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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 3 चोर फाख्ता // सुषमा गुप्ता

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3 चोर फाख्ता [1] एक बार एक राजा और रानी की एक बेटी थी जिसके बहुत सुन्दर और लम्बे बाल थे जिनको वह किसी को छूने नहीं देती थी। वह खुद ही उनमें ...

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3 चोर फाख्ता

[1]

एक बार एक राजा और रानी की एक बेटी थी जिसके बहुत सुन्दर और लम्बे बाल थे जिनको वह किसी को छूने नहीं देती थी। वह खुद ही उनमें कंघी करती और खुद ही उनको सँवारती थी।

एक दिन जब वह अपने बाल सँवार रही थी तो उसने अपनी कंघी खिड़की पर रख दी। उसी समय एक फाख्ता[2] वहाँ आयी और उस कंघी को ले कर उड़ गयी।

“ओह मेरे भगवान। यह फाख्ता तो मेरी कंघी ही ले कर उड़ गयी।” जब तक वह कुछ करती तब तक तो वह फाख्ता वहाँ से काफी दूर जा चुकी थी।

अगली सुबह राजकुमारी फिर उसी खिड़की के पास बैठी अपने बाल संवार रही थी कि वही फाख्ता फिर से आयी और उसके बालों में लगाने वाला क्लिप उठा कर ले गयी।

तीसरे दिन अभी उसने अपने बाल खोले भी नहीं थे और उसके कन्धे पर अभी कपड़ा पड़ा ही था कि वही फाख्ता फिर से आयी और उसका कपड़ा उठा कर ले गयी।

इस बार राजकुमारी बहुत दुखी हुई। उसने अपनी रेशम की सीढ़ी नीचे गिरायी और उस सीढ़ी से उतर कर फाख्ता के पीछे भागी।

पर यह फाख्ता और दूसरी फाख्ताओं की तरह से उड़ नहीं गयी बल्कि अपने पीछे पीछे उसके आने का इन्तजार करती रही और जब वह पास आ जाती तो फिर थोड़ी दूर उड़ जाती। यह देख कर राजकुमारी उससे और ज़्यादा गुस्सा हो गयी।

पर इस तरह से थोड़ी थोड़ी दूर भगाते भगाते वह फाख्ता राजकुमारी को जंगल तक ले आयी। वहाँ जंगल में एक अकेला मकान खड़ा था। वह फाख्ता उस मकान में घुस गयी।

मकान का दरवाजा खुला हुआ था सो राजकुमारी को उस मकान में एक सुन्दर नौजवान बैठा दिखायी दे गया। राजकुमारी ने उससे पूछा — “क्या तुमने यहाँ किसी फाख्ता को मेरा कपड़ा लाते देखा है?”

नौजवान बोला — “हाँ देखा है। मैं ही वह फाख्ता हूँ जो तुम्हारा कपड़ा ले कर उड़ गया।”

“तुम?”

“हाँ मैं।”

“यह कैसे हो सकता है?”

“मेरे ऊपर परियों ने जादू डाल रखा है कि मैं आदमी के रूप में अपने इस घर के बाहर नहीं जा सकता जब तक कि तुम इस मकान की खिड़की पर एक साल, एक महीने और एक दिन के लिये धूप में और तारों की रोशनी में उस पहाड़ की तरफ देखती हुई न बैठो जहाँ मैं फाख्ता के रूप में उड़ता रहूँगा।”

बिना किसी हिचक के राजकुमारी उसके मकान की खिड़की पर बैठ गयी। वह नौजवान वहाँ से फाख्ता बन कर उड़ गया और जा कर सामने वाले पहाड़ पर बैठ गया।

एक दिन गुजरा, दो दिन गुजरे, तीसरा दिन गुजरा। राजकुमारी वहीं पहाड़ की तरफ देखती बैठी रही। हफ्ते गुजर गये वह वहीं दिन रात बैठी रही। ऐसा लगता था जैसे कि वह लकड़ी की बनी हो।

धीरे धीरे वह साँवली पड़ती गयी और फिर इतनी काली पड़ गयी जितना कि अँधेरा। इस तरह वह वहाँ एक साल, एक महीना, और एक दिन बैठी रही। समय खत्म होने पर वह फाख्ता आदमी में बदल गयी और फिर वह आदमी पहाड़ पर से नीचे आ गया।

जब उस नौजवान ने देखा कि राजकुमारी कितनी काली हो गयी है तो वह चिल्लाया — “ओह यह तुम कैसी हो गयी? क्या तुमको अपनी इस शक्ल से मेरे सामने आते में शरम नहीं आ रही? जाओ यहाँ से।” और यह कह कर उसने उसके ऊपर थूक दिया।

यह देख कर तो वह लड़की भौंचक्की रह गयी। यह क्या हो गया। उसने तो उसको उसके शाप से आजाद करने की कोशिश की और उसने उसके साथ ऐसा बरताव किया।

वह परेशान हो कर दुखी हो कर रोती हुई वहाँ से चली गयी। जाते समय वह एक जंगल से गुजर रही थी कि वहाँ उसको तीन परियाँ मिलीं।

परियों ने उससे पूछा — “क्या बात है तुम इतनी दुखी क्यों हो?”

