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कहानी // सुहागा // हंसा बिश्नोई

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जेठ की शाम से पहले पुरवैया चलने लगी थी। नीम की निबौली टप-टप टीन की छत पर बरस रही थी। बल्ली को बहू प्याज की टोकरी, दराती और थाली लाकर अम्मा क...

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जेठ की शाम से पहले पुरवैया चलने लगी थी। नीम की निबौली टप-टप टीन की छत पर बरस रही थी। बल्ली को बहू प्याज की टोकरी, दराती और थाली लाकर अम्मा को दे गई। जब मन हो तब काट दे। खाट पर बैठी अम्मा आषाढ़ लगने के दिन गिनने लगी थी कि बहू की चूड़ियों के सुर ने ध्यान हटा दिया। उसने काँधे पर पड़ी धोती से सिर ढक कर दराती उठा ली।

मुन्ना......! ओ.... मुन्ना.....! बोली परखते ही अम्मा के कान खड़े हो गए।

‘आ गया ....... निकम्मा!’ अम्मा बुदबुदाई।

सुहागा फाटक खोल अंदर आ गया। मोटिया कपड़े की लुंगी और कमीज पहने मस्तानी चाल चलता हुआ।

‘राम राम अम्मा!’ खाट के पास ही तिपाही ले बैठ गया।

‘कहाँ गया बल्ली? दो दिन हुए दिखाई न दिया। तबीयत-पानी तो ठीक है?’ एक साँस में बोल गया सुहागा।

‘‘ठीक है अभी तो यहीं सोया था, उठकर अंदर गया है....।’’ अम्मा ने सूखी-सूखी आवाज में उत्तर दिया।

‘‘रात को बिजली न थी, डी.पी. जल गई है। सुबह बिजलीवालों ने उतारी है, अब देखो कब आती है? अभी सो लिया तो ठीक ही है।’’

‘‘हुँअ.... काम करने वालों को तो पीठ टिकाते ही नींद आ जाती है सुहागा! क्या बिजली और क्या पंखा?’’ अम्मा की खुली, गला खोल आवाज से सुहागा कुछ समझा हो, नहीं लगा। पर अम्मा ने खूब तंज कसा था।

बल्ली बाहर आया, माँ की ओर देखे बिना ’आता हूँ अम्मा’ कह, साथ चल दिया। औलाद के जवान होने पर मुँह में पानी भरना पड़ता है नहीं तो पानी उतरते देर न लगती है, ये सोचकर वो चुप रही पर ये हमेशा नहीं होता। कभी-कभी तो उसे देखते ही पिनक उठती है अम्मा।

सुहागा बलराज से आठ-दस बरस बड़ा होगा। बदन का ऊँचा पूरा। नानी की जायदाद पर गोद आया हुआ। गप्पी नम्बर एक। पूरा बचपन यहीं बिताया, नानी ने कभी पिता के पास रहने ही न दिया। कभी मास्टरों की शिकायत लाता, कभी साथ पढ़ने वाले सहपाठियों की। नानी अपने लाड़ले के लिए सबसे लड़ने को तैयार रहती। मूल से ब्याज प्रिय होता है, फिर ये तो ऐसा ब्याज था जिसपर नानी का बुढ़ापा टिका था।

अम्मा को सुहागा फूटी आँख नहीं सुहाता था। जब देखो तब खबरों का पुलिंदा खोले रहता है खबरी लाल। कमाई धमाई में तो मन नहीं लगता, दूसरों की बातें करा लो बस।

सच था इलाके के सभी नामी गिरामी या आम लोगों के किस्से और राज उसकी स्मरण शक्ति से बँधे थे। पात्र पहचाने या ना पर उनके कथोपकथन तथा मनोदशा का ज्ञान उसे था। प्रस्तुतिकरण भी अद्भुत प्रभावशाली था। कोई नयी घटना नहीं घटे तो पुराना वृत्तांत ही बिना प्रसंग के आरम्भ हो जाता था।

