मंगलवार, 14 नवंबर 2017

वसंत के इस मतवाले समीरण में // डॉ. रानु मुखर्जी


प्रकृति को हमने माँ कहा, आकाश को हमने पिता, पृथ्वी को माँ कहने में कोई काव्य नहीं है, एक दॄष्टि है, जिसमें हम प्रकृति को एक समग्रीभूत परिवार मानते हैं। इसलिए हम अपना सुख, आनन्द सब कुछ प्रकृति में ही ढूंढते हैं। क्योंकि हम प्रकृति के ही तो अंश हैं।

अपनी रचनाओं में विविधता और श्रेष्ठता के कारण विश्व कवि रवीन्द्रनाथ को सहज ही भारत का ही नहीं विश्व का और सभी समय का एक श्रेष्ठ कलाकार कहा जाता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति मूलरुप में रहती है। प्रकृति का मानवीकरण करने की कला में सिद्धहस्त है। वसंत को उन्होंने ऋतुओं का राजा कहा है – “ऋतुराज वसंत” भावना की स्वरबद्धता और सत्यता की कल्पना की विविधता और संगीतमयता के कारण वसंत से संबंधित उनकी रचनाएं अप्रतिम मिठास से भरी है-

हे वसंत, हे सुन्दर धरणीर ध्यान-भरा धन,

वत्सरेर शेषे

शुधु एकबार मर्ते तुमि धरो भूवनमोहन

नव वर वेश ।

तारी लागी तपस्विनी की तपस्या करे अनुक्षण –

आपनारे तप्त करे, धौत करे, छाडे आभरण

त्यागेर र्स्वस्व दिए फल – अर्घ्य करे आहरण

तोमार उद्देश्ये” (“वसंत” शांतिनिकेतन में)

वसंत का मानवीकरण है. उनसे बिनती करते है कि एकबार भूवनमोहन नववररुप धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करो कि यह (पृथ्वी) स्वयं को तपाती है, धोती है, आवरण बदलती है।

सब कुछ त्याग करके फलों का अर्घ्य देती है केवल तुम्हारे ही उद्देश्य में.

‘आजी वसंत जाग्रत द्वारे

तब अवगुन्ठीत कुन्ठीत जीवने ।

कोरो ना बिडिम्बीत तारे ।

आजी खुलिओ हृदयदल खुलिओ,

आजी भूलिओ आपन पर भूलिआ,

एई – मुखरित गगने

तब गंध तंरगित तुलिओ’ (गीतांजली से)

वसंत का मानवजीवन में महत्व को दिखाते हुए कवि कहते हैं – द्वार पर वसंत आया है। दिल खोलकर उसका स्वागत करें। आपसी भेदभाव को भूलकर संगीत मुखरित गगन में इसको अपनी अवगुंठित् कुंठित जीवन में, हृदय में स्थान देने की बात करते हैं।

धरा में विभिन्न ऋतुओं का आगमन केवल और केवल वसंत के लिए है. इसे बडे सुन्दर रुप से कविन्द्र ने समजाया है। सभी ऋतुओं को अपने जीवन में समाहित कर अपने तरीके से रंग भरकर मानव उसे अपने अनुसार ढाल लेता है। वसंत जब आता है तब जीवन को इतना तरंगित करता है, इतनी ताजगी से भर देता है कि जीवन आनन्दमय हो उठता है। कवि रविन्द्रनाथ ने यहाँ वसंत को दुल्हे के रुप में प्रस्तुत किया है।

वसंत का रंगीन उल्लास मानव के लिए जीवनदायिनी शक्ति है। कविवर रवीन्द्रनाथ के लिए प्रकृति और मानव का संबंध अभिन्न है जो कवि के सारे जीवन में, कवितओं में यत्र – तत्र, बिखरा पडा है परंतु इसे (वसंत को) अपने साथ बांधकर रखने की क्षमता इस धरा में नहीं है। अर्थात सुख – आनन्द के क्षण स्थायी अवस्था को कवि समझाते है। आगे कहते हैं –

हे वसंत हे सुन्दर, हाय हाय, तोमार करुणा

क्षणकाल – तरे।

मिलाईबे ए उत्सव, एई हांसी, एई देखा सुना

शुन्य निलाम्बरे!

तोमर करिबे बंदी नित्यकाल मुक्तिकाशृंखले

शक्ति आछे कार ?

अतः जीवन के आनन्दमय क्षण में भरपूर शक्ति का संचय कर लेने की सलाह कवि देते हैं क्योंकि यह उत्सव, यह खुशी, यह हंसी धरा के रंगीन, सजावट सब विलीन हो जाने वाले हैं। इसलिए वसंत को जीवनदायीनी कहा जाता है। कवि की रचना यही संदेश देती हैं।

जीवन में ऋतुराज वसंत की महत्व को दर्शाते हुए कवि ने इस ऋतु को उत्सव में बदल दिया है। उन्होंने इस ऋतु में शांतिनिकेतन विश्व विद्‌यालय परिसर में “वसंतोत्सव” मनाने की प्रथा का आरंभ किया. लगातार कई दिनों तक विद्यार्थी विद्यालय परिसर में नृत्यगीत में रत हो जाते हैं। वसंत के साथ स्वागत में नृत्यगीत आरंभ हो जाता है।

नए नए परिधान फूल-मालाओं से सज्जित होकर नाच गान करते हैं। आपसी भेदभाव को भुलाकर, छोटे बडे का भेदभाव को मिटाकर, विद्यार्थी, शिक्षक सब एक होकर इस उत्सव में एकसाथ झूमते हैं। ढोल, मृदंग, करताल के साथ छंद बद्ध रुप से सब एक हो जाते हैं। और यह परंपरा लगातार होली तक चलती है।

