रविवार, 26 नवंबर 2017

पौष माह और सूर्य आराधना // श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

पौष माह और सूर्य आराधना

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श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

(एम.ए. संस्कृत )

हमारी भारतीय संस्कृति में चैत्र माह से लगाकर फाल्गुन माह तक लगभग प्रत्येक मास का अलग-अलग महत्व है। हर एक माह के विशिष्ट त्यौहार हैं और उन सब की अलग पूजन पद्धतियाँ है। पौष माह में भगवान् सूर्य की आराधना का विशेष महत्व है। हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी का अस्तित्व सूर्य पर निर्भर है। वैदिक काल में सूर्य नारायण को ही सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठाता देवता बतलाया गया है। ऋग्वेदीय सूर्य-सूक्त में ऋषि कहते हैं -

‘‘तत् सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तो र्विततं संजभार।

यदेदयुक्त हरितः सधस्था दाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै।।

अर्थात सूर्य का देवत्व इसी में है कि वह सृष्टि जगत के मध्य स्थित हो समस्त ग्रहों को धारण करते हैं। रात्रि चहुं ओर अन्धकार का आवरण फैला देती है।

सूर्य पर्यावरण की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वायु, जल, मिट्टी वनस्पति आदि के शुद्धिकरण में सूर्य का प्रकाश लाभदायक है। सूर्य की उपासना करते समय हम प्रार्थना करते हैं कि हमारे चारों ओर के वातावरण को वह शुद्ध करे। हमारे घर के सदस्यों को स्वास्थ्य प्रदान कर उन्हें शतायु प्रदान करे और हमारे सौभाग्य में वृद्धि करे। हम सौ बसन्त देखे।

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पौष माह की एकादशी का नाम पुत्रदा तथा सफला हैं। ये दोनों एकादशी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिये आवश्यक दर्शायी गई हैं। इस माह की श्रीगणेश चतुर्थी का गणेश पूजन में भी विशेष महत्व है। पौष माह के रविवार का सौभाग्य प्राप्ति में प्रमुख स्थान है। प्रातः स्नानादि नित्य कर्म के बाद तांबे के लोटे (पात्र) से सूर्य को अर्ध्य देना चाहिये। सूर्य अस्त होने के पूर्व भोजन ग्रहण किया जाता है, यथा संभव नमक का सेवन नहीं किया जाता है। गेहूँ, गुड़ या चीनी (शकर) का सेवन किया जाता है। प्राचीन समय में नमक रहित भोजन वाले रविवार का व्रत महिलाएँ आजीवन रखती थी। वर्तमान समय में नौकरी पेशा महिलाएँ, महानगरीय जीवन शैली तथा शारीरिक दौर्बल्य के रहते परम्परा का निर्वहन करना कठिन होता जा रहा है । इसलिये विवाहित महिलाएँ विवाह के पश्चात पांच वर्ष पर्यन्त इस उपवास को करें तो सूर्योपासना का लाभ उन्हें अवश्य प्राप्त प्राप्त होगा।

पौष माह में रविवार को छोड़कर भगवान् को भोग लगाने का विधान है। रविवार के व्रत की क्षेत्रानुसार कई कथाएँ सुनने में आती है। प्रस्तुत लेख में एक प्रचलित कथा का वर्णन किया जा रहा है जो रोचक होने के साथ ही शिक्षाप्रद भी है।

प्राचीन समय की बात है कि ब्राह्मण पति-पत्नी का एक जोड़ा था। पति पत्नी के साथ ही रविवार का उपवास रखता था। वह घर में ही रहता था। एक दिन पत्नी ने सलाह दी कि जीवन यापन करने के लिये घर से बाहर जाकर रोजगार करना पड़ेगा। पति घर से चला गया। रास्ते में उसे एक कुआँ दिखा। वह उसकी पाल में बैठना चाहता था । वहाँ कई हिरणियाँ आ गई और वह बैठ नहीं सका । वह बाजार गया तो दुकानदारों ने उसे बैठने नहीं दिया। आगे चलकर उसे एक तालाब मिला जिसमें थोडा सा पानी था। उसने वहाँ स्नान किया और समीप ही एक सूखे पीपल के पेड़ का पूजन किया। वृक्ष के नीचे कथा कही ओर सूर्य पूजन के साथ श्लोक पढ़ा -

जपा कुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।

तमोऽरिं सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्।।

महर्षि व्यास रचित नवग्रह स्त्रोत

अचानक ही उस विप्र को उस निर्जन स्थान पर अदृश्य आवाज सुनाई दी । विप्र कुछ वर मांगो । वह डर गया और भय से पीला पड़ गया। घर पर पत्नी ने जब उससे उसके पीले पन का राज पूछा तो उसने सारी बात बता दी। पत्नी ने अपने भोले-भाले पति से कहा कि कल पुनः उसी स्थान पर जाना और वर माँगना कि मेरे बड़े से घर में धन सम्पत्ति हो, मैं और मेरी पत्नी युवा हो जावें और घर में बेटे-बहूँ पोते पोती हो जावें। सूर्य देवता ने उसकी मनोकामना पूर्ण की।

यह बात सम्पूर्ण राज्य में फैल गई। राजा ने ब्राह्मण को बुलाकर सम्पूर्ण जानकारी पूछी तो उसने कहा कि-यह सब सूर्य भगवान् और रविवार के बिना नमक वाले उपवास की कृपा है। महाराज आप भी अपने सारे सद् कार्य सूर्य भगवान् को अर्पित कर दीजिये। आपके घर भी सूर्य देवता तेजस्वी और गुणवान पुत्र का वरदान देंगे।

राजा ने उस भोले-भाले विप्र की बात मानी और रानी ने सुन्दर बालक को जन्म दिया। राजा ने अपने सम्पूर्ण राज्य में यह घोषणा करवा दी कि सभी जन रविवार का बिना नमक का उपवास रखे। सूर्य को अर्ध्य दे और यथा शक्ति विधि विधान से पूजन कर जीवन में सुख-समृद्धि,आरोग्य एवं संतान सुख प्राप्त करें।

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(श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता)

एम.ए.संस्कृत

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