मंगलवार, 21 नवंबर 2017

कुछ कवितायेँ // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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(१)    चीजें


चीजें – जिनसे मेरा सरोकार रहा है
चीजें नहीं रहतीं
स्मृतियाँ बन जाती हैं
     कुछ तो बेचारी
याद भी नहीं रहतीं !
केवल बाहर की ही नहीं
अन्दर की चीजें भी
बड़ा परेशान करती हैं
      झकझोरती हैं
सारे वजूद को हिला देती हैं !
फिर भले ही
विचार के रूप में ही वे क्यों न हों
कभी ढूँढ़ता हूँ
तो मिलती नहीं
बेतरतीब पडी रहती हैं
किसी अँधेरे कोने में
कभी सतह पर तैर आती हैं !
         तरकीबें भिडाता हूँ
कि वे छिप जाएं
विलुप्त हो जाएं
पर वे हैं –
न छिपती हैं
न साफ़ सामने आती हैं

कितनी असहज
अस्वाभाविक होती हैं
चीजें –जिनसे मेरा सरोकार रहा है |

(२)    रंगत


वक्त भी धीरे धीरे
कैसे अपनी रंगत बदलता है !
पहले रंग केवल काला
या सफ़ेद हुआ करता था
दोनों के बीच
घपला नामुमकिन था
समय ने अब
काले पर अब थोड़ा
सफ़ेद चढ़ा दिया है
श्यामला सा हो गया है !
सफ़ेद भी सफ़ेद कहाँ रहा?
भूरे रंग की
कितनी ही छटाएं
उभर आईं हैं सफ़ेद में !
वक्त की रंगत बदल रही है
शक्ल उसकी पहचानना
अब बहुत मुश्किल हो गया है |
सावधान रहो
जैसा देख रहे हो
वैसा शायद वह न हो / न रहे

(३)    पड़ोस


अब पड़ोस कितना दूर हो चला है
अपरिचित सा लगाने लगा है
आसपास कोई किसी को नहीं जानता
अपने में सिकुड़े
ओढ़े लबादा महानता का
एक-दूसरे से अलग-थलग
दुबके हैं सब घरों में ओअने अपने

तभी दूर देश से एक पात्र आता है
और मित्र अचानक
सामने आखाडा होता है
देर नहीं लगती उसे
अपना दिल खोलने में
         लगता है
दूरियाँ नहीं रहीं
पड़ोस बन गईं !

(४)    चिंता न करो माँ


कितना बुरा लगता था
जब माँ गाहे-बगाहे
पुलिंदा अपनी हिदायतों का
खोल बैठती थी
झींक झींक जाता था –
आज कई रोज़ बाद
माँ काखत आया है
वे ही सारी हिदायतें जो
दुहराते नहीं थकती थी
फिर से लिख डाली हैं –
सबह जल्दी उठ जाया करो
और रात में पढ़ना मत देर तक
सेहत का ख्याल रखना
काम मन लगा कर करना !
यहाँ सब खैरियत है
अपनी खैरियत लिखना –
भुत चिंता रहती है तेरी तरफ से

नहीं, चिंता न करो माँ
सोचता हूँ
और आंसू आजाते हैं !

(५)    कहरवा


वर्षा की पहली फुहार क्या पड़ी
बस गई ग्राण-रंधों में
धरती की गंध
      जो दबी पडी थी कब से
उमंगने के लिए.
शाखों पर अटके पड़े
जर्जर नहीं हो पाए थे अभी जो पत्र
किसी बच्चे की टटकी बोली की तरह
     जीवंत हो उठे
झूम उठे डालों पर !
पक्षी उड़ा तो
आकाश का अहसास जागा
फूल क्या खिले
कि रंग बिखर गए
पानी कुलाचें भरने लगा
     कानों ने हमारे
फिर से कहरवा सुना

वर्षा की पहली फुहार क्या पडी
बस गई घ्राण-रंधों में
धरती की गंध
    

(६)    आधी रोटी


वह पकाती है
गिनती की रोटियाँ
तीन मेरे लिए
तीन अपने लिए – टोटल, छह
साथ खाने बैठती है
बारी बारी से खाते हैं एक एक रोटी
मैं तीसरी खा चुकता हूँ
तो वह दूसरी उठाती है
कहती है –
लो, आधी और खाओगे?

(७)    रिश्ते


रिश्ते – अब बहुत सरल हो गए हैं
रंग में बंटी प्रजातियों की तरह
कुछ गोरे कुछ काले हो गए हैं
सामाजिक तुला के
दोनों सिरों की तरह कुछ शूद्र
कुछ अभिजात्य हो गए हैं
आर्थिक सांचे में सजे
कुछ गरीब
कुछ अमीर हो गए हैं !
रिश्ते – अब बहुत सरल हो गए हैं

हमारे दल के लोग ‘अपने’
दूसरे के पराए हो गए हैं
कुछ स्वदेशी
तो कुछ विदेशी हो गए हैं
रिश्ते –
अब तेरे-मेरे खाने में बंट गए हैं

आओं बैठो,
सोचो कि इन्हें थोड़ा जटिल
कैसे किया जाए
जो खानों में न समा पाएं !

(८)    एक मुकम्मिल तस्वीर क लिए


यों तो गिने-चुने हैं रंग
किन्तु एक दूसरे की
अपने में जब
आभा समेत लेते हैं रंग
तो छितरा जाती हैं
कैसी कैसी छटाएं –
सुनहरी, गुलाबी, लाल, बादामी
रुपहली, आसमानी
हरी, नीली, फीरोजी
शरबती, प्याजी
नारंगी मूगिया
काही, हिनाई
पीली बैंजनी चम्पई धानी
और भी न जाने कितनी.
अनगिनत है रोशनी रंगों की !
सिर्फ काला और सफ़ेद नहीं
मुकम्मिल एक तस्वीर के लिए
बना रहने दो
इन छटाओं को

---

(९)    अर्थात्


शब्द कभी धोखा नहीं देता
हम ही नहीं समझ पाते
उसका अर्थ
शब्द पर विश्वास करो !
भले ही दिमाग की किसी खूँटी पर
अटका रहे शब्द
आँख में करकता रहे
अर्थ उसका
आत्मा में उतर जाता है !
बहुत से शब्द
और छोटी सी बात.
गिने नहीं जाते शब्द
बात ही गुनी जाती है
वज़न अर्थ का 
समेटते हैं शब्द !
अपेक्षा करते हैं शब्द
उनपर भरोसा किया जाए –
भरोसे की खातिर |
अपनी चरम वेला में
शब्द बोलते नहीं
उच्छ्वास गाता है –
आनंद गीत !
 

(१०)     सलाइयों से बुनती है ख़्वाब


वह सलाइयों से बुनती है ख़्वाब
लेकिन जो भी बुना
ख़्वाब में भी
उसे पहन नहीं पाती
सीधा-उलटा
उलटा-सीधा करते
थक गई है वह
और उलझ कर रह गए हैं
ऊन के लच्छे
आकार नहीं दे पाती
जो बुना
निराकार नहीं है लेकिन |
आकार को निराकार करती 
अपनी उधेड़-बुन में अस्त-व्यस्त
वह सलाइयों से बुनती है ख़्वाब !
  
   
    डा. सुरेन्द्र वर्मा
  १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१ 

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