गुरुवार, 23 नवंबर 2017

'सूचना-विकार' के दौर में 'संयत-विचार' का सवाल // डॉ.चन्द्रकुमार जैन

साहित्यिक पत्रकारिता का वर्तमान अपने अतीत का चिर ऋणी है। हमारे समग्र साँस्कृतिक और सामाजिक इतिहास की रचना में भी साहित्यिक पत्रकारीय लेखन का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है। साहित्यिक पत्रकारिता में तात्कालिकता के दबाव के बावजूद यह जीवंतता बनी रही है। अपने तेवर में जन संचार माध्यमों के विशाल तथा निरंतर विकसित हो रहे वायुमंडल में साहित्यिक पत्रकारिता के आयाम भी बदल रहे हैं, बढ़ रहे हैं। लिहाज़ा,आज़ादी से पहले की साहित्यिक पत्रकारिता के साथ-साथ आज़ादी के बाद की और आज के दौर की साहित्यिक पत्रकारिता के रूप-रंग और चाल-चलन-ढंग में अंतर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है।

इसे विडम्बना ही कहा जा सकता है कि हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता पर गंभीर शोधपरक अध्ययन का प्रायः अभाव रहा है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को अभी इतिहास में दर्ज़ होने का साहित्यिक अधिकार भलीभांति मिल नहीं पाया है ! इसलिए उसका वर्तमान भी अतीत की प्रेरणा से कोसों दूर नज़र आ रहा है। अभी तक के इतिहास की कोई खबर ले तो आज का कोई इतिहास बने। बहरहाल, साहित्यिक पत्रकारिता के अस्तित्व और व्यक्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता।

कहना न होगा कि युग परिवर्तन हो जाने पर भी पिछले युग या युगों की कुछ-न-कुछ प्रवृत्तियाँ जारी रहती हैं। बीते हुए युग आने वाले युगों को जानकारी के स्रोतों के साथ-साथ नव जागरण व नव चिंतन की आधार सामग्री भी प्रदान करते हैं। यह बात साहित्यिक पत्रकारिता के सन्दर्भ में भी सही है। क्या कभी कविवचनसुधा और सरस्वती के योगदान को भुलाया जा सकता है ? इसी प्रकार हरिश्‍चंद्र मैगज़ीन के देशोन्नति के मूल स्वर यानी अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो के सन्देश की आवश्यकता तो आज भी बनी हुई है। महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनकी सरस्वती का योगदान यह है कि उन्होंने हिन्दी नवजागरण की बिखरी हुई असंगठित शक्ति को संगठित व घनीभूत किया। उधर, माधवराव सप्रे के संपादन में छत्तीसगढ़ मित्र सन 1900 से आरंभ हो चुका था जिसने हिन्दी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार कर देने के का स्तुत्य प्रयास किया। हिन्दी नवजागरण के महाभियान में अन्य अनेक पत्र-पत्रिकाएँ शामिल थीं।

साहित्यिक पत्रकारिता के अत्यंत प्रभावशाली रूप के दिग्दर्शन में प्रगतिशील दृष्टिकोण वाली पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका उल्लेखनीय रही। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इन आंदोलनों और विचारधाराओं का खासा असर दिखाई देने लगा था। हिंदी की कई पत्र-पत्रकाओं ने इस दौर में साहित्यिक पत्रकारिता को ने स्वर दिया। एकबारगी तो साहित्यिक पत्रकारिता का बोलबाला ही रहा। फिर, लघु-पत्रिका आंदोलन का दौर भी चला। इसका असर तमाम साँस्कृतिक क्षेत्रों और साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था। 1975 में राष्‍ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के नाम से देश की सभी भाषाओं के प्रगतिशील लेखकों के मंच का पुनर्गठन हुआ। इसके बाद तो प्रायः 1995 तक मुख्यतः और प्रायः 2000 तक प्रायः साहित्यिक पत्रकारिाता में मार्क्सवादी विचारधारा तथा वामपंथी दृष्टिकोण छाया रहा।आपात्काल और परवर्ती दौर को साहित्यिक पत्रकारिता के विकट संकट का दौर कहा जा सकता है। सेंसरशिप के साये में यह पत्रकारिता जूझती  हुई आगे बढ़ी।

आज भूमंडलीकरण,वैश्वीकरण,बाजारीकरण, उदारीकरण और उसके प्रभावों, कुप्रभावों, चुनौतियों और ज्ञात-अज्ञात आघात को झेलती हुई हमारी साहित्यिक पत्रकारिता नए युग को वाणी देने में जुटी है। पर, अब मीडिया का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अब सोशल मीडिया के अंतहीन प्रवाह व प्रभाव का दौर है। जहाँ, मनुष्‍य एक सुधी श्रोता, पाठक या दर्शक की जगह पर मात्र उपभोक्ता है। प्रकारांतर से वह उपभोग्य बनने की दुर्दम्य नियति से भी गुज़र रहा है। बाज़ार की एक कमोडिटी में बदल चुका है।

अब सूचना का युग है। ज्ञान का साहित्य, रस का साहित्य सूचनात्मक अधिक प्रतीत होता है। सूचना-विकार के चलते सूचना-विचार का आभामंडल दूषित हुआ जा रहा है। अनियंत्रित सूचना सम्प्रेषण के जाल और संजाल में साहित्य के गौरव व वैभव की रक्षा का प्रश्न मुंह बाए खड़ा है। साहित्यिक पत्रकारिता के आगे सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह लोगों में मानवीय संवेदनाओं को जीवित रख सके। अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों में साहित्यिक पत्रकारिता के सशक्तीकरण का महायज्ञ आज की एक बड़ी साहित्यिक माँग है। दरअसल, हमें गहराई में पहुंचकर समझना होगा कि हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का वस्तुनिष्ठ इतिहास जितना प्रचारित होगा, उतनी की प्रेरणा उसके वर्तमान को मिलेगी। आज का दौर मूल्यों के क्षरण और क्षण भंगुर विचारण की गिरफ़्त में भी है। उसमें कुछ स्थिरता के प्रयास यदि हों तो पत्रकारिता के साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता दोनों का भला होगा।

डॉ.चन्द्रकुमार जैन

हिन्दी विभाग,शासकीय दिग्विजय स्वशासी

स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़।

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