं है।

इसलिये हम लोग अब अपने अपने नाम एक परची पर लिखेंगे और रोज सुबह उन परचियों में से एक परची निकाली जायेगी। जिसके नाम की परची निकलेगी उसको मार दिया जायेगा और उसका माँस बचे हुए लोगों को खिला दिया जायेगा।”

जरा उस डर के बारे में सोचिये मैम जो यह घोषणा सुन कर हम हर एक के ऊपर छाया होगा। पर अगर हम भूखे नहीं मरना चाहते तो इसके अलावा और हो ही क्या सकता था।

सो हर सुबह एक परची निकाली जाती और जिसके नाम की भी परची निकलती उसको मरना पड़ता। उसको काटा जाता और बचे हुए लोगों को खिला दिया जाता।

अन्त में केवल दो आदमी बच रहे – एक कप्तान और एक मैं। अगले दिन फिर परची निकाली गयी। मैंने सोच रखा था कि अगर कप्तान के नाम की परची निकली तो मैं उसको मार दूँगा।

पर अगर मैं वह बदनसीब निकला तो मैं अपनी ज़िन्दगी के लिये लड़ूँगा।

परची कप्तान के नाम की निकली। वह बेचारा मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला — “मैं हाजिर हूँ मेरे भाई।”

मुझे उसको मारने में बहुत दुख लग रहा था पर मैंने अपनी हिम्मत बटोरी और उसे मार दिया। मैंने उसके शरीर के चार हिस्से किये।

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उसके शरीर के एक चौथाई हिस्से को मैंने रस्सी पर टाँग दिया। एक गरुड़[3] नीचे उतरा और उस चौथाई हिस्से को ले कर उड़ गया।

फिर मैंने उसके शरीर का दूसरा चौथाई हिस्सा भी वही टाँग दिया तो वही गरुड़ दोबारा आया और उसके उस दूसरे चौथाई हिस्से को भी ले गया। मैं बहुत परेशान हुआ।

फिर उसके शरीर का तीसरा चौथाई हिस्सा भी वही गरुड़ ले कर चला गया। अब केवल आखिरी चौथाई हिस्सा बचा था। अब जैसे ही गरुड़ उसको भी लेने के लिये नीचे उतरा तो मैंने उसके पैर पकड़ लिये।

पर वह चिड़िया तो आसमान की तरफ उड़ गयी और वहाँ जा कर बहुत ऊँची उड़ने लगी। मैं उसके पैर पकड़े पकड़े उड़ रहा था और अपनी जान की भीख माँग रहा था।

जब वह एक पहाड़ के ऊपर से उड़ी तो मैंने उसके पैर छोड़ दिये। किसी तरह थोड़ा इधर उधर हो कर मैं चौरस जमीन पर गिर गया और आखिरकार घर आ गया।”

वह विधवा फिर बोली — “ओह तुम बेचारे। यह तो वाकई में बहुत ही डरावना अनुभव था। अब तुम्हारी बारी है।” कह कर उसने तीसरे लड़के की तरफ देखा।

तीसरे लड़के ने शुरू किया —

“मैम मेरी कहानी तो आपके रोंगटे ही खड़े कर देगी। मैं भी एक व्यापारी का बेटा हूँ। एक बार मुझे भी मेरे पिता ने व्यापार के एक काम से बाहर भेजा।

जब रात हुई तो मैं एक सराय में रुका। वहाँ मैंने खाना खाया और फिर अपने कमरे में सोने में चला गया। वहाँ जा कर प्रार्थना करने के लिये मैं अपने बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठा जैसा कि मैं हर रात करता था।

प्रार्थना करते समय बीच में एक ऐसा समय आता है जब मुझे फर्श चूमना होता है सो जैसे ही मैं फर्श चूमने के लिये नीचे झुका तो बिस्तर के नीचे मैंने क्या देखा कि वहाँ एक आदमी पड़ा था।

मैंने उसको पास से देखा तो वह तो मरा हुआ था। मैंने सोचा कि यह आदमी शायद पिछली रात मारा गया होगा और मुझे लगा कि जो कोई भी इस बिस्तर पर सोता होगा उसका शायद यही हाल होता होगा।

तो फिर मैंने क्या किया कि मैंने उस लाश को उठाया और उसको बिस्तर पर लिटा दिया और मैं खुद उस बिस्तर के नीचे लेट गया और अपनी साँस रोक ली।

एक या दो घंटा बीता होगा कि मैंने दरवाजा खुलने की आवाज सुनी। मैंने देखा कि सराय का मालिक अपने हाथ में चाकू लिये अन्दर आया और उसका लड़का नौकर एक हथौड़ा। सराय के मालिक की पत्नी उनके पीछे पीछे एक लैम्प लिये आ रही थी।

उन्होंने कहा — “लगता है कि यह तो गहरी नींद सो रहा है। इसको सोने दो।”

फिर सराय के मालिक ने अपना चाकू वाला हाथ उठाया और उस लाश के सिर के ऊपर रखा और उसके नौकर लड़के ने उसके ऊपर हथौड़ा मारा।

पीछे से सराय के मालिक की पत्नी बोली — “अब इस लाश को उठा कर पलंग के नीचे रख दो और पिछली रात वाली लाश को हम खिड़की से बाहर फेंक देते हैं।”

खिड़की के नीचे गहरी खाई थी। फेंकने की बात सुन कर ही मुझे लगा कि मेरे शरीर की सारी हड्डियाँ चकनाचूर हो गयी हैं।

पर तभी सराय के मालिक की पत्नी बोली — “ऐसा करते हैं कि अभी हम रात भर के लिये सब कुछ ऐसे ही छोड़ देते हैं। कल सुबह देखेंगे कि हम क्या कर रहे हैं।”

सो वे सब कुछ वैसा ही छोड़ कर वहाँ से चले गये और मैंने चैन की साँस ली। मैं दिन निकलने का इन्तजार करता रहा।

जब सूरज निकल आया मैं खिड़की पर गया और शहर वालों को इशारा किया जो उस खाई के उस पार थे। उन्होंने वहाँ से सिपाही भेज दिये जिन्होंने मुझे वहाँ से आजाद कराया और सराय के मालिक को गिरफ्तार कर लिया।”

वह विधवा बेचारी सोच रही थी किस लड़के की कहानी सबसे ज़्यादा रोमांचक थी। तुम्हारा तो पता नहीं पर वह इस बारे में अभी तक सोच ही रही है।

सोचते सोचते वह विधवा बहुत बुढ़िया हो गयी है और वे लड़के भी बहुत धीरज वाले हैं कि वे तीनों अभी भी उसके नतीजे का इन्तजार कर रहे हैं।


[1] Three Tales by Three Sons of Three Merchants (Story No 163) – a folktale from Italy from its Palermo area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Translated for the word “Giant”

[3] Translated for the word “Eagle”. See the picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,618,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 11 तीन व्यापारियों के तीन बेटों की तीन कहानियाँ // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 11 तीन व्यापारियों के तीन बेटों की तीन कहानियाँ // सुषमा गुप्ता
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