शनिवार, 11 नवंबर 2017

व्यंग्य // दुखती आँख // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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आज सुबह उठा तो आँख खुल नहीं रही थी। वैसे तो रोज़ ही उठते-उठाते कुछ समय लग ही जाता है। आँख खुलते खुलते ही खुलती है। लेकिन आज ऐसा लग रहा था कि मानों आँखों में कुछ पड़ गया हो। किरकिरा रही थीं। खैर जैसे-तैसे उठा, उठना ही पड़ा। देखते ही पत्नी बोली, अरे, ये आँखें लाल क्यों हो रही हैं,… मैंने तो कुछ बोला भी नहीं। “क्या बात करती हो ?” मैंने कहा, “मेरी हिम्मत जो तुम्हारे सामने अपनी आँखें लाल कर सकूँ?”

मज़ाक नहीं तुम्हारी दोनों ही आँखें लाल हैं। लगता है आ गईं हैं। “लेकिन वो ‘गई’ ही कब थीं, जो अब ‘आ’ गई हैं।” मैंने कहा।

बहरहाल वह मानी नहीं। मुझे आँख के अस्पताल जाना पडा। अब मैं और डाक्टर दोनों आमने सामने थे| दिन का वक्त था और डाक्टर के हाथ में टार्च थी। पता नहीं दिन के उजाले में वह टार्च से क्या देखना चाह रहा था।

इससे पहले कि मैं अपनी तकलीफ के बारे में उसे कुछ बताऊँ वह बोला, “आँख दिखाइए”। मुझे पहला व्यक्ति ऐसा मिला जिसने कभी मुझसे कहा हो कि मुझे आँख दिखाओ। मैं, और वह भी एक डाक्टर को, आँख दिखाऊँ, मेरी क्या मजाल ! मुझे याद है कि बचपन में कभी कोई गलती कर बैठता था तो मेरी माँ मुझे जैसे ही आँख दिखाती थी, मैं डर जाता था। माँ की आँख का वह डर आज भी मेरी आँखों में बदस्तूर कायम है। मुझे आज भी यह बड़ा ज़रूरी लगता है कि माँ की तरह गलतियों पर आँख दिखा कर डराने- धमकाने वाला कोई तो हो। लेकिन आज की स्थितियां बिलकुल बदल गई हैं और बेमुरव्वत भी हो गई हैं। बात हो न हो, हर कोई हर किसी को कुछ इस तरह आँख दिखा रहा है, मानो खाने को दौड़ रहा हो।

डाक्टर ने मेरी बाईं आँख के ऊपर और नीचे अपनी उँगलियों से आँख को चौड़ाकर पूरा खोल दिया और उसमें टॉर्च की रोशनी घुसेड़ दी। चकाचौंध से मेरी आँख बंद होने की कोशिश करने लगी लेकिन डाक्टर की उँगलियों की जकड़ से वह खुली रहने के लिए मजबूर थी। आँख का मुआइना किया गया, और कहा अब आँखें बंद कर लीजिए। मेरी आँख में तकलीफ थी सो मैंने झट से अपनी आँखें बंद कर लीं। वैसे भी, मैं ही क्या आप सब भी, जब भी कोई तकलीफ देखते है, आँखें बंद कर ही लेते हैं। कौन पचड़े में पड़े। सोच कर आगे बढ़ जाते हैं। किसी की भी तकलीफ को जान बूझ कर अनदेखा कर देना हम सबकी आदत में शुमार हो गया है। सो डाक्टर ने जब कहा, आँखें बंद कर लो तो मुझे इसके लिए कोई अलग से प्रयत्न नहीं करना पडा। आँख में तकलीफ थी और मैं चाह कर भी देखना चाह नहीं रहा था।

न देखने के कितने ही बहाने होते हैं। कभी वाह्य परिस्थितियाँ ही इतनी विकट होती हैं की उन्हें सुधारा ही नहीं जा सकता। ऐसे में उनसे आँखें ही फेर ली जाएं, वह ज्यादह अच्छा है। कभी पुलिस का डर रहता है; कौन चाहेगा कि होम करने चलो और खुद की ही उंगलियाँ जला लो। झंझट में न पड़ा जाए, यही अच्छा है। पुलिस का क्या है, बचाने वाले को ही फंसा दे। भला इसी में है की आँखें बंद रखो।

डाक्टर अब पर्चा लिखने लगा था। तीन तरह की दवाइयां उसने लिख मारी। एक खाने की और एक आँखों में डालने की। एक रात में सोते समय नींद आने के लिए। खाने की गोली दिन में तीन बार गटकनी थी। आँख में डालने की दवा भी दो-दो बूंद करके दिन में तीन बार ही डालनी थी। दवा खाने और दवा डालने के बीच एक एक घंटे का अंतराल भी ज़रूरी था। मैंने हिसाब लगाया सारा दिन ही, दवा खाते-डालते बीत जाएगा। बीता। लेकिन रात में कम से कम करवटें नहीं बदलने पडीं। नींद की दवा अपना काम करती रही। लेकिन श्वेत, श्याम, रतनार आँखों को सिर्फ रतनार लालिमा ही पसंद आई और वे लाल ही बनी रहीं।

यह बहुत कुछ ऐसा ही था कि जैसे गरीबी हटाओ का हर सरकार ने अपनी अपनी तरह से प्रयत्न किया लेकिन आँखों की लालिमा की तरह वह हटी ही नहीं। आँखें रतनार थीं सो रतनार ही बनी रहीं और गरीबी अपने रंग दिखाती रही। गरीबी का रंग घटने की बजाय और विस्तार पाता गया। तसल्ली ज़रूर दी गई कि गरीबी हट जाएगी, बस, हटने ही वाली है। लेकिन गरीबी टस से मस नहीं हुई। गरीब की जोरू ठहरी। कैसे छोड़ दे उसे। हम रोज़ सुनते हैं, अच्छे दिन आवेंगे, बस आने ही वाले हैं। थोड़ी प्रतीक्षा करें। अब ग़ालिब ने कहा है या नहीं, पता नहीं; लेकिन ग़ालिब का ही नाम लेकर लोग कहते हैं, वस्ल से बेहतर होता है इंतज़ार। सो इंतज़ार किया जा रहा है।

इलाज शुरू हो गया है। इंतज़ार कर रहा हूँ। उम्मीद है, मेरी आँख के अच्छे दिन आएँगे। और अच्छे दिनों की शायद चिर प्रतीक्षा नहीं करने पड़े।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा {९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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