शनिवार, 25 नवंबर 2017

व्यंग्य // अंगड़ाइयां ले रहा है प्याज // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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सब्जियों में उछाल आ रहा था और प्याज़ सोया पड़ा था। कब तक यों सोता पड़ा रहता। उसमें भी थोड़ी हरकत आई। अँगड़ाई ली। देखा, सब्जियां बेचैन हैं। करवटें बदल रही हैं। कभी दाईं करवट तो कभी बाईं करवट। ऊपर-नीचे हो रहीं हैं। कुछ तो काफी ऊपर चढ़ चुकी हैं। लोग परेशान हो रहे हैं। क्या खाएं, क्या न खाएं। और एक प्याज है, अपनी रूढ़िगत नींद में ही पड़ा है। प्याज को भी मसखरी सूझी। सोचा वह भी करवट बदल ही ले। और प्याज ने अँगड़ाई क्या ली, मानो भूचाल ही आ गया। लोग सोच ही रहे थे कि सब्जियां इतनी ऊपर चढ़ चुकी हैं कि उन तक पहुँच पाना तो मुश्किल है, क्यों न प्याज को ही सब्जी बना कर खा लिया जाए ? लेकिन यह क्या, प्याज भी अपनी नींद से जाग गया और देखते देखते उड़ने लगा। सब्जियों को भी मात देने लगा। वो कहते हैं न, पयादे से फ़र्जीं भयो टेढ़ों-टेढ़ों जाय। सीधा सादा प्याज अपनी ऐंठ दिखाने लग गया है। लोग परेशान हैं।

प्याज, जैसा कि हम सभी जानते हैं, एक कंद-मूल है। कई कंदमूल हैं जिनकी सब्जियां बनती हैं। अरबी है, सूरन है, घुइया है, गाजर है, आलू है, शलजम है। लेकिन प्याज अपनी तीखी गंध के कारण इनसे बहुत अलग है। इसका मुकाबला बस लहसन से ही किया जा सकता है, उसमें भी प्याज की तरह तीखी गंध आती है और इसीलिए शायद प्याज और लहसन की स्वतन्त्र रूप से सब्जी नहीं बनती। सब्जियों में, उनकी तीखी गंध के कारण, उन्हें थोड़ा-बहुत डाल-भर दिया जाता है। सब्जियां जायकेदार हो जाती हैं। महक उठती है। शायद इसीलिए प्याज को सुकंद और सुकंदक कहा गया है। लेकिन प्याज की गंध सभी को पसंद नहीं आती। ऐसे लोगों के लिए तो यह गंध न होकर दुर्गन्ध है। वे प्याज को ‘मुख-दूषण’ कहते हैं। (ठीक इसके विपरीत पान को ‘मुख-भूषण’ कहा गया है|) दुर्गंधित प्याज भले ही कुछ के लिए मुख-दूषण हो लेकिन जनता प्याज पर फ़िदा हैं। मिलता है, तो उसे कच्चा ही चबा जाती हैं। आलू की तरह भोला-भाला है प्याज। हर जगह, लगभग हर सब्जी में फिट हो जाता है।

प्याज ने हलकी सी एक अंगडाई क्या ली जनता तो जनता, शासन में भी खलबली मच गई। कहते हैं प्याज के बढ़े हुए मूल्यों पर चर्चा के लिए मुख्यमंत्री ने एक बैठक बुलाई, उसमें पूछा कहा गया, जब प्याज अपने इतने तेवर दिखा रहा है तो क्या उसका सेवन आवश्यक है ? कोई इस बात का जवाब नहीं दे पाया। लेकिन एक उच्च अधिकारी ने अधिकार पूर्वक एक जुमला जड़ दिया। कहा, प्याज एक ‘तामसिक’ खाना है। भारतीय संस्कृति के यह विरुद्ध है। प्याज भारत में मध्य-एशिया से आयात किया गया है। ये मांसाहारी मुग़लों और मुसलमानों का खाना है। इनकी संगत में जब से भारत में मांसाहार शुरू हुआ, प्याज के प्रति हमारी ललक बढ़ने लगी। वस्तुत: हमें सात्विक भोजन ही करना चाहिए। इस तामसिक भोजन के कारण ही देश में हिंसा और रेप जैसी वारदातों में इजाफा हुआ है। अनजानों को नया ज्ञान प्राप्त हुआ।

इस बैठक में प्याज के बारे में अभी कोई निर्णय नहीं हो पाया है। लेकिन प्याज बेचारा डरा बैठा है। कहीं तामसिक बता कर सरकार इसके खाने, बेचने, खरीदने पर बैन ही न लगा दे। प्याज ने करवट क्या बदली, लगता है उसपर कहीं आफत ही न जाए। लेकिन प्याज जाग गया है और सोच में है की उसे अब आगे क्या कदम उठाना है। मुझे लगता है कि कहीं प्याज विद्रोह ही न कर बैठे और जनता नारे लगाती हुई सड़कों पर न आ जाए। हमें चाहिए---सस्ता प्याज। प्याज दो ---प्याज दो। प्याज तो हम -- लेके रहेंगे। लेके रहेंगे ---लेके रहेंगे। प्याज कल्पना करता है और उसके होठों पर एक बेबस मुस्कुराहट आ जाती है।

प्याज के लिए दिल से दुआ कीजिए।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी /१, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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