रोते हुए उसने उनको अपनी सारी कहानी सुना दी।

परियाँ बोलीं —“तुम चिन्ता न करो। तुम बहुत दिनों तक ऐसी नहीं रहोगी।”

पहली परी ने उसके गालों को सहलाया तो वह फिर से बहुत सुन्दर हो गयी। बल्कि पहले से भी ज़्यादा सुन्दर हो गयी। वह अब सूरज चाँद की तरह से चमकने लगी।

दूसरी परी ने उसको छुआ तो वह एक शाही पोशाक में सज गयी। तीसरी सबसे छोटी परी ने उसको एक टोकरी भर कर जवाहरात दिये।

यह करके परियाँ बोलीं —“अब हम तीनों तुम्हारे साथ हमेशा तुम्हारी नौकरानी के वेश में रहेंगी।”

फिर वे सब उस देश में पहुँचीं जिस देश का वह नौजवान राजा था। पलक झपकते ही उन परियों ने उस राजा के महल के सामने एक महल खड़ा कर दिया जो उसके महल से कहीं ज़्यादा खूबसूरत था – सौ गुना ज़्यादा खूबसूरत।

राजा ने बाहर की तरफ देखा तो उसको वह आश्चर्यजनक महल दिखायी दिया तो उसको लगा कि वह तो सपना देख रहा था। इतना सुन्दर महल तो उसने पहले कभी नहीं देखा था।

उसकी एक खिड़की पर उसको एक राजकुमारी बैठी नजर आयी। तो उसको देख कर तो वह उससे प्यार ही कर बैठा।

परियों ने कहा — “अगर वह तुमसे मिलना चाहे तो उसको मिलने के लिये उत्साहित करना।”

पहले दिन तो राजा उसको देखता रहा। दूसरे दिन उसने उसकी तरफ देख कर ऑखें झपकायीं और तीसरे दिन उसने उससे पूछा कि क्या वह उससे मिलने आ सकता था।

राजकुमारी ने जवाब दिया — “योर मैजेस्टी, अगर आप मुझसे मिलने आना चाहते हैं तो पहले अपने छज्जे से मेरे छज्जे तक गुलाब के पंखुड़ियों का दो इंच मोटा कालीन बिछायें।”

राजा ने उसको अपनी शर्त पूरी तरह से कहने भी नहीं दी कि उसने अपने नौकरों को ऐसा एक कालीन बिछाने का हुकुम दे दिया जो गुलाब की पंखुड़ियों का बना हो और दो इंच मोटा हो।

बहुत सारी स्त्रियाँ गुलाब की पंखुड़ियाँ तोड़ने में लग गयीं। ऐसा तो पहले कभी किसी ने देखा नहीं था सुना नहीं था।

जब गुलाब की पंखुड़ियों का कालीन बिछ गया तो परियों ने राजकुमारी से कहा “अब तुम एक बहुत ही शानदार राजकुमारी की तरह से तैयार हो जाओ और इस कालीन पर चलो। जब तुम आधे रास्ते पहुँच जाओ तो बस तुम राजा को यह दिखाना कि तुम्हारे पैर में एक काँटा चुभ गया है। बाकी हम देख लेंगे।”

सो राजकुमारी उस गुलाब की पंखुड़ियों से बने कालीन पर चली। वह गुलाबी रंग की पोशाक पहने थी। दूसरी तरफ राजा उसका बेसब्री से इन्तजार कर रहा था। राजकुमारी ने उसको कालीन पर पैर रखने से मना कर रखा था।

जब वह आधे रास्ते पहुँची तो चिल्लायी “अरे मैं मरी। मेरे पैर में तो काँटा चुभ गया।” और उसने बेहोश होने का बहाना किया।

यह देख कर परियों ने उसको पकड़ा और उसको वापस उसके महल ले चलीं। राजा उसकी सहायता के लिये जाना चाहता था पर राजकुमारी ने उसको उस कालीन पर चलने से मना कर रखा था इसलिये वह उसके कहने के अनुसार वहीं रुक गया।

अपने महल से उसको राजकुमारी के महल में डाक्टर आते जाते दिखायी दे रहे थे। आखिर में उसको एक पादरी[3] भी दिखायी दिया। बस केवल राजा को ही उसके पास जाने की इजाज़त नहीं थी बाकी तो बहुत सारे लोग उसके पास तक आ जा रहे थे।