इधर बलराज उर्फ बल्ली दो बहनों का छोटा भाई था, पिता के जाने के बाद खेत-खलिहान संभालने में जुटा था। अम्मा ने पिछले बरस ही गौना करवाया था। नाम से नहीं शरीर से भी बलिष्ठ था, दोहरे बदन का सजीला धीर, गंभीर, थोड़ा धुन का पक्का। शाम को अम्मा जब दूध दुहने बाल्टी पकड़ाती तो आधा धारोष्ण दूध उसी के उदर में समाता। परिश्रम में भी प्रथम। खेतों का काम हो या खलिहान का। अनाज कटनी हो या बुवाई। अनाज के बोरे कंधे पर लाद झट से उठा ले जाता था। दौड़ लगानी हो या दण्ड बैठक की होड़ सुहागा का साथ उसे रूचता था। ऐसी ही रूचियाँ उनके साहचर्य का कारण थी। श्रोता वक्ता का और वक्ता श्रोता का कायल था।

अम्मा के लिए बल्ली उसके बचे जीवन में आशा की किरण थी, वो भी आसपास बन रहे घरों की तरह पक्का घर चाहती थी, घर में ट्रेक्टर हो, ट्रॉली हो। नल का पानी ठेठ चौके तक चला जाए, बरसात में कहीं बरसाती ना ढँकनी पडे। ठंड में ढोर-मवेशी भी पाले से बच जाए। पर सुहागा कहाँ बल्ली का चित्त लगने देता है।

‘‘चल मुन्ना सावन बीत गया भोले बाबा का भोग न लगा।’’

‘‘चल, आज तो जलतुरई का प्रसाद लेंगे।’’ ये बातें अम्मा को चुभती है अम्मा जानती है, सुहागा मछली-तीतर खाता है, गाँजे की चिलम फूँकता है। परसों ही तो कुँआ जुड़ाई वाला बेलदार रो रहा था, उसके सामने। कहता था धमका-धमका कर काम करवा लिया और पैसे देते वक्त मुक्का दिखाने लगा। वह तो अम्मा से दबे शब्दों में बल्ली का साथ छुड़ाने की बात भी कह गया। कुँए में खूब पानी निकला पर बिना मोटर डाले पानी का क्या काम लिया? फसल सुखा दी। अब कहो, आलस की भी हद होती है। मुँआ........... न जाने क्या जादू कर डाला है बेटे पर, एक हाँक में दौडा चला जाता है। अम्मा हर बार बल्ली से दोस्ती तोड़ने का आग्रह करती, आँखों देखी घटनाओं का उदाहरण दे देकर यह साबित करती कि ऐसे चटोर, व्यसनी और आलसी मरते समय कफन के लिए भी कुछ नहीं छोड़ जाते। पर सब निरर्थक। अम्मा को बड़बड़ाता देख बल्ली भी गर्म पड़ जाता- ‘‘आखिर तेरी ये रोज रोज की खिट-खिट की आदत कब छूटेगी। जब देखो, जब सुनो एक ही बात। एक ही बात की रट सौ बार लगाएगी।’’

‘‘मैं तो सौ बार छोड़, हजार बार बोलूँगी। तेरा जीवन बिगाड़ कर मानेगा ये मरा। .......... इसी गाँव में बसना था इसे......।’’

अम्मा किस्मत को ठोकती रहती। बल्ली तेज कदम उठाता निकल जाता। मैत्री विच्छेद का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। जेठ की दुपहरी। सारा गाँव घरों में गठरी की तरह सिकुड़ा हुआ। परिंदे भी छाँह ढूँढ कर ठहर गए थे, दूसरी पारी में जानवर चारा चरने चले गए थे। इक्का दुक्का घरों से कपड़े कूटने की धप-धप भी बंद थी। महिलाएँ भी दो घड़ी सुस्ता रही थी।

आलस में डूबे गाँव में रामचन्द्र बाबू की बहू की चीख गूँजी। ‘‘कोई तो बचाओ, बचाओ, मार देगा, बाबूजी को मार देगा।’’ बहू को न पल्लू का भान था, न लोकलाज का वो फाटक खोले सड़क पर चिल्ला रही थी। संयोग से बल्ली सड़क पर ही था दौड़ पड़ा।

