मंगलवार, 21 नवंबर 2017

कहानी // मुक्त गगनाँगन // हंसा बिश्नोई

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बड़ा सा कुआँ चारों ओर भीड़, बाल्टियों के छप-टप की आवाज लाख की चूडियों के स्वरों का साथ दे रही थी। बाहर घड़ो को राख से माँजती, चमकाती स्त्रियों की बातें हँसी-ठट्ठे, कोलाहल ही कोलाहल। कुएँ के किनारे दो ओर घिर्री लगी थी बाकी पत्थर की सिल्लियाँ थी जिन पर रस्सियों के निशान गहरे हो चले थे। मस्ती में डूबी रमणियों की रस्सी और बाल्टी भी मस्ताती ऊपर आती, छलक-छलक आधा पानी बिखेरती हुई। तो धीर गंभीर गृहिणियों की बाल्टी सीधी चाल से चलती, पूरी भरी हुई किनारे लगती। कुआँ कई घटनाक्रम को अपने कानों से सुनता......... कभी बीती रात के प्रणय संवाद की खिलखिलाहट से मुस्काता, तो कभी सास-ननद की प्रताड़ना से भरे प्रसंगों पर रूँआसा हो जाता। तो कभी वह माँ के आगे-पीछे डोलते छोटे बच्चों के सिर पर रखे लोटे को देख स्वयं को धन्य मानता और कभी बिवाइयों से फटे पैरो को देख गाँव से कुएँ तक के मार्ग पर अफसोस करता। उषा काल से चली रस्सियाँ दिन चढ़ने तक लहलहाती थी उसकी भुजाएँ बनकर, इधर दोपहर बीतते ही गोधूलि तक। लौटते जानवर और पनहारियाँ दोनों ही उसे एक जैसे लगते..... अपने अपने घर को छूने की ज़िद में, दिन की पूर्णता पर विराम लगाते हुए। रात्रि के अंधकार में वह स्वयं को अकेला पाता। कभी-कभी आते-जाते यात्री पास खड़े पेड़ों के नीचे रात्रि विश्राम किया करते थे।

कुएँ से करीब 200-250 फुट दूर पत्थरों की आधी अधूरी दीवारें थी। नीचे पडे़ पत्थरों पर अस्पष्ट संरचना बनी थी। आसपास खूब झाड़ियाँ; बेल-लता ऊग आयी थीं। बड़े-बूढे़ उसे नागदेवता का वासा बताते तो कभी पुराना श्मशान कहते। वहाँ शायद कोई न जाता था। हाँ, मवेशी उन दीवारों से रगड़-रगड़ कर रक्तपिपासु जोकों और जुओें को मारा करते थे।

पनिहारियों में एक थी स्वरूपा। सामान्य कद-काठी, माँसल अंग-प्रत्यंग, उन्नत ग्रीवा, तीखे नयन। चारों ओर घूमकर फिर नजर वहीं जम जाए, इतना आकर्षण था उसमें। बोली भी वैसी ठहरी हुई, गंभीर। विधाता ने ऐसा चेहरा गढ़ा था जो उसकी सरल दृष्टि ही अहंकारी प्रतीत होती थी। काम से काम, मतलब से मतलब। यही कारण था कि उसके यहाँ आते ही बराबर उम्र वाली कानाफूसी करती। तो वहीं प्रौढ़ा उसे भरी नजरों से देखती थी। वह सभी की अनदेखी करती। घड़ो को भर करबचे हुए पानी को अल्हड़ सखियों के घड़े में उड़ेल देती। नातने को मरोड़ कर झटक कर घड़े पर ढक देती। दो सीढ़ीनुमा पत्थरों को पार कर पहला घड़ा तो कुशलता से शिरोधार्य कर लेती पर हाँ दूसरे छोटे घडे़ के लिए किसी की मदद लेती।

आज दूसरा घड़ा सिर पर रखते हुए गणेश की माँ ने उसका हाथ देखा- ’’हाय राम क्या हुआ बहू कैसे जली?’’ प्रश्न को अनसुना कर पलटती स्वरूपा को रोक लिया गणेश की माँ ने। स्नेह स्पर्श और मधुर वाणी से स्वरूपा को कण्ठ अवरूद्ध हो आया, थूक का घूँट भर कर बोली ’’काकी वो तेल उलट गया कल रात, जल्दी में थी ना। कड़मह से ध्यान हट गया था।’’ पर कुशल काकी का ध्यान तो नहीं हटा था उसने चेहरा पढ़ लिया था इस हतभागिनी का। फिर आँखों की गीली कोर भी बहुत कुछ कह गई। कुछ महीने पहले ही तो डोली आई थी इसकी। भला इतनी जल्दी कोई बहू को कुएँ की जगत छुआता है। सुंदर सुशील स्वरूपा को मिला भी तो कैसा वर-शंकालु, गुस्सैल, लम्पट बंसी। कभी रामसत्ता में आने दे, न बुलावे में जाने दें।

