सोमवार, 6 नवंबर 2017

व्यंग्य का स्वरूप // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

व्यंग्य एक भाषाई कार्य है। जब से भाषा का जन्म हुआ व्यंग्य का जन्म भी हुआ। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में बात करते समय व्यंग्य भी करते हैं, कसते हैं।

व्यंग्य ‘किया’ जाता है, ‘कसा’ जाता है, व्यंग्य ‘मारा’ जाता है, व्यंग्य ‘बाण चलाया’ जाता है। ये मुहावरे व्यंग्य के तीखेपन को दर्शाते हैं।

व्यंग्य आरम्भ से बोलचाल की भाषा में तो रहा लेकिन साहित्य में इसका प्रवेश बहुत बाद में हुआ। साहित्य अपनी परिभाषा में ही सौम्य होता है। सबको साथ लेकर चलने की उसकी मंशा रहती है। सहित से ‘साहित्य’ बना है। लेकिन व्यंग्य सबको साथ लेकर नहीं चलता। वह समाज में व्याप्त विरोधाभासों की मज़ाक उडाता है। पाखण्ड पर चोट करता है। छल-प्रपंच और ऊपर से न दिखाई देने वाली विसंगतियों का परदाफाश करता है। दोगलेपन को धिक्कारता है। उसके उपहास में भी आलोचना का तत्व होता है। ऐसे में जब वह साहित्य में सहज ही प्रवेश नहीं कर पाता।

अधिकतर व्यंग्य साहित्य में मजबूरी में प्रवेश करता है। जब साहित्यकार समाज में व्याप्त विसंगतियों, विद्रूपों, पाखंड को सामाजिक दवाबों या राजनैतिक कारणों से, या कभी कभी अन्यायपूर्ण व्यवस्था का खुद भी जीविका उपार्जन के लिए एक अंग होने की वजह से, प्रत्यक्षत: नहीं रख पात़ा तो वह उन्हें व्यंग्य के माध्यम से साहित्य को समर्पित करता है। व्यंग्य व्यंजनात्मक भाषा का प्रयोग करता है। व्यंग्य में प्रत्यक्षत: जो कहा गया है, वही उसका अर्थ नहीं होता। वह कुछ अन्य बात व्यंजित करता है। समझदार उसे समझ लेता है। अहंकार में डूबा पाखंडी व्यक्ति अक्सर उसे समझ ही नहीं पाता। व्यंग्य की इसी शक्ति का फ़ायदा उठाकर श्रीलाल शुक्ल, सरकारी सेवा में रहते हुए भी “राग-दरबारी” लिख सके। दांते की ‘डिवाइन कामेडी’ मध्य कालीन व्यंग्य का एक महत्वपूर्ण कार्य है। इंग्लेंड की तत्कालीन व्यवस्था जिसमे आलोचना के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी, का डिवाइन-कामेडी जम कर मज़ाक उड़ा सकी।

साहित्य में व्यंग्य वैचारिक स्वतंत्रता का द्योतक है। जब वैचारिक स्वतंत्रता नहीं होती, बड़े यत्न पूर्वक, साहित्यिकता की रक्षा करते हुए, साहित्यकार व्यंग्य परोसता है। लेकिन जिस समाज में वैचारिक स्वतंत्रता है, वहां अक्सर व्यंग्य साहित्यकार व्यंग्य का दुरुपयोग करता भी मिल सकता है। वह पूरी तरह स्वच्छंद होकर शालीन व्यंग्य की बजाय गाली गलौज पर उतर आता है। बस चले तो शायद मारने-पीटने भी लग जाए। तर्क उसका लाजवाब है। जब समाज में गाली-गलौज मारपीट होती ही है तो हम तो केवल उसका चित्रण ही कर रहे हैं – साहित्य समाज का दर्पण जो ठहरा ! वह भूल जाता है कि समाज के इसी विद्रूप की आलोचना के लिए तो व्यंग किया जाता है ना कि साहित्य में उसे प्रश्रय देने के लिए। व्यंग्य समाज की विसंगतियों का बेशक आइना है, लेकिन इस आईने को ही विसंगत करने के लिए साहित्यिक व्यंग्य नहीं होता।

व्यंग्य के साथ अक्सर “हास्य” और “विनोद” जुड़ा रहता है। हम व्यंग्य-विनोद और हास्य-व्यंग्य जैसे पदों का इस्तेमाल भी करते हैं। ये शब्द समूह स्पष्ट: घोषणा करते हैं कि व्यंग्य केवल व्यंग्य नहीं होता, व्यंग्य की कटुता को दूर करने के लिए विनोद और हास्य की थोड़ी बहुत आवश्यकता रहती है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि हास्य व्यंग्य को कुंठित कर दे। कितना व्यंग्य और कितना हास्य – लेखक को यह तय कर पाना अक्सर मुश्किल हो जाता है। लेकिन इसी अनुपात को ठीक ठीक बरतने में ही व्यंग्य लेखक की प्रतिभा झलकती है। मुझे आज तक ऐसा कोई व्यंग्य लेखक नहीं मिला जिसमे हास्य का पूरी तरह अभाव हो। लेखन में पूरी तरह से हास्य बेशक संभव है।

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-सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी, / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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