रविवार, 19 नवंबर 2017

शबनम शर्मा की कविताएँ

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सोने की चिड़िया


सोने की चिड़िया कहलाने वाला,
ऋषियों का देश बतलाने वाला,
यह भारत देश क्या से क्या हो गया,
सोना मिट्टी बनता चला गया,
और ऋषि चंबल में जाते चले गये।


     संस्कृति जो संसार का मुकुट
     कहलाती थी,
     सौम्य, सभ्य और सिमटी सी थी,
     आज कितनी छिछली, घिनौनी
     बनती जा रही है।
     देश की नारी, पुरुषों से लगाई
     दौड़ में, अपना पूजनीय स्थान
     खोती जा रही है।


जी चाहता है, मेरी बात
कोई समझे,
कि इस धरा पर सिर्फ
मानव जन्म लेता है,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई नहीं।
फसादों में खुद को फंसा के
कितना खुश होता है ये आदमी
और सोचता ही नहीं, कि हर किसी
शर्त पर, सिर्फ आदमी को खोता है आदमी।


     छोड़ पराये चक्करों को
     असलियत पर आना होगा
     अमन, शांति और अहिंसा अपनाकर
     भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाना होगा।


इक माँ का दूजी माँ को पैगाम


आंसुओं में डूबी इक माँ ने,
दूजी माँ के पास ये पैगाम
भेजा है, कि उसने अपने दिल
के टुकड़ों को, माँ की रक्षा
के लिये सरहदों पर भेजा है,
उसकी अपनी जिन्दगी, अब
श्मशान से कम नहीं,
रात-दिन उसे इक अजीब
सा अंदेशा रहता है।


     पाला-पोसा, कूट-कूट कर
     भरी वीरता उसमें,
     मैंने अपने लाल को, मौसी
     के घर भेजा है,
     रक्षा तेरी वो कर सके,
     उसे भरपूर शक्ति देना,
     दुश्मनों के छक्के छुड़ा दे,
     उसे वो साहस देना।
     पर इक गुज़ारिश है मेरी
     तुझ से ये धरती माँ,
     हो सके तो लाल मेरा
     मुझको तू लौटा देना।



मेरा हिमाचल


धरती पर जन्नत है
आसमान जिसका निर्मल है
मदमस्त हवा, निर्मल जल
अपने आगोश में लिये,
सीधे-सादे पेड़ जहाँ बातें करें
उस अम्बर से
कहें, बता हमें राज़ अपना,
क्यूँ नीला दिखता सिर्फ यहाँ,
बोलते पर्वत, छनकती नदियाँ,
स्वर्ग की अपसराओं का सा
कसमकसाता यौवन,
भोली-भाली, सतयुगी सूरतें,
ईमानदारी से भरे दिल,
कहते हैं हमारी पुरानी सभ्यता को,
आ आँगन में हमसे मिल।
छल, फरेब, घोटालों से परे,
उल्टे कानून जहाँ रह जायें
धरे के धरे,
ये देवों की भूमि, ये मणिकों
की धरा, जिसे शत-शत प्रणाम
करता हर शीश नरा
इसके यौवन में चंदन की खुशबू आये,
है कौन जिसे मेरा हिमाचल न भाये,
इन सर्पीली सड़कों के, तो मदमस्त नज़ारे,
इन्द्र भी करे, यहाँ स्वर्ग से इशारे।
गर्व से कहो, हम हिमाचली हैं
ठाठ से कहो, हम हिमाचली हैं
कुछ ऐसा करो कि हिमाचल ही नहीं
पूरा देश हम पर गर्व कर उठे, सभी कहें हमें,
ये निश्चल, पवित्र, ये देवों की भूमि हिमाचल।


सुनो वतन के ठेकेदारों


ऐ वतन के ठेकेदारों, सुनो
धरती बेवक्त काँप उठती,
चूड़ियों का रंग फीका दिखता,
हर आँख खौफ़ से भर जाती,
हर गली से खंजर निकलता होता,
हर मकान हिल जाता,
किलकारियाँ, सिसकियों में बदल जाती,
धुंआ माहौल में घुल जाता,
बूढ़ी आँखें न जाने किस खौफ से,
टिकटिकी बाँध लेती,
कोई लम्हा भी आज़ाद न होता,
ग़र तुम सरहद पर न जाते।


