बुधवार, 22 नवंबर 2017

भारत में शिक्षा पद्धति कैसी हो ? // राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"

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अर्वाचीन काल में भारत की शिक्षा मैकाले की शिक्षा पद्धति पर ही चल रही है। आज की शिक्षा मात्र नौकरी पाने हेतु क्लर्क तैयार कर सकती है। नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा का अभाव है। डिग्रियों का बोझ लिए आज के युवक युवतियां बेरोजगारी का रोना रो रहे हैं।

   आज की शिक्षा न तो रोजगारपरक है और न ही संस्कारवान बनाने में सक्षम। बच्चों को इतिहास की घटनाएं नहीं पढ़ाई जा रही है। न तो वह सुभाषचन्द्र बोस,भगत सिंह न चंद्रशेखर आज़ाद के बारे में जानते है न कभी पढ़ा है। गांव के सरकारी स्कूलों के बच्चे गाँधीजी के अलावा किसी नेता के बारे में नहीं जानते। हमारे देश के क्रांतिकारियों के चित्र उन्होंने देखे नहीं। कैसी है हमारी शिक्षा व्यवस्था। जिन्होंने आज़ादी के लिए अपने प्राण दे दिए। जो अमर शहीद हैं। क्या आज पाठ्यक्रम में उनके पाठ हैं? देखने की आवश्यकता है । आज देश के हर विद्यालयों में क्रान्तिकातियों,महापुरुषों, सामाजिक सुधारकों,सच्चे देशसेवकों के चित्र लगाकर उनके संक्षिप्त परिचय को विद्यालयों में लगाने हेतु पाबंद करना चाहिए।

   बच्चों में संस्कार कहाँ से आएंगे विद्यालयों में पुस्तकालय विकसित नहीं है। सारी पुस्तकें अलमारियों में बंद है। न कोई पढ़ता है। न कभी पुस्तकालय खुलता है।

   आज के बच्चे मोबाइल गेम में व्यस्त है।साहित्य पढ़ना उन्हें अच्छा नहीं लगता। रामायण,गीता बच्चे नहीं पढ़ते । तो सोचो संस्कार कहाँ से आएंगे। योग प्राणायाम आसन ध्यान कैसे सीखेंगे। विदेशी भाषा पराई है। विदेशी पहनावा पराया है जब हम हर चीज़ के लिए पराये भरोसे हो गए तो नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा कैसे मिलेगी?

  मंत्र बोलना,वेद की ऋचाएं गाना, पूजन अर्चन,पाठ करना सब क्रियात्मक है। बालपन से ही बच्चे को शिक्षित करना पड़ता है।

श्लोक बोलना ,चोपाई बोलना,दोहे बोलना,भजन,गीत गाना ये सब सीखना व सिखाना चाहिए।

   आज के बच्चे कॉमिक्स पढ़ते हैं बाल हंस,बाल वाटिका ,चम्पक, छोटू मोटू किताबें नहीं पढ़ते। कहानी,कविताएँ जो बच्चे पढ़ते हैं उनकी प्रतिदिन की अच्छी आदत हो जाती है। ऐसे बच्चे श्रम कर आगे बढ़ जाते हैं।

   रामायण काल में भगवान राम अपने भाइयों के साथ सुबह उठकर सबसे पहले अपनी माताजी फिर पिताजी फिर गुरुजी के चरण स्पर्श करते थे।

आज तो बच्चे सुबह उठकर देखते है फेसबुक पर फ़ोटो पर कितने लाइक कमेंट आये। सारी संस्कृति बदल गई। विचार करो क्या हम पाश्चात्य रंग में नहीं ढल गए।

  हम जूते पहन कर खड़े खड़े भोजन कर रहे है जबकि हमारी  भारतीय संस्कृति में अन्न को भी अन्न नारायण या अन्न देवता कहकर पूजा जाता है। अन्न देव का अपमान माना जाता है। खड़े भोजन करने से पेट संबंधी कई बीमारियों को हम न्योता दे रहे है। विदेशी संस्कृति से हमें रोग मिले। सुख आनंद नहीं।

  पढ़ाई के साथ साथ उद्योगपरक शिक्षा,व्यावसायिक शिक्षा की जरूरत है। किसी हुनर को पढ़ाई के साथ सीखना जरूरी है। भारतीय संस्कृति गुरुकुल पद्धति को फिर से अपनाने की जरूरत है। हमारे ऋषियों मुनियों की संस्कृति को हमें सीखना होगा। वेद,पुराण गीता,रामायण को प्रतिदिन पढ़ना चाहिए। प्राचीन खेलों को बढ़ावा देना चाहिए।

बच्चे आत्मविश्वासी,स्वावलम्बी बने मजबूत, बने इस हेतु शारीरिक खेलों को खेलने हेतु

पूर्ण व्यवस्था होना चाहिए।

हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाना हम सभी का कर्तव्य है आओ हम आज की शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन कर भारतीय संस्कार व संस्कृति को बचाने के काम में जुट जाएं। हमारा परिवेश अच्छा तभी होगा जब हम समाज में व्याप्त बुराइयों से देश के हर व्यक्ति को बचा पाएंगे।

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  98,पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी पिन326502

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  1. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 23-11-2017 को प्रकाशनार्थ 860 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। प्रातः 4:00 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक चर्चा हेतु उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

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