गुरुवार, 30 नवंबर 2017

व्यंग्य // चाय-चर्चा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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जब से भारत में, कभी अपने आरंभिक जीवन में, चाय बेचने/पिलाने वाला एक शख्स प्रधानमंत्री बन गया है, लोग इतने प्रसन्न हो गए हैं कि हर तरफ मोद ही मोद छा गया है। पीएम की बात आते ही मो—दी मो-दी की जयकार होने लगी है और चाय, चर्चा का विषय बन गई है।

वैसे ‘चाय’ और ‘चर्चा’ –ये दोनों मिलकर हमेशा से ही चर्चित रहे हैं। “ओवर अ कप ऑफ़ टी” -- चाय के बहाने बड़े बड़े मसले सुलझाए जा चुके हैं। और तो और अगर किसी लड़की को कोई लड़का पसंद आ जाता है तो लड़की की माँ उसे चर्चा के लिए चाय पर बुला ही लेती है। (सन्दर्भ, एक फिल्मी गाना)। चाय सिर्फ एक पेय-भर कभी नहीं रही। यह संस्कृति का एक हिस्सा हो गई है। इसमें लोग संभावनाएं ढूँढ़ते हैं। राजनैतिक संभावनाएं, व्यापारिक संभावनाएं, वैवाहिक संभावनाएं, सामाजिक संभावनाएं, द्वंद्व-निराकरण की संभावनाए; और भी न जाने क्या क्या !

हाल ही की खबर है। मोदी जी का मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात’ प्रसारित होने को था। गुजरात में चुनाव का बाज़ार गरम है। वहां इस कार्य-क्रम को एक ख़ास, निराले ढंग से, मनाया गया। साठ हज़ार से अधिक पोलिंग बूथों पर चाय का इंतज़ाम किया गया। बीजेपी के दिग्गज नेताओं ने अपने संभावित मतदाताओं के साथ इन बूथों पर चाय पीते हुए मोदी जी की मन की बात सुनी। भाजपा ने इस आयोजन में गुजरात में अपनी जीत की राजनैतिक सम्भावनाओं को तलाश किया। लेकिन कुछ का कहना था इस कार्यक्रम से कुछ होने-जाने व़ाला नहीं है। खेल ख़तम चाय हज़म।

पता नहीं वो अँगरेज़ दम्पति, इमोन और रेबेका, जो ‘मसाला चाय’ पीकर चाय पर फ़िदा हो गया मोदी जी के चाय-सन्दर्भ को जानता है या नहीं लेकिन चाय पीते पीते उसे चाय की एक अपनी दूकान खोल लेने का विचार कौंध गया। चाय से व्यावसायिक प्रेरणा लेने का यह एक अद्भुत उदाहरण है। इस अँगरेज़ युगल को मसाला चाय इतनी पसंद आई कि वह चाय में किस मसाले को डाला गया है इसकी खोज में लग गया और अंतत: इसे प्राप्त करके ही रहा। फिर क्या था कनाडा जाकर उसने टोरांटो में अपनी खुद की चाय की एक दूकान खोल ली जिसमे वह अनेक तरह की चाय बना कर बेचने लगा। और खुद बन गया “चाय वाला”। इस दुकान की मसाला चाय का सोशल मीडिया में भी खूब प्रचार हुआ – नाम दिया गया “फ्रेश ब्लैंड मसाला चाय”। मोदी जी चाय पीते पीते राजनैतिक ऊंचाइयां चढ़ गए, इंग्लैण्ड का यह कपल चाय पीते पीते व्यावसायिक ऊंचाइयां छूने लगा।

भारत में मसाला चाय एक बहुत प्रचलित चाय है। यहाँ चाय तो चाय, सरकारें तक मसाला चाय की तर्ज़ पर बन जाती हैं। इन मसालेदार सरकारों का आस्वादन जनता बराबर लेती आ रही है – झक मार कर ! अरसे बाद मोदी जी ने मसाला चाय की बजाए, मसाला रहित चाय उपलब्ध कराई। देखना है इस सरकार का आस्वादन हम कब तक ले पाते हैं। लोग पीछे पड़ गए हैं। हमें तो मसाला चाय, सौरी, मसाला सरकार ही चाहिए। जब तक चाय में थोड़ी अदरक, नीबू की कुछ बूँदें, तुलसी के दो-चार पत्ते, आदि न पड़े हों, स्वाद ही नहीं आता, भले ही ऐसी मसाला चाय में चाय का अपना स्वाद गायब ही क्यों न हो जाए।

भारत को हर चीज़ मसालेदार ही पसंद है। यहाँ कोई डिश ऐसी नहीं जो मसालेदार न हो। चाय भी हमें मसालेदार ही चाहिए। अब तो चाय का मसाला बाज़ार में अलग से भी मिलने लगा है चाय बनाइये और थोडा सा यह मसाला उसमें छिड़क दीजिए – मसाला-चाय हाज़िर है। लेकिन चाय सिर्फ मसालेदार ही नहीं होती। मसाले रहित चाय के भी कई प्रकार है, कई रंग हैं – ग्रीन टी, ब्लैक टी, यलो टी, व्हाईट टी। अब ग्रीन कितनी हरी होती है और ब्लैक कितनी काली, यलो कितनी पीली होती है और व्हाइट कितनी सफ़ेद – यह तो आप ही जाने। मेरे देखने में तो रंगीन चाय आई नहीं है। मैंने तो हमेशा चाय के रंग की ही चाय पी है। हमारी सरकारों के भी कई रंग हो सकते हैं – कभी काली टोपी वालों की सरकार बनती है, तो कभी सफ़ेद टोपी वालों की। गेरुआ सरकार अगर ऐसे ही अपने करतब दिखाती रही तो हरी टोपी वालों की भी सरकार बन सकती है। लेकिन जनता अच्छी तरह जानती है कि टोपी के नीचे हर सरकार एक सी ही होती है। जैसे नागनाथ, तैसे सांपनाथ। भारत देश ही ऐसा है।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

2 blogger-facebook:

  1. सच है जितना मसाला उतना चर्चित व अच्छा पर चाय अपना स्थान बना ही लेगी।सच यही है।बढ़िया व्यंग्य।

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  2. सही व्यंग। जैसे नागनाथ वैसे सांप नाथ... सही फरमाया आपने। कई बार मसाला चाय फायदेमंद भी हो जाती है। अब देखना ये है कि आने वाली चाय कैसी होगी और फायदेमंद होगी या नहीं।

    उत्तर देंहटाएं

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