     जान हथेली पर रखकर जाने वालो,
     आज कामयाबी का सेहरा बाँध आने वालो,
     आज हम गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं,
     तुम्हारे आगमन में आँखें बिछा रहे हैं,
     खुशी अपनी तुम्हें दिखा सकते नहीं,
     शब्द तारीफ़ के गुनगुना सकते नहीं,
     तुम ही हमारे भारत की तकदीर हो,
     टूटे जो न कभी वहीं प्यारी तस्वीर हो,
     चूम लें तुम्हारे कदमों तले की मिट्टी को,
     लगा माथे पे चंदन बना दें उस मिट्टी को,
     आज तुम्हारे आने से धन्य ये धरा हो गई,
     मन भी पुलकित हो गये, शाम सुनहरी हो गई।


गीत


हम हैं बच्चे भारत माँ के - 2,
जय हिन्द हमारा नारा है,
बुरी नज़र हम पर मत डालो,
जय हिन्द हमारा नारा है।
     अमन, शांति और अंहिसा,
     यही तो हमको प्यारा है,
     बुरी नज़र हम पर मत डालो,
     जय हिन्द हमारा नारा है।
     हम हैं बच्चे..................


जो कोई भी हमको छेड़ेगा,
सोच लो सब कुछ हारा है
बुरी नज़र हम पर मत डालो,
जय हिन्द हमारा नारा है।
हम हैं बच्चे..................


     वक्त पड़ने पर शीश भी हमने
     इस पर कई बार वारा है
     बुरी नज़र हम पर मत डालो,
     जय हिन्द हमारा नारा है।   
     हम हैं बच्चे..................


सहस्त्र वीरों का बल हम रखें,
असंख्य दुश्मन ललकारा है,
खुद जिओ औरों को भी जीने दो,
यही संकल्प हमारा है,
बुरी नज़र हम पर मत डालो,
जय हिन्द हमारा नारा है।


मेरी जिन्दगी के वो निश्चल पल


मेरी जिन्दगी के वो निश्चल पल
जो तेरी आगोश में निकले,
कुछ सहमे-सहमे, कुछ बिखरे-बिखरे,
उनको समेटकर तुम अपने दिल में,
चल दिये यूँ दावतें प्यार की बांटते
मुझे कि फिर कब आयेंगे, मेरी
जिन्दगी के वो निश्चल पल।


     समय गुहार करता, मनौतियाँ माँगता,
     समय से कुछ कह रहा,
     कुछ लब हिले, कुछ चक्षु मिले,
     पूछते हैं कि कब आयेंगे वो
     मेरी जिन्दगी के निश्चल पल।


रात-दिन लम्बी चादर लिये,
द्रोपदी के चीरहरण की तरह,
लम्बे दर लम्बे होते चले गये,
तेरी याद में काटे नहीं कटते,
क्षण-क्षण मेरे दिल से पूछते
हैं कि कब आयेंगे मेरी
जिन्दगी के वो निश्चल पल।


पीपल का पेड़


सदियों पुराना, दादाओं का दादा,
गाँव के उस छोर पर खड़ा
पीपल का पेड़,
दिन बीते, माह बीते, बरस बीते,
दशक बीते, सदियाँ बीत गई,
इंसान पुश्त दर पुश्त गया,
पर, एक टाँग पर खड़ा,
देखता रहा बदलते युगों को,
ये पीपल का पेड़।


दुनियाँ क्या से क्या हो गई,
राजाओं के महल ढह गये,
पुरानी संस्कृति विलुप्त हो गई,
नई सभ्यता ने जन्म लिया, पर
सबको ताकता रहा पीपल का पेड़।
सदियों तक पूज्य रहा, सभ्य रहा, बना रहा,
आभूषण ये पीपल का पेड़।


आज यह पूज्य नहीं, सभ्य नहीं,
चुपचाप काटा जाता है इसे
वह भी लोगों की तरह अंधा, बहरा,
गूंगा बन जाता है।
देखता है सिर्फ उसके आँसू
ये गगन, ये हवा और देते हैं
आवाज़, चुप हो जा, समझौता
कर ले। सह लेता है असंख्य वज्र
मूक खड़ा ये पीपल का पेड़।

मेरा जीवन


मेरा जीवन सरिता के वेग सा
बहता चला गया,
पत्थरों पर सैकड़ों प्रहार जैसे
सहता चला गया,
मूक बन गया वह पहाड़
उस वन के तरू भी
मुँह मोड़ गये, जब यह
ज़माना हम पर बेबाक
जुल्म करता चला गया
मेरा जीवन.......


पानी की तरह निर्मल मन,
कुछ कहने को आतुर होता,
अंगारों के आगोश में, यह
तपन, गरमाहट व दर्द
सहता चला गया
मेरा जीवन........


पता मुझे न चला
कब सर्द हवा हमसे
मुख मोड़ गई
वर्षा की बूंदों में मेरा
हर दर्द आँसू धोता चला गया
मेरा जीवन......


इन्तज़ार रहा उन लम्हों का,
जो सुला दें, रूलायें नहीं,
मन ही मन हृदय मेरा
कुछ ऐसी अकुलाहट सहता
चला गया......
मेरा जीवन........


पैबंद


तेरे नाम का जो पैबंद
मेरी जिंदगी पर लग गया
तेरे नाम से सब पुकारने लगे
मेरा नाम पीछे लग गया......


जर्रा-जर्रा, कतरा-कतरा
दुश्मन मेरा हो गया
जब सिलसिला इस बात का
और तेज़ होता गया तेरे नाम......


वो खुशबू बिखेरता,
तेरा मरमरी सा हाथ,
वो तेरी भिनी-भिनी खुशबू,
स्वर्ग का सा साथ,
हर हवा का झोंका, मुझसे,
कुछ-कुछ कह गया तेरे नाम.....


मिलना तो दूर था, बस
देखना ही दूभर हो गया,
फिर रात का वो कपटी पल,
मुझसे सब कुछ कह गया तेरे नाम.....


ये अबोध प्यारे से बालक


इक दिन सामान बाँध रही थी मैं
कि मेरी छोटी सी नन्हीं बालिका
ने मुझे अपने नन्हें हाथों से
पकड़कर कहा, ‘‘माँ मुझे भी
साथ ले चलो’’


उसे प्यार से टालते मैंने कुछ
लालच भरे शब्द कहे,
‘‘मैं वो लाऊँगी, ये लाऊँगी’’
पर वो न मानी।


क्षणभर सोचकर कहने लगी,
‘‘माँ! बर्फ का छोटा सा पहाड़
ला देना, मैं तुम्हारे साथ नहीं
जाती।’’


सुनकर अनायास ही मन
भर आया, कितनी दूर हैं
ये बालक, इस लालची,
स्वार्थी संसार से अभी।


लड़की जब सोलह साल की हुई


आईना शरमाने लगा,
यौवन बल खाने लगा,
लड़की जब सोलह साल की हुई।
     बाबुल के जूते सरकने लगे,
     मैया के सपने चटकने लगे,
     लड़की जब सोलह साल की हुई।


आँगन में बारात के सपने
सजने लगे,
अंदर रखे, देग, पतीले, पारात
मंजने लगे
लड़की जब सोलह साल की हुई।


     माँ के अन्दर अकुलाहट सी हुई,
     दर्द ऐसा कि आहट न हुई,
     लड़की जब सोलह साल की हुई।
बैठने, फिरने, बतियाने पर पाबंदियाँ
लगने लगीं,
ऐरों-गैरों की बातें सबको
खलने लगी
लड़की जब.....


अल्हड़ता हँसने लगी, बाबुल खिसयाने लगा
रोक हँसी पर लगी, ज़माना बतियाने लगा,
लड़की जब सोलह साल की हुई।

---

शबनम शर्मा

  माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.     

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