उसने फिर उड़ती उड़ती खबर सुनी कि उस काँटे से राजकुमारी की टाँग इतनी सूज गयी कि उसकी तबीयत बहुत खराब होती जा रही थी। 40 दिन बाद उसने सुना कि राजकुमारी की बीमारी कुछ ठीक हो रही थी।

जब यह बात बाहर फैली तो राजकुमार ने फिर से उससे मिलने की बात की। परियाँ फिर बोलीं — “उससे कहो कि तुम उससे मिलोगी पर इस बार उसको तीन इंच मोटा चमेली के फूलों की पंखुड़ियों का कालीन बिछवाना होगा। और जब तुम उस कालीन पर आधी दूर पहुँचो तो फिर से काँटा चुभने का बहाना करना।”

तुरन्त ही राजा ने अपने लोगों को चमेली के फूलों को तोड़ने पर लगा दिया। बहुत जल्दी ही उन फूलों की पंखुड़ियों का तीन इंच मोटा कालीन राजकुमारी के महल से राजा के महल तक बिछा दिया गया।

जब राजकुमारी उस कालीन पर जाने लगी तो आधी दूर जाने पर वह चिल्लायी “अरे मैं तो मर गयी। एक काँटा मेरे पैर में चुभ गया।” और वह चक्कर खा कर गिर पड़ी कि बीच में ही उसकी परियों ने उसको सँभाल लिया और वे उसको उसके महल वापस ले गयीं।

राजा बेचारा फिर बहुत परेशान हुआ। उसने अपने कई नौकर उसके पास भेजे पर उनमें से किसी को भी उससे मिलने नहीं दिया गया। और वह बेचारा राजकुमार दीवार से ही अपना सिर फोड़ता रह गया।

इस धक्के से वह खुद बीमार पड़ गया पर फिर भी वह अपने नौकर को राजकुमारी की तबीयत का हाल जानने के लिये उसके महल में भेजता रहा।

जब उससे नहीं रहा गया तो खुद बीमार होते हुए भी उसने उससे मिलने की इजाज़त माँगी क्योंकि वह उससे शादी करना चाहता था। राजकुमारी ने कहा — “अब मैं उसके पास तभी आऊँगी जब मैं उसको ताबूत[4] में लेटा देखूँगी।”

यह जवाब सुन कर तो राजा का दिमाग ही घूम गया पर फिर भी उसने एक ताबूत तैयार करवाया जिसके चारों तरफ मोमबत्तियाँ लगी हुई थीं। अपने आपको मरा हुआ दिखाते हुए वह उस ताबूत में लेट कर राजकुमारी की खिड़की के नीचे से निकला।

वहाँ पहुँच कर उसके नौकरों ने कहा — “देखिये राजकुमारी जी, हमारे मरे हुए राजा को।”

राजकुमारी बाहर अपने छज्जे पर गयी और बोली — “उफ, तुम इतना नीचे गिर गये हो? तुमने यह सब एक लड़की के लिये किया?” और यह कह कर उसके ऊपर थूक दिया।

यह सुन कर और यह देख कर उस राजा को याद आया कि उसने उस भली लड़की के साथ क्या किया था जो अँधेरे की तरह काली थी।

पर उसको अब लग रहा था कि वह लड़की इस लड़की से कोई ज़्यादा अलग नहीं थी जिसको वह प्यार करता था। अचानक उसको लगा कि वह काली लड़की और यह राजकुमारी तो दोनों एक ही थीं।

तुम सोच सकते हो कि अब उसको कैसा लग रहा होगा। वह तो यह सोच कर ही झूठी लाश की बजाय सच्ची लाश जैसा हो गया।

पर उसी समय वे तीनों परियाँ वहाँ आ गयीं और उससे बोलीं कि उसकी राजकुमारी उसका इन्तजार कर रही थी। राजा उठ कर अन्दर गया और राजकुमारी से माफी माँगी।

शाही चौपाल खोला गया और उन दोनों की शादी हो गयी। राजा उन तीनों परियों को अपने पास रखने के लिये बहुत इच्छुक था पर उन्होंने उन दोनों को विदा कहा और वहाँ से चली गयीं। वह राजकुमार और राजकुमारी फिर बहुत दिनों तक खुशी खुशी रहे।


[1] The Thieving Dove (Story No 153) – a folktale from Italy from its Palermo area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Translated for the word “Dove”. See its picture above.

[3] Translated for the word “Priest”

[4] Translated for the word “Coffin”. See its picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 3 चोर फाख्ता // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 3 चोर फाख्ता // सुषमा गुप्ता
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