रविवार, 19 नवंबर 2017

कवि मुक्तिबोध की जन्मशती // मनोज कुमार

साहित्य समाज में किसी कवि की जन्मशती मनाया जाना अपने आपमें महत्वपूर्ण है और जब बात मुक्तिबोध की हो तो वह और भी जरूरी हो जाता है। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनीतिक चेतना से समृद्ध स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में स्थापित मुक्तिबोध अपने समय के एक ऐसे कवि हुए हैं जिनकी उम्र बहुत छोटी रही लेकिन उनकी कविता सदियों के लिए अमर हो गई। मध्यप्रदेश में जन्मे और छत्तीसगढ़ के होकर रह जाने वाले मुक्तिबोध की पहचान राजनांदगांव से है। हालांकि मुक्तिबोध किसी एक शहर या प्रदेश के नहीं बल्कि समूची दुनिया के कवि हैं और उनकी समय से बात करती कविताओं का यह शताब्दि वर्ष है।

गजानन माधव ‘‘मुक्तिबोध’’ (13 नवंबर 1917 -11 सितंबर 1964) हिन्दी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे।  वर्ष 2017 हिन्दी के अपने समय के जुझारू कवि मुक्तिबोध का जन्मशती वर्ष है। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। मुक्तिबोध का सम्पूर्ण जीवन संघर्षॉं तथा विरोधों से भरा रहा। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका असर उनकी कवितायों में दिखाई देती है। पहली बार उनकी कविताएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तारसपक्त’ में छपी। कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि पर भी लिखा है। मुक्तिबोध एक समर्थ पत्रकार भी थे। उनकी विशेषताएँ अगली पढ़ी को रचनात्मक देती रही है। मुक्तिबोध नई कविता के मुख्या कवि हैं। उनकी संवेदना तथा ज्ञान का दायरा व्यापक है। गहन विचारशीलता और विशिष्ट भाषा-शिल्प की वजह से उनकी साहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्ती की जिंदगी की विडंबनाओ तथा विद्रूपताओ का चित्रण उनके साहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज-व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा भी। मुक्तिबोध के साहित्य की एक बड़ी विशेषता आत्मालोचन की प्रवृत्ति है।

मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार ‘‘तार सप्तक’’ के माध्यम से सामने आई, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाया। मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल ‘‘एक साहित्यिक की डायरी’’ प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। ज्ञानपीठ ने ही ‘‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’’ प्रकाशित किया था। इसी वर्ष नवंबर 1964 में नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन ने मुक्तिबोध द्वारा 1963 में ही तैयार कर दिये गये निबंधों के संकलन नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध को प्रकाशित किया था। परवर्ती वर्षो में भारतीय ज्ञानपीठ से मुक्तिबोध के अन्य संकलन काठ का सपना, तथा विपात्र (लघु उपन्यास) प्रकाशित हुए। पहले कविता संकलन के 15 वर्ष बाद, 1980 में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन भूरी भूर खाक धूल प्रकाशित हुआ और 1985 में राजकमल से पेपरबैक में छह खंडों में ‘मुक्तिबोध रचनावली’ प्रकाशित हुई, वह हिंदी के इधर के लेखकों की सबसे तेजी से बिकने वाली रचनावली मानी जाती है। इसके बाद मुक्तिबोध पर शोध और किताबों की भी झड़ी लग गयी। 1975 में प्रकाशित अशोक चक्रधर का शोध ग्रंथ ‘मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया’ इन पुस्तकों में प्रमुख था। कविता के साथ-साथ, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्धति को विकसित और समृद्ध करने में भी मुक्तिबोध का योगदान अन्यतम है।

वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बताते हैं कि वह सत्रह साल की उम्र में मुक्तिबोध से मिले थे। जब वह 24 वर्ष के हुए, तब मुक्तिबोध की मृत्यु हो गई। परिचय के ये सात साल न पर्याप्त हैं और न उल्लेखनीय। मुक्तिबोध ने गढ़े गए लालित्य के स्थापत्य को ध्वस्त किया। जब व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आई थीं, तब उन्होंने अंत:करण का प्रश्न उठाया। पिछले 50 वर्ष की कविता ने मुक्तिबोध से बहुत कम सीखा है। कवि लालित्य में ही उलझे रहे हैं। मुक्तिबोध के बीज शब्द हैं, आत्मसंघर्ष, अंत:करण और आत्माभियोग। मुक्तिबोध अपनी जिम्मेदारी को केंद्रीय मानते हैं। वे सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि हैं। उन्होंने 1964 में जिस फैंटेसी को प्रस्तुत किया था, वह 2014-15 में साकार हो गई। ऐसा दुनिया के साहित्य में बहुत कम हुआ है कि फैंटेसी साकार हो जाए। ‘अंधेरे में’ कुल चार चरित्र हैं- टालस्टाय, तिलक, गांधी और अनाम पागल। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गांधी का चरित्र है। उनमें गांधी वाला तत्व कभी समाप्त न हुआ। अभी हमने युवाओं का एक सम्मेलन किया था। 56 युवा आए थे। किसी ने न मुक्तिबोध का जिक्र किया और न राजनीतिक परिस्थिति का। मुक्तिबोध की इतिहास वाली किताब के विरोध में जो मार्च निकला था, उसने मुक्तिबोध को तोड़ दिया। वह कभी उस आघात से उबर न सके।

वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव का मानना है कि जिस खतरनाक आगत से मुक्तिबोध रूबरू थे, वह आज हमारे सामने है। इतिहास पर मुक्तिबोध की पुस्तक प्रतिबंधित की गई। नेहरू और नेहरूवियन मॉडल की कई चीजों की आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने नेहरू की मृत्यु पर कहा था कि अब खतरा बढ़ गया है। मुक्तिबोध ने वर्ग की बात करते-करते जाति-वर्ण के प्रश्नों को पीछे कर देने की पद्धति की आलोचना की। उनके भक्तिकाल पर लिखे निबंध को याद किया जा सकता है, जहां कबीर और तुलसी आमने-सामने हैं। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन पर उनकी टिप्पणी को याद कीजिए और आज स्वच्छता, पर्यावरण आदि पर कार्यक्रम कराने वाली साहित्य अकादमी से उसकी तुलना कीजिए, मुक्तिबोध की दूरदर्शिता स्पष्ट हो जाएगी। मुक्तिबोध के वैचारिक पक्ष को नजरअंदाज करके हम उनके साथ अन्याय करेंगे।

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