रामचन्द्रबाबू प्रतिष्ठित किसान थे, लड़के शिक्षित हो शहरों में बस गए, पैसों से पैसे जुडते गए। (देखते ही देखते समृद्धि ने पैर पसार लिए) वैसे भी नदियाँ समुद्र की अथाह जलराशि में ही समर्पण करती है रेगिस्तान में नहीं। कभी कभी अत्यधिक समृद्धि से व्यक्ति आत्मकेन्द्रित बन जाता है। वे भी गाँव में किसी से अधिक मेलजोल नहीं रखते थे। बढोतरी होती गई। साज-सँभाल के लिए कई नौकर थे। उन्होंने पाले पर आई भैसों के लिए पिछले दिनों पास के गाँव से एक भैंसा बुलवाया था। दोपहर में चरवाहा सारे ढोर-कैर समेटकर ले गया। रामचन्द्रबाबू के कहे अनुसार महिष अतिथि और स्वागतकर्ती महिषनियों को छोड़। रामचन्द्र बाबू कुछ देर बाद, चरवाहे के काम की सत्यता नापने आखर तक पहुँचे। देखा ते अतिथि, अपना सींग खूँटे की साँकल में लिपटाए खड़ा था, छूटने की पुरजोर कोशिश से कसमसा रहा था। सरल हृदय बाबू जी ने उसे मुक्त कराना चाहा। भैसा तो जन्मजात स्वच्छंद था। रामचन्द्र बाबू की उपस्थिति या कहिए सहायता उसे बाधा बनकर खटकी। अपनी उन्मत्ता को उसने दूसरी दिशा में मोड़ दिया। ये क्या? साँकल हटते ही रामचन्द्र बाबू को सिर का जोरदार धक्का दिया और सँभलने का अवसर दिए बिना बार-बार वार करने लगा। उनकी चीख सुनते ही बहूरानी ने हल्ला मचाया था।

इधर बल्ली आज चरवाहे के ना आने पर अपने ढोरो को तालाब पार छोड़कर आ रहा था। आखर में जाते ही माजरा समझ गया। और लहुलूहान रामचन्द्रबाबू को देख भैंसे को चुनौती दे डाली। भैंसा पीठ किए हुँकारे भर-भर खम्बे की आड़ में दोहरे हुए बाबू जी को मारने हेतु प्रयासरत था। गालियों की बौछार करते हुए बल्ली ने उसके दोनों पैर पकड़ लिए। पहली पकड़ में ही भैंसे को अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति का अंदाजा मिल गया था, बल्ली भी अपनी भुजाओं को तोलने लगा। कोलाहल बढ़ गया। लोग लाठियाँ ले-ले दौडे। अब भैंसे ने अपनी उग्रता और शौर्य को तिलांजलि दे दी। बल्ली और लाठियों ने उसे मिट्टी सुंघाकर आसमान दिखा दिया।

झटपट रामचन्द्र बाबू को शहर ले जाया गया। दुलत्ती खाए हुए बल्ली को भी सँभाला गया। शाम होते होते हर घर के चूल्हे पर यहीं बात थी। सारा गाँव बाबूजी के घर उमड़ पड़ा था, हर आदमी आखर जाकर महिषासुर के दर्शन किए बिना घर नहीं लौटता था।

अम्मा रामचन्द्र बाबू की बहू के पास बैठी थी। बहूरानी बारम्बार अम्मा के पैर पकड़े जा रही थी। आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। पास पड़ोस की सभी औरतें घटना का क्रमबद्ध आँकलन कर रही थी। कभी निराशा की बातों के बीच, अच्छे भाग्य की, अच्छे कर्मों की दुहाई दी जाती। तो कभी अनहोनी के हाहाकार का संवाद चलता। बाते अन्ततः बल्ली की वीरता पर ठहर जाती। निर्विवाद रूप से बल्ली आज की घटना का घोषित योद्धा था।

