मंगलवार, 21 नवंबर 2017

(पुस्तक समीक्षा) भारतीय नेपाली बालसाहित्य का पहला इतिहास

(पुस्तक समीक्षा)

भारतीय नेपाली बालसाहित्य का पहला इतिहास

सुमन बान्तवा

रिसर्च स्कॉलर,

नेपाली विभाग,

सिक्किम विश्‍वविद्यालय।

Email: bantawasuman2015@gmail.com

बालसाहित्य के इतिहास का लेखन भारतीय नेपाली साहित्य के संदर्भ में यह पहली बार हो रहा है। इस पुस्तक का शीर्षक भारतीय नेपाली बालसाहित्यमा नारी स्रष्टा है। इस पुस्तक कि लेखिका डा. कविता लामा है। इस पुस्तक का प्रकाशन इस बात को बयाँ करता है कि बालसाहित्य लेखन की एक समृद्ध परंपरा जो कई सालों से चली आ रही हैं। लेकिन नेपाली साहित्य में आजतक इस दिशा में किसी की ओर से ध्यान नहीं दिया गया। वैश्विक स्तर में आज साहित्य लेखन की जो गरिमा बनी हुई हैं उसमें बालसाहित्य लेखन का बहुत बड़ा योगदान है। देखा जाए तो आज विश्‍व में बालबालिकाओं के सर्वांगीण विकास के लिए हर संभव प्रयास हो रहा है। इनमें से बालसाहित्य लेखन और पठन भी एक हैं, क्योंकि बालसाहित्य ही ऐसा एक माध्यम हैं जो बालबालिकाओं को मनोरंजन प्रदान करते हुए उन्हें अक्षर ज्ञान देने का काम भी करता है। इस दृष्टि से बालसाहित्य और भी महत्त्वपूर्ण बन जाता है। खेल-खेल में शिक्षा देने का काम दरअसल सहज काम नहीं हैं। यह तो एक बहुत ही संवेदनशील विषय हैं, क्योंकि बालसाहित्य लेखन के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के लिए बालमनोविज्ञान का गहरा अध्येता होना जरूरी होता हैं। तभी जाकर वह बालबालिकाओं की रुचि के अनुसार की पुस्तकें तैयार करने में सक्षम बन सकता हैं। फिर चाहे वह पाठ्य पुस्तक हो या कुछ और।

कविता लामा की इस पुस्तक में तीन अध्याय हैं। पहले अध्याय में बालसाहित्य लेखन का सैद्धान्तिक विमर्श प्रस्तुत करते हुए भारतीय नेपाली साहित्य जगत में बालसाहित्य लेखन की स्थिति के बारे में बहुत ही बारीकी से तथ्य प्रस्तुत किया गया हैं। इसमें इन्होंने भारत में नेपाली बालसाहित्य लेखन को अनूदित बालसाहित्य और मौलिक बालसाहित्य के रूप में दो तरह से विकसित होने की बात कही है। अनूदित बालसाहित्य के विकास में यहाँ के क्षेत्रीय स्तर के अलावा राष्ट्रीय स्तर में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और नेशनल बुक् ट्रष्ट की ओर से जो कार्य किया गया है, उसके बारे में चर्चा की गयी है, जो निरंतर रूप से आगे बढ़ रहा है। इसी तरह से शुरूवाती दौर के इतिहास का जिक्र करते हुए शैक्षिक दृष्टि से अविकसित क्षेत्र दार्जिलिंग में अंग्रेज हुक्मरानों की आगमन के बाद ही स्कूल खोलने और बालबच्चों को पढाने- लिखाने का काम शुरू होने की चर्चा की गयी है। सन् 1869 में मैक्फर्लैन के नेतृत्तव में दार्जिलिंग में ईसाई मिशनरी स्कूल खुलने के साथ ही यहाँ शिक्षा का प्रारम्भ हुआ। इसी तरह “अङ्ग्रेजहरूले मसिनेरी स्कुलहरू खोलिदिएपछि मात्र बालबालिकाहरूले किताब देख्ने सौभाग्य पाए, त्यो पनि हिन्दी भाषामा लेखिएका।” (अंग्रेजों के द्वारा स्कूल खोलने के बाद ही शिक्षा से महरूम बालबच्चों को किताब देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, वो भी हिन्दी भाषा में लिखी हुई।) ऐसे हालात में इन बच्चों के लिए नेपाली भाषा में पाठ्य पुस्तक तैयार करने का काम बहुत ही जरुरी हो गया था। इस परिस्थिति को देखते हुए इन बच्चों के लिए नेपाली भाषा में पाठ्य पुस्तक तैयार करने की जिम्मेदारी पादरी गंगाप्रसाद प्रधान ने स्वीकार की |

