गुरुवार, 30 नवंबर 2017

आत्मसम्मान (लघुकथा) पंकज ‘प्रखर’

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आत्मसम्मान (लघुकथा)

पंकज प्रखर

कोटा ,राज.

‘तो क्या हो गया बेचारी विधवा है खुश हो जाएगी |’

ये शब्द जैसे ही सोनम के कानों में पड़े, सहसा उसके कदम रूक गये दरअसल उसकी भाभी उसके भाई द्वारा उसे दिए गये उपहार की उलाहना दे रही थी | अभी कुछ तीन साल पहले ही सोनम का विवाह सार्थक से हुआ था | घर परिवार सब अच्छा था और ससुराल, ससुराल कम बल्कि मायका ज़्यादा लगता था वो अपने ससुराल में रानी की तरह रहती थी |

सार्थक उसे हमेशा अपनी पैतृक सम्पति के बारे में बताता रहता था और कहता था हमें किसी पर भी ज़रुरत से ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए वो चाहता था की सोनम को भी उसकी सम्पत्ति की जानकारी रहे | लेकिन ये बात जब भी वो शुरू करता सोनम कहती क्या जरूरत है मुझे ये सब जानने की आप तो हमेशा मेरे साथ रहेंगे इस पर सार्थक कहता समय का कोई भरोसा नहीं है चाहे पति हो या पत्नी उन्हें एक दूसरे के बारे में हर एक बात पता होनी चाहिए| जिससे की कभी एक को कुछ हो जाए तो दूसरे को दुःख के दिन न देखना पडे तुम तो पढ़ी लिखी हो सब समझ भी सकती हो |

लेकिन सोनम उसकी बातों पर ध्यान नहीं देती |

मगर हुआ वही जिसका डर था सार्थक को एक गंभीर बीमारी हो गयी .....उसने बीमारी के दौरान ही सोनम को सम्पत्ति के विषय में सब कुछ बता दिया था|

पति की मृत्यु के बाद उसका बड़ा भाई उसे ये कहकर अपने घर ले आया था की तू मेरी बहन नहीं बल्कि बेटी है लेकिन आज उसकी ये बेटी उसके लिए बेचारी विधवा बनकर रह गयी थी| उसका भाई ही उसकी सारी धन सम्पत्ति का लेखा जोखा रखता था और उससे अपने और अपने परिवार के शौक भी पूरे कर लेता था | जिस पर सोनम ने कभी आपत्ति नहीं जताई | लेकिन भाई की ऐसी बात सुनकर सोनम को बहुत ग्लानि हुई और उसके आत्म सम्मान को गहरा आघात लगा उसे अपना आने वाला भविष्य अनिश्चित और दुखद लगने लगा क्योंकि वो केवल एक विधवा ही नहीं थी बल्कि एक बच्ची की माँ भी थी उसे अफ़सोस हो रहा था की ... उसे आंखें बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए था | उस रात वो सो नहीं पायी सार्थक के शब्द उसके कानों में गूंजते रहे | दूसरे दिन उसने अपनी सम्पत्ति की कमान खुद सम्भालने का निर्णय अपने भाई को सुना दिया और सामान समेटकर अपने घर चली आई |

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