शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

व्यंग्य // राष्ट्रीय व्यंजन // डा.सुरेन्द्र वर्मा

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भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है, राष्ट्रीय पशु गाय होते-होते रह गई, राष्ट्रीय फूल गुलाब माना जा सकता है, राष्ट्रीय स्वर तो लता- मंगेशकर का सर्वमान्य है ही। पर भारत का राष्ट्रीय व्यंजन क्या होना चाहिए, इस पर अभी तक विचार-विमर्श नहीं हुआ है। भारत सरकार भी बहुत पसोपेश में है। कहीं से एक सुझाव आया कि “खिचड़ी” को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित कर देना चाहिए। सो खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित करने के लिए खिचड़ी पकने लगी। फिर क्या था, खिचड़ी के पक्ष और विपक्ष में पूरी शिद्दत से दलीलें और तर्क दिए जाने लगे। मामला इतना गरमाया कि खिचड़ी खदबदाने लगी। केन्द्रीय प्रसंस्करण मंत्री को अंतत: स्पष्ट घोषणा करने पड़ी कि कृपया शांत रहिए, खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित नहीं-ईं-ईं किया जा रहा है।

पर इससे क्या होता है? खिचड़ी तो व्यंजनों में व्यंजन है। देश के हर कोने में किसी न किसी रूप में पकाई जाती है। इतना ही नहीं, हर किसी ने मिलजुल कर कभी न कभी खिचड़ी न पकाई हो, ऐसा हो नहीं सकता। मैं तो कहता हूँ बड़ा अच्छा हुआ खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित नहीं किया गया, अन्यथा बड़ी दुर्गति हो जाती बेचारी की। उसका सर्वमान्य राष्ट्रीय रुतबा ही ख़त्म हो जाता। प्रांत दर प्रांत, खिचड़ी और खिचड़ी के बीच दरारें पड़ जातीं। आप ही बताएं, सरकारी घोषणा अभी तक कभी असरकारी हुई है भला !

कहते हैं खिचड़ी का सबसे पहला ज़िक्र आयुर्वेद में हुआ है। आयुर्वेद में खिचड़ी एक हल्का भोज्य पदार्थ है जिसे बीमार और कमज़ोर लोगों को दिया जा सकता है। किन्तु ऐसा उल्लेख कहीं नहीं है कि खिचड़ी स्वादिष्ट नहीं होती और उसे स्वस्थ लोगों को नहीं खाना चाहिए। पर कुछ लोगों को अबतक यह गलत-फहमी है कि खिचड़ी बीमारों का ही खाना है। सच तो यह है कि खिचड़ी बीमारों का ‘भी’ खाना है। स्वस्थ हो या अस्वस्थ, हर कोई खिचड़ी बड़े स्वाद से खाता है। गरीब हो या अमीर दोनों ही खिचड़ी खाते पाए गए हैं। खिचड़ी तो आम या ख़ास, सभी का एक ख़ास व्यंजन है।

संक्रांति एक ऐसा पर्व है, जब पूरे भारत में किसी न किसी रूप में खिचड़ी पकाई और खाई जाती है। यह खिचड़ी खाने का ‘वार’ है, सोमवार से रविवार तक के वार तो हर साल कई बार झेलने पड़ते है पर खिचडवार वर्ष में एक ही बार ‘मनाया’ जाता है। यह अपने आप में एक उत्सव है। खिचड़ी और संक्रांति एक दूसरे से इस कदर मिल जुल गए हैं कि संक्रांति को सिर्फ खिचड़ी भी कह दें तो आशय संक्रान्ति पर्व से है, लोग समझ ही जाएंगे।

पिछली बार एक राजनेता संक्रांति के अवसर पर भाषण दे रहे थे, बोले खिचडी प्रतीक है मेल मिलाप का, जब तक चावल के साथ कोई दाल-वाल मिलाई न जाए खिचडी बनती ही नहीं। इन दिनों केंद्र में हमारी मिली-जुली सरकार है। खिचडी सरकार है। हम सब मिल-जुल कर ही खिचडी पकाते हैं। मेलजोल का दिखावा करने के लिए राजनीति में भोज का सहारा लिया जाता है। गैर-मुस्लिम राजनेता इफ्तार की पार्टी देते हैं। देखा-देखी गैर-हिन्दू नेतालोग संक्रांति पर खिचड़ी की दावत देने लगे हैं।

राजनीति के इतिहास में, जैसा कि हम जानते ही हैं, खिचड़ी का ज़िक्र सबसे पहले बीरबल के समय में आया था, बीरबल की यह खिचड़ी खूब प्रसिद्ध हुई। आज भी लोग उसके चटखारे लेते हैं।

मेरे एक मित्र हैं। यही पचास-पचपन की उम्र होगी। हमेशा बस अक्ल’मंदी’ की बात करते हैं। मुझसे रहा नहीं गया। पूछ ही बैठा – आप शुरू से ही अक्लमंद रहे हैं या अब हो गए हैं ? बोले, अब हो गया हूँ। जबतक बाल खिचड़ी न हो जाएं, कोई अक्लमंद नहीं हो सकता, जनाब !

खिचड़ी के क्या कहने ! जो चिड़ी खाते हैं वे खिचड़ी का स्वाद क्या जाने ! खिचड़ी तो अपने ही परिवार के स्वनाम धन्य, पुलाव और बिरियानी सरीखे. व्यंजनों से भी अधिक स्वादिष्ट होती है, बनाई जा सकती है। बस मेल-जोल की बात है। खिचड़ी के संग उसके चारों यार भी यदि साथ रहें तो कोई व्यंजन उसका मुकाबला नहीं कर सकता। आप तो जानते ही हैं –खिचड़ी के चार यार, घी पापड़ दही अचार !

आपको ताज्जुब होगा, जब से प्रांतीय भिखारियों ने सुना है कि खिचड़ी एक राष्ट्रीय व्यंजन होने जा रहा है, वे केंद्र के सामने झोली फैलाए खड़े हैं और भीख मानो कुछ इस तरह मांग रहे हैं – दे दे, खिचड़ी के नाम पर दे दे। तेरी-मेरी खिचड़ी सदा पकती रहे !

-सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद, -२११००१

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  1. बढ़िया व्यंग.... राजीनीति बिना खिचड़ी के नहीं होती और खिचड़ी राजनीति ही सही राजनीति है.. इसी कारण से ही खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन घोषित कर देना चाहिए... हा हा.. बढ़िया व्यंग...

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