पादरी गंगाप्रसाद प्रधान ने सर्वप्रथम मिस गोलेन के साथ मिलकर अंग्रेजी भाषा की बालोपयोगी पुस्तकों का नेपाली भाषा में अनुवाद करके पाठ्य पुस्तक तैयार करने का काम शुरू किया। इस दौरान पादरी गंगाप्रसाद प्रधान के द्वारा तैयार की गयी पुस्तकें हैं- ‘मिठो गीत गाउने चराको विषयमा’’ (सन् 1912), ‘एक बटौरे साथी ’ (सन् 1916), ‘मान्छे माछाको कथाहा ’ (सन् 1923), ‘सुनौलो कथाको पुस्तक ’ (सन् 1973)। इस तरह से तत्कालीन परिस्थिति में बालबच्चों को शिक्षा देने के लिए अनूदित पुस्तकों के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था। इसी रूप में उपलब्ध पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से ही प्राथमिक स्तर के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का सिलसिला शुरू हुआ था। कविता लामा ने बालबच्चों के लिए पाठ्य पुस्तक निर्माण की दिशा में अनूदित पाठ्य पुस्तक की चर्चा से पुस्तक की शुरुवात की हैं। बाद में जब पारसमणि प्रधान का आगमन हुआ तब उन्होंने बालबच्चों के लिए मौलिक रूप में पाठ्य पुस्तक लिखने की ओर ध्यान दिया। इस कदम ने भारतीय नेपाली बालसाहित्य को एक पृष्ठभूमि प्रदान करने काम किया हैं। लेकिन उस वक्त भारतीय नेपाली बालसाहित्य बालबच्चों की पाठ्य पुस्तक तक ही सिमट कर रह गई और इतना ही यहाँ के बालसाहित्य का पर्याय सा बन गया था। यह देखकर बाद में पारसमणि प्रधान ने पाठ्य पुस्तक के सिवाय स्वतंत्र और मौलिक रूप से भी बालसाहित्य लेखन की दिशा में काम करने का मुहिम शुरु की। इस तरह से कई सालों तक भारतीय नेपाली बालसाहित्य बालबच्चों की पाठ्य पुस्तक की दायरे में रहने के बाद अब वो एक स्वतंत्र ज्ञानानुशासन के रूप में उभरकर सामने आने लगा। और इनके द्वारा शुरू की गई इस परंपरा को आज भी निरंतर रूप से आगे बढाने का काम जारी रहने की बात करते हुए भारतीय नेपाली बालसाहित्य का प्रारम्भिक इतिहास के ऊपर भी कविता लामा ने इस अध्याय में प्रकाश डाला है।

इस पुस्तक की दूसरी अध्याय में कविता लामा नें भारतीय नेपाली बालसाहित्य लेखन की वर्तमान स्थिति के ऊपर विमर्श प्रस्तुत किया है। लेकिन इस अध्याय में इन्होंने मुख्य रूप से यहाँ के नारी सर्जकों को ज्यादा अहमियत देने का काम किया हैं और उन्हीं के कृतियों को लेकर अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिसमें समकालीन विश्‍व की विविध विषय जैसे- पर्यावरण, प्रकृतिप्रेम, राष्ट्रप्रेम, जैव विविधता, मानवता, धार्मिक सद्भावना आदि विषयों के ऊपर बालकविता, बालकथा, बालनाटक, बालगजल, बालउपन्यास जैसे कई विधाओं में रचना प्रस्तुत की गयी है। बालकविता का एक उदाहरणः

रंगरूप मेरा कुछ नहीं

ना गंध है ना आकार

मुझे कोई देख नहीं सकता

मैं छु लेता हुँ सभी को एक समान।

तो बताओ ! प्यारे दोस्त !

क्या है मेरा नाम ?

मेरा नाम है पवन

(स्नेहलता राई, प्रकृति और पृथ्वी, पृ.15)

इस तरह से वर्तमान परिस्थिति में देखा जाए तो बालसाहित्य लेखन की दिशा में काफी तादाद में नारी सर्जकों की उपस्थिति दिखाई देने लगी है, जो खुशी की बात है।

इस पुस्तक की अंतिम अध्याय में कविता लामा नें निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। निष्कर्ष में इन्होंने विश्‍व साहित्य में बालसाहित्य के महत्त्व और इसकी उपयोगिता के बारे में अच्छी तरह से चर्चा करते हुए बताया है कि आज की तारीख में बालसाहित्य के बिना हम किसी भी साहित्य की कल्पना नहीं कर सकते है। इन के अनुसार “ नेपाली बालसाहित्य लेखन परम्परालाई साहित्यको मूलधारादेखि सधैं किनारीकृत गरिएको छ। साहित्यका हरेक विधाको विकासक्रमको चर्चा सविस्तार गरिएको हुन्छ केवल बालसाहित्यलाई छोडेर ” ( नेपाली बालसाहित्य लेखन परंपरा को साहित्य की मूल प्रवाह से सदैव दरकिनार किया गया है। साहित्य की हरएक विधा की विकासक्रम के बारे में जब भी चर्चा की जाती है तब बालसाहित्य को हाशिए पर रखा जाता रहा है।) इसके साथ ही हमारे यहाँ बालसाहित्य को केवल स्कूली किताब तक ही सीमित रखने की परंपरा कई सालों से चली आ रही है। इसलिए अब इसको स्कूली किताब की दायरे से बाहर निकालने का काम सभी को करने कि जरुरत है |

एक सदी से ज्यादा वक्त गुजर चुका है भारत में नेपाली बालसाहित्य के आये हुए। और आज अरसे के बाद पहली बार इसके बारे यह पुस्तक लिखी गई है। हालाँकि इसमें नारी सर्जक को केंद्र में रखा गया है। लेकिन फिर भी नेपाली बालसाहित्य का इतिहास बयाँ करने में यह पुस्तक अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया है।

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डॉ. कविता लामा (लेखक)

एसोसिएट प्रोफेसर, नेपाली विभाग,

सिक्किम विश्‍वविद्यालय।

समीक्षित पुस्तकः

भारतीय नेपाली बालसाहित्यमा नारी स्रष्टा (समालोचना)

गामा प्रकाशन, दार्जिलिंग-2014 ₹ 300/-

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