शांतिनिकेतन में होली के त्यौहार को मनाने की भी एक विशिष्ट परंपरा है। यहां अबीर गुलाल और फुलों से होली खेली जाती है। झुंड में नृत्यगीत के साथ बाजे-गाजे के साथ झूमते हुए होली खेलने निकलतें है। यहाँ भी ऋतुराज वसंत सिरमौर होतें हैं। जिसने एकबार कविवर रविन्द्रनाथ द्वारा प्रचलित वसंतोत्सव में हिस्सा लिया हो वह बार बार इस मौसम में शांतिनिकेतन जाना चाहेगा। सच्चे अर्थ में अगर ऋतु में महत्व को समझना है, इसके गुण को परखना है तो अवश्य वसंतोत्सव में भाग लेना चाहिए। प्रेम और भाईचारे का मूर्तरुप देखने को मिलता है।

जीवन का आधार प्रेम है। प्रेम एक शक्ति है, एक आकर्षण है। जिससे जग को आधार मिलता है, अभिव्यक्ति मिलती है। वसंत उत्सव प्रेम का उत्सव है, प्रकृति पुजा का उत्सव है, प्रकृति के रंगो का आभास मानव में प्रतिफलित होता है और आपस में इर्ष्या द्वेष, मलिनता, घृणा के भाव को भूलकर प्रेममय होकर एकदूसरे से हिलमिल कर बन्धुत्व, एकात्मा, नए जोश के उर्जा का संचार मानव मन में होना ही वसंत का मूल संदेश होता है।

आज ज्योत्सना राते सबाई गेछे बोने

वसंतेर एई माहाल समीरणे”

जाबो ना गो जाबो ना रे

रोईनू बोसे घरेर माझे एई निरालाय

एई निरालाय रबो आपन कोने”

वसंत के मतवाले समीकरण से बच पाना संभव नहीं। अगर न भी सहयोग करना हो तो ज्योत्सना से भरी रात इतनी मतवाली है कि स्वयं को अपना सब कुछ विसर्जन कर प्रकृति के संग घुल-मिल जाना ही पड्ता है।

कवि के अनुसार वसंत प्रकृति पूजा क उत्सव है। सदैव सुन्दर दिखनेवाली प्रकृति वसंतऋतु में सोलह शृंगार से दीप्त हो उठती है। यौवन हमारे जीवन का मधुमास वसंत है तो वसंत इस सृष्टि का यौवन है। जीवन के सौन्दर्य के लिए प्रकृति के अनुपम सान्निध्य में जाना चाहिए। निसर्ग का जादू मानव को वेदना रहित बना देता है। इसमें अहंकार नहीं होता है अतः ईश्वरीय भाव से समृद्ध होता है। अतः निसर्ग का सान्निध्य हमें ईश्वर के सान्निध्य में ले जाता है। कुछ हद तक कविवर का यह महोत्सव अध्यात्मा भावना भी संचार करता है।

“वसंत आ गया है” लेख में हजारी प्रसाद द्विवेदीजी ने लिखा है – “मुझे ऐसा लगता है कि वसंत भगता भागता चलता है। देश में नहीं काल में। किसी का वसंत पन्द्रह दिन का है तो किसी का नौ महीने का। मौजी है अमरुद बारह महीने इसका वसंत ही वसंत है”।

द्विवेदीजी ने भी अपने लेख में वसंत का वही रुप दिखाना चाहा है जो विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ने दिखाया है। अर्थात प्रकृति और मन क समन्वय। प्रेम और मानव। मानव प्रेम और सदभावना। सभी भाव मन से जुडे है। और अगर मन चाहे तो बारह महीने वसंत ऋतु छाया रह सकता है, जैसे अमरुद का। सृष्टि की सुन्दरता और यौवन की रसिकता का जहा सुमेल हो वहां निराशा निष्क्रियता का कोई स्थान नहीं. निसर्ग की सुंदरता व मानव की रसिकता में अगर प्रभु का स्वर ना हो तो वह विनाश का मार्ग बन जाता है। इसलिए वसंत के संगीत में गीता के स्वर का आभास दिखता है। हिन्दी साहित्य, वसंत की सुमधुर रचनाओं से समृद्ध है ऋतुराज वसंत सचमुच प्रेम मुकुट धारण करके मानव – प्रकृति के सिरमौर बन बैठें हैं।

फिर भी वसंत आता है डॉ. रानु मुखर्जी

कोहरा भरा आसमां हो, चाँद भी परेशान हो

तारे मुंह छीपा रहे हो, धरती बदहवास हो – फिर भी वसंत आता है.

पतझड़ का मौसम हो, हरियाली का नाम न हो, फूलों का अकाल हो,

और भौंरे अकुला रहे हो – फिर भी वसंत आता है.

चूल्हे पर हंडिया न हो, पानी में चावल न हो,

अंतडिया कुलबुला रही हो, आंखों तले अंधेरा हो – फिर भी वसंत आता है.

तलवारें एक दूजे पर तनी हो, आपस में सबकी ठनी हो

नदियाँ खून की बहती हो, जुल्म की चादर फैली हो - फिर भी वसंत आता है.

रंगराग से भरी खुशनुमा शाम हो, हर चेहरे पर गुलाल हो,

आपको बस केवल एक मुस्कुराहट की चाह हो,

पर वह कहीं भी किसी से न मिले फिर भी वसंत आता है फिर भी वसंत आता है.

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परिचय -

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण अनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) की वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों का परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.

Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

ranumukharji@yahoo.co.in

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