गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

डॉ हरिश्चन्द्र शाक्य की 10 लघु कथाएँ

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1. माफ़ी

एक बुजुर्ग आदमी को एक नौजवान ने साइकिल से टक्कर मार दी और बजाय अपनी गलती मानने के उल्टे बरस पड़ा, ''ऐ बुडढे! दिखाई नहीं देता क्या?''

बुजुर्ग ने नौजवान की तरफ देखा और अत्यन्त विनम्रता से कहा, ''गलती हो गयी बेटा, माफ कर दो।''

बुजुर्ग का अप्रत्याशित व्यवहार देखकर नौजवान सोच में पड़ गया कि वह अपनी गलती की माफी कैसे माँगे।

2. दहेज

गाँव में चर्चा फैल गयी थी कि राम स्वरूप की जवान बेटी किसी युवक के साथ भाग गयी।

''मैंने कहा था न कि लड़की के हाथ जल्दी पीले कर दो... पर कौन सुनता है बुड्ढों की बात... अब सारी इज़्ज़त धूल में मिल गयी कि नहीं।'' रामस्वरूप के बाप रामस्वरूप पर क्रोधाग्नि बरसा रहे थे।

''क्यों चीख रहे हो पिताजी .... गीता एक समझदार लड़की है.... उसने जो कुछ किया है अच्छा ही किया है.... कैसे कर पाता उसके पीले हाथ.... यह सतयुग, त्रेता अथवा द्वापर नहीं है पिताजी!.... यह कलयुग है घोर कलयुग.... गीता के हाथ तो तब ही पीले हो सकते थे जब अपने पास लड़के वाले को दहेज देने को होता... वह भाग गयी तो क्या हुआ.... उससे रिश्तेदारी नहीं चलेगी.... उससे जीवन भर का नाता टूट गया.... चलो कम से कम दहेज से तो पीछा छूट गया।'' यह कहते-कहते रामस्वरूप की आँखों से अश्रुओं की प्रबल धारा प्रवाहित होने लगी थी।

3. दहेज दानव

भोले-भाले गरीब किसान राम लखन को अपनी बेटी गीता के लिए वर तालशते-तलाशते पूरे दस वर्ष हो चुके थे किन्तु आज तक वह उसके हाथ पीले नहीं कर पाया था। सैकड़ों वर उसने देखे, पसन्द किये तथा सैकड़ों बार उसने गीता को नुमायशाना अन्दाज में लड़के वालों के समक्ष प्रस्तुत किया। अनेक लड़कों को चाँद से चमकते चेहरे वाली गीता पसन्द आई किन्तु वह आज तक कुँवारी रही यह उसके भाग्य का ही खेल था जिसे टालना रामलखन या गीता के वश में नहीं था क्योंकि रामलखन के पास लड़के वालों को देने को दहेज नहीं था।

आज जब गीता ने फाँसी लगाकर आत्म हत्या कर ली और अपने गरीब पिता की बरसों से उलझी हुई समस्या सुलझा दी तो समाज के कुछ लोगों ने गीता के लिए शोक संवेदना व्यक्त करते हुए रामलखन की रोती बिलखती आत्मा को धीरज बँधाया किन्तु अधिकतर लोग फुसफुसाकर कह रहे थे-

''किसी फुक्के का गर्भ ठहर गया होगा स्साली के.... बिना शादी हुए ही रामलखन को नाना बनाकर कैसे मुँह दिखा सकती थी इसलिए मर गयी।''

कहा जाता है कि दीवालों के भी कान होते हैं। किसी व्यक्ति ने रामलखन के कानों तक जब वह बात पहुँचा दी तो उसको गीता की मृत्यु से भी ज्यादा गहरा सदमा पहुँचा और उसको तुरंत दिल का दौरा पड़ गया। चन्द मिनटों में ही उसके प्राण पँखेरू उड़ गये। वातावरण की खामोशी सिर्फ यह प्रश्न करती रह गयी कि कैसा है दहेज दानव! कब तक डसेगा बेकसूर गरीबों को?

4. तमाचा

इसे भाग्य का खेल कहूँ या अपनी अक्षमता कि डबल एम.ए. कर लेने के बाद भी मुझे कोई ऐसा रोजगार नहीं मिल पाया था जिसे रोजगार की संज्ञा दे पाता। रोजी-रोटी चलाने के लिए अनचाहे ही मुझे न जाने क्या-क्या करना पड़ रहा था। जो कुछ मुझे करना पड़ रहा था वह सब करने की तो मैंने कभी भी कल्पना नहीं की थी। मेरी क्षमताओं और योग्यताओं के साथ कितना खिलवाड़ हुआ था यह तो मैं ही समझ सकता था या फिर कोई मेरा समानधर्मा।

आजकल मैं घर-घर जाकर ट्यूशन पढ़ाकर अपनी उल्टी-सीधी जीविका चला रहा था। संतुष्टि तो कहाँ मिलती, हाँ किसी तरह अनिश्चितताओं के दौर में जीवन की गाड़ी ढकिल रही थी। मेरे पास मेरी एक पुरानी साइकिल थी वह भी एक शादी समारोह में कोई दुष्ट चुरा ले गया था। जीवन की विषमताओं से हार न मानते हुए मैंने पैदल जाकर ही ट्यूशन पढ़ाने जाना शुरू कर दिया था। आज जब मैं किसी एक जगह से ट्यूशन पढ़ाकर गुजर रहा था और किसी दूसरी जगह पढ़ाने जा रहा था। रास्ते में एक मकान के पास गुजरा तो एक औरत अपने बच्चों को डाँटते हुए पढ़ने को बैठाल रही थी और कह रही थी, ''चलो होम वर्क करो मास्टर आ रहा होगा।''

उस औरत की बात सुनकर मुझे ऐसा लगा कि आम आदमी की नजर में ट्यूटर की क्या इतनी ही इज्जत होती है। न तो मैं उस औरत को जानता था और न ही उसके यहाँ पढ़ाने वाले ट्यूटर को। यद्यपि औरत ने वह बात मुझसे न कहकर किसी अज्ञात ट्यूटर के बारे में कही थी किन्तु फिर भी न जाने क्यों लगा था कि उस औरत ने एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर मार दिया है।

5. अभागिन

विमला की आँसुओं से भीगी आँखों की कोरें यह बताने का प्रयास कर रही थीं कि फूल सी कोमल उस लड़की को कोई गहरी वेदना अथवा टीस अवश्य थी। क्या वह अपने आपको किसी कारणवश अभागिन महसूस कर रही थी?

जी हाँ! वह अपने आप को अभागिन ही महसूस कर रही थी। उसका अभागापन था तो यह था कि वह अत्यन्त ही निर्धन परिवार में पैदा हुई थी। पैसे के बिना उसके रूप और सौन्दर्य का कोई मूल्य नहीं था इस क्रूर, हत्यारे और स्वार्थी समाज में। उसके दरिद्र नारायण पिता अनेक जगह उसका रिश्ता तय करने गये किन्तु हत्यारी दहेज की माँग ने उन्हें कहीं उँगली तक नहीं टेकने दी।

अन्त में उन्हें अपने से भी निर्धन एक परिवार मिला जिसके सदस्यों को दो वक्त का भोजन तक उपलब्ध हो पाना सिर पर पहाड़ उठा लेने के समान कठिन था। मरता क्या न करता, इसी परिवार के दिनेश नामक लड़के से विमला के पिता ने विमला का रिश्ता तय कर दिया। दिनेश लम्बा, छरहरा, गौरवर्ण, सुन्दर जवान था किन्तु उसकी गरीबी