ख्वाब के गांव में // जावेद अख़्तर

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जावेद अख़्तर का यह कविता संग्रह अपने आप में नायाब है. कुछ-कुछ प्रायोगिक किस्म का. इसे कविता की कॉफ़ी टेबल बुक भी कहा जा सकता है. जावेद अख़्तर की कविताई का आनंद कविता के साथ-साथ तारतम्य बिठाती कलाकृतियों से कई गुना बढ़ जाता है. कलाकृतियाँ कविता-पोस्टर की याद दिलाती हैं. कई शहरों में पहले इस तरह के आयोजन हुआ करते थे - कविता चौराहे पर, जहाँ कविताओं के साथ कलाकृतियों की जुगलबंदी बिठाई जाती थी. परिकल्पना अरविंद मण्डलोई का है, रेखांकन मुकेश बिजौले, कैलिग्राफ़ी अशोक दुबे और ग्राफ़िक्स पवन वर्मा का है. पुस्तक हर मामले में नायाब और नंबर 1 है.

मंजुल प्रकाशन से प्रकाशित यह किताब इस मामले में भी नायाब है कि इसके विक्रय से प्राप्त रॉयल्टी की रकम का उपयोग उपेक्षित-वंचित बच्चों के शिक्षण-प्रशिक्षण आदि में खर्च होगा. मंजुल प्रकाशन का यह प्रयास स्तुत्य है.

अपने बुकशेल्फ में रखने लायक एक जरूरी किस्म की किताब. कुछ पन्नों को समीक्षा स्वरूप नीचे स्कैन कर प्रस्तुत किया जा रहा है. स्वयं अंदाजा लगाएँ -

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किताब प्राप्त करने का पता है -

मंजुल पब्लिशिंग हाउस,

7/32, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, 110002

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