घर से निकलते दस बार माँ से कहेगा ध्यान रखना, मैं जा रहा हूँ। माथे पर अकारण चढ़ी भौंहें, कभी नीचे नहीं उतरती थी। खाने की थाली पर बैठ, नियम से सब्जी भाजी के नुक्स निकालता, सुबह तेज मिर्च की माँग तो शाम को कम मिर्च डालने का आदेश करता। स्वरूपा भयभीत मृगी सी आँखें फाड़े पूरे यत्न से बंसी के अवांछित आदेशों की पालना करती, पर फिर भी पति के मुँह में ठूँसी गालियाँ उसके कानों को प्रतिदिन छूती और देखते देखते हाथ भी छूने लगे।

सास थी पर मूकदर्शा- ’तू जाने और वो जाने’ का वेदवाक्य उसके सभी कर्त्तव्यों पर विराम लगा देता। स्वरूपा समझ नहीं पाई कि माँ, पुत्र की दृष्टि में प्रतिष्ठित होना चाहती थी या पुत्र माँ की दृष्टि में। उसे प्रति दुर्व्यवहार कर, बंसी माँ को रिझा रहा था कि देख माँ मैं ’जोरू का गुलाम’ नहीं। और माँ पुत्र को अप्रत्यक्ष सहमति देकर स्वयं की स्वच्छ छवि बना रही थी। छोटे भाईयों की बड़ी बहन स्वरूपा, घर गृहस्थी को तो तब से संभाले थी, जब उसकी सखियाँ कपड़ों से बने गुड्डे-गुड़िया खेलती थी। माँ की कमी ने उसे समय से पहले ही जग पारखी बना दिया। देहरी लाँघते समय पिता ने कहा था ‘‘चार जनों में कोई मुझे अंगुली उठाके तेरा पिता कहे ऐसा कभी न होने देना।’’ यही बात गाँठ बाँधे वो जी रही है फिर माँ का स्नेह झरना रिसता होता तो जीभर प्यास बुझाती। पिता ने तो उसके हाथ पीले कर उसके साथ-साथ मानो उसके दुःख दर्दों से ही दूरी बना ली। माँ की कभी कुछ हद तक मौसी ने भरी थी पर अब तो पिता और मौसाजी की बैरता में वो भी दूर हो चली।

पिछली बार मौसी रामदीन काका के यहाँ ब्याह में मिली थी। क्या पता, उसके बिना कुछ कहे ही हौले से कहने लगी- ’’इकलौती बहू होना कोई हँसी-खेल नहीं है बेटी। थोड़ा धीरज रख, सब ठीक हो जाएगा।’’ शायद गिरती दशा और बुझे चेहरे को देखकर ही उनने अनुमान लगाया था। संसार सही कहता है ’’माँ मरे मौसी जिए।’’ फूट-फूट कर रोने को जी किया पर आसपास बैठी औरतों को देख मुँह झुका कर आँसू टपकाती रही। मौसी प्यार से सहलाती हुई धीरे से बोली- ’’स्वरूपा हौसला रख बेटी। घूरे के भी दिन फिरते हैं।’’

ऊँची गर्दन पर दो घडे रख जब वह घर की ओर घूमती, तो झाड़ झंखड़ से अटी पत्थरों की आधीअधूरी दीवारों को देखती, मौसी का कहा स्मरण हो आता।’’ घूरे के भी दिन फिरते हैं’’ इस घूरे को देखना उसे अब अच्छा लगने लगा उसी की तरह वीरान निःशब्द खंडहर जिस पर न कोई रंग, न रोगन। न कोई पूछने वाला, न परवाह करने वाला। पर अब उसे यहाँ आना अच्छा लगने लगा, धीरे-धीरे वो हंसने लगी है, बोलने बतियाने लगी है।

आज बाल्टी में बचा हुआ पानी जब पैरों पर डालने लगी तो उसकी नजर सामने बैठी लक्ष्मा के पैरों पर पड़ी। वह रूकी, ये तो उसकी ही पायल है जो वह कई दिनों से ढूंढ रही थी। अपनी पायल देख पूछ बैठी’’ ये.... ये कहाँ से ली लक्ष्मा?’’

’’कहाँ से? शहर से और कहाँ से’’ अपना पल्ला झण्डी सी फहरा के झट से निकल गई वो। आज स्वरूपा यह भी जान गई कि बंशी को गंगा के निर्मल नीर और नाली के गंदे पानी के आचमन में कोई अंतर नहीं दिखता। लक्ष्मा की निर्लज्ज हंसी का भेद अब समझ में आया। क्यों वह भौहे तानकर उसे एकटक देखती थी? क्यों उसके भरे घड़ो को लांघ कर निकलती थी? मैं भोली भाली उसे रोकती भी नहीं बल्कि अनजाने में किया कृत्य मान, टाल देती। मन में स्वयं के लिए क्रोध उपजा। अपनी तुच्छता का ज्ञान हुआ। पर-स्त्री-लोलुप पति के प्रति, मन घृणा से भर उठा।

स्वरूपा सुंदर थी पर पतिप्रिया न बन पाई। त्रिया चरित के अध्याय उसने पढे ही न थें। लटके-झटके, रूठना-रिझाना, मानमनुहार उसने नहीं सीखा था। पिता का मान- सम्मान, मन के संस्कार और लोकलाज ने ऐसी बेडी जकड़ी कि चाह कर भी स्वरूपा क्या कर सकती थी? कैसे इस रिश्ते को तोड़ सकती थी? नारी क्या दोहन के लिए ही बनी है?

त्यक्ता का तिरस्कार और असुरक्षा का भाव उसे भयभीत कर देता। कई बार हिम्मत टूटी-कुएं में डूबने का विचार आया। पर दूसरे ही क्षण मौसी के बोल सुनाई देते।

’’हौसला रख बेटी, घूरे के भी दिन फिरते हैं।’’

देखते-देखते कुएँ की तरूणाई ढल गई। अब न वो कोलाहल रहा, न तो जमघट रहा, न वो बाल्टियों के टकराने की आवाजें रहीं, न ही ओरी... ऐरी... हैंए... करतीं औरतों की चूड़ियों की खनखनाहट रही। अब जीर्ण-शीर्ण होते हुए कुएं में पीपल, फीफर, बैरी की झाडियाँ ऊग चली हैं। पानी तो कब का सूख गया। गाँव तक डामर की सड़क बनी है, बिजली के खम्बे तन गए है। गाँव भी खूब फैला, फला-फूला। अब कोई बैलगाड़ी नहीं दिखती, मोटरसाइकिल और कारों का रेला लगा रहता है। और हां, स्वरूपा के उस घूरे के दिन फिरें। कुएँ से कुछ दूर जो टूटी दीवारें थी। बिखरे पत्थर थे उन पर पुरातत्व विभाग की नजरें पड़ी। उत्खनन का काम अब जोरों से चल रहा है। सुना है कि कोई हजार बरस पुराना मंदिर दबा था। सरकार ने कुएँ तक घेरा बना दिया है। कई अधिकारी डटे है, पत्रकार भी रोज आते है। गाँव का नाम प्रदेश-देश में फैल गया है।

कावेरी पुरातत्व विभाग की एक अधिकारी है इन सभी उपक्रम में उसका बहुत योगदान है या यूँ कहिए कि उसी के प्रयास से इस घूरे के दिन फिरे। हाथ में सेलफोन पकड़े, सिर पर टोपी लगाए, कभी मजदूरों को इधर निर्देश देती है कभी उधर। पीने के लिए पानी मँगवाती है पर बोतल को हाथ में लिए लिए ही फिरा करती है। उसे पानी पीने की भी सुध नहीं। घर से फोन आता है तब काम से ध्यान हटता है।

’’हाँ... दादी अरे, आ गया हाँ हाँ। आज विकास चाचा के यहाँ से ही टिफिन आया है, अरे अपना श्यामा भी अच्छा खाना बनाता है दादी ....... हाँ हाँ मैं खाने ही जा रही हूँ चलो शाम को बात करती हूँ। ठीक है, ठीक है।’’

स्क्रीन पर देख एक बज चुके हैं। कई मजदूर तो टेंट की तरफ चले गए है। उसके कुछ साथी और मीडिया वाले भी छतरी नीचे बैठ, खाना खाने की तैयारी में है।

टिफिन सामने रख कर श्रीधर भी उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। कुर्सी पर बैठ एक ठंडी साँस भर कर उसने चुपचाप बैठे श्रीधर की ओर दृष्टि उठाई। वह उसे ही देख रहा था, मुस्कुराते हुए बोला ’तुम्हारा गाँव बड़ा प्यारा है यार।...ऑसम।

हुँअ..... कावेरी हौले से मुस्काई।

और उससे भी टेस्टी ये खाना..... वैसे आज श्यामा ने भी मजेदार छोले बनाए है।

कावेरी ने कोई जवाब नहीं दिया, दो क्षण चुप्पी बनी रही। अपने घुटनों पर कोहनी रखे हथेलियों से आँखों को हल्के हल्के दबाने लगी।

’क्या हुआ? रोहन का कोई फोन आया क्या?‘

अपनी कुर्सी टेबल के पास खिसका कर कावेरी तन कर बैठ गई, उसकी आवाज में भी कसाव आ गया।

’’साफ-साफ सुन चुका है अब क्या बात करेगा..... अब माँ से बार-बार रिक्वेस्ट कर रहा है।’’ थोड़ा रूक कर बोली ’’अब तो कोर्ट में ही मिलूँगी उससे। इस रिश्ते को जल्दी खत्म करना चाहती हूँ।’’

श्रीधर ने चुप रहना उचित समझा। पिछले महीने कावेरी के पति रोहन की उससे भी बात हुई थी। वह अपनी गलतियों को छिपाते हुए कावेरी को ही दोषी बता रहा था। दोनों चुपचाप खाना खाने लगे, खाना खाने के बाद श्यामा टेबल पर रखें बर्तन समेट कर ले गया। धीरे से वह बोली ’’सुबह माँ से बात हुई थी वो ही राग..... सोच ले बेटा.... छोटी छोटी बातों को आगे नहीं बढ़ाते.....। रूक कर फिर बोली ’’श्रीधर उनसे तो दादी माँ ही भली हैं मुझे समझती तो है।’’

श्रीधर कुर्सी छोड़ चुका था, हाथ आगे बढ़ा कर बोला- ’‘चलो उठो, थोड़ा आराम कर लो।’’

स्वरूपा घर के छोटे से लॉन में झूले पर बैठी, बाहर आती-जाती कारों को देख रही है। आज उसकी पोती अपने गाँव से आ रही है। वहाँ सब मिले होंगे उससे, खूब आशीष बटोर कर ला रही है कावेरी, किसने सोचा था कि उनका गाँव ऐसा इतिहास छिपाए बैठा था। उसे अपने गाँव के साथ-साथ कावेरी की विद्वता पर भी गर्व हो रहा है। वो यूँ ही नहीं पक्ष लेती कावेरी का। अस्तित्व मान की उत्कंट आकांक्षा से भरी है कावेरी, ठीक उसी की तरह। पर........ पर क्या कर पाई वह? तबअस्तित्व ही कहाँ था उसका जिसका मान रख पाती। आज कावेरी के पास शिक्षा है, मोटी तनख्वाह वाली नौकरी है, ममता की छाँव है उसकी मनःस्थिति को समझने वाले श्रीधर जैसे मित्र है। नाते रिश्तेदार, आस-पड़ोस और समाज भी वैसा कहाँ रहा? तो क्यों वह अविवेकी आचरण वाले दंभी पति को स्वीकार करे? आज कावेरी आत्मविश्वास से अपना निर्णय सुना सकती है। अपनी दलीलें देने में उसे कोई हिचक नहीं है। अपनी बातें तर्कों के साथ जब रखती है तो मन में कोई संशय नहीं बचता। घूरे की तरह क्या स्त्री के भी दिन फिरे है? अब स्वरूपा अपनी विस्मृत छवि पर कोई प्रकाश किरण नहीं डालना चाहती। कितना संकुचित था वो अतीत और कितना उदार है यह वर्तमान।

चश्मे में छिपी आँखों को पूरा खोलकर आकाश की ओर देखती है गगनाँगन में उन्मुक्त उड़ान भरते बगुलों की कतार मन को मोह गई।

वो अपने जीवन के उस भाग को भूलना चाहती है, जिसमें वह सिर्फ भोग्या थी। पुत्रों के बड़े होने पर ही उसे यातनागृत से मुक्ति मिली। बंसी के आचरण में परिवर्तन, पुत्रों के भय से तो आया था पर तब तक.... तब तक आधा जीवन तो बीत गया।

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