अम्मा आज मन ही मन भाग्य को सराह रही है, दो बार घर जाकर बल्ली को देख आई है। बल्ली के आसपास भी झुण्ड लगा है, कोई बल की प्रशंसा कर रहा है तो कोई बुद्धि की। सुहागा तो बौखला गया है दौड़कर अपने घर से ही घावों पर लगाने प्याज हल्दी की लोई बना लाया है, बल्ली के शरीर पर आई छोटी-छोटी खरोचों की गिनती कर रहा है। हल्दी दूध पीने की मनुहार कर रहा है, पंखा झल रहा है। बार-बार भैसे के अपराध को गंभीर बता रहा है। मुन्ना........ मुन्ना कहता हुआ उद्वेलित सा भटक रहा है। अम्मा को वह आज भी बिचकाना लग रहा है ’’हुँअ....... आया बड़ा मुन्ना मुन्न कहता।’’

दूसरे दिन फिर बात फैली-

रामचन्द्र बाबू के आखर में वो भैसा मरा मिला है। मुँह झाग से भरा था। खूब पैर मार-मार तड़फा होगा, जमीन पर गड्डा पड़ गया, जीभ बाहर निकल आई। लोग तरह तरह की बातें बना रहे थे। कोई कहता रात को कीड़ा-काँटा खा गया। कोई कहता किसी ने भुस्सी में जहर मिला दिया। किसने किया होगा? रामचन्द्रबाबू के बेटे तो अभी घर पहुँचे ही नहीं है, नौकरों को क्या पड़ी? खैर बात आई-गई हुई। दिन बीतने लगे।

पिछले सात दिनों से अम्मा को सुहागा घर आता नहीं दिखा। बुखार चढ़ा है, ऐसा अम्मा को बल्ली से पता चला है। रातभर बादलों की झड़ी लगी रही। सुबह थोड़ा मौसम खुला बल्ली चाय पीकर बाहर निकला। तो सामने अन्यमनस्क सा उदास सा सुहागा खड़ा दिखा। ’’ये जर्जर शरीर से कैसे यहाँ तक आया होगा।’’ सोचता हुआ बल्ली उसे सहारा देकर अंदर ले आया।

आँखें खुल नहीं रही, लड़खडाता चारपाई पर घुस गया। पर हठात ही बोलने लगा-

’’बल्ली! दिन में चैन नहीं मिलता है और रातों में नींद नहीं। जो नींद आती है तो ऐसे-ऐसे सपने लेकर कि नींद लेने से डर लगता है। सपने में देखता हूँ बामण कुँए के पास वाले, बड़ की आड़ में वो खड़ा है, मुझे घूर रहा है। जैसे ही बाल्टी कुएँ में डालता हूँ तो उसकी लाल-लाल आँखें पास आती दिखती है। मैं बाल्टी कुएँ में ही छोड़ भागने लगता हूँ। बाड़ कूदकर किसना काका के खेत में घुस जाता हूँ, पैरों में काँटे चुभ गए है। वो भी मेरे पीछे खेत में घुस आया है। पगडंडी पकड़ता हूँ तो वो भी पगडंडी पर आ जाता है तेज दौड़ रहा हूँ, हाँफ रहा हूँ मुड़कर देखता हूँ वो भी खुरों से घूल उड़ाता, हुँकार भरता, मेरे पीछे दौड़ रहा है।’’

‘‘मैं भागते-भागते हनुमान ओटले तक आ जाता हूँ, मुँह सूख गया है निगलने को थूक भी नहीं बचा। सूरज गोल-गोल, घूम रहा है मैं......... मैं चक्कर खाकर गिर गया हूँ।’’

बल्ली सांत्वना देता है ‘‘ऐसा कुछ नहीं है, कल शहर चलेंगे अच्छे डॉक्टर को दिखा आएँगे। बुखार लम्बा चल रहा है इसलिए........।’’

‘‘नहीं नहीं ...... मुझे तो भैंसे का भूत सता रहा है। तू तो मुझे पीर बाबा की दरगाह पर ले चल, नहीं तो दाड़ी वाले चचा को बुला ला। उनने कई भूत-जिन्न भगाए हैं। मुझे भूत लगा है...... भूत लगा है।’’

अब अम्मा की दृष्टि में ममत्व उभर आया है।

सुहागा की हालत देख वह आज नहीं बड़बड़ा रही है।

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रचनाकार: कहानी // सुहागा // हंसा बिश्नोई
कहानी // सुहागा // हंसा बिश्नोई
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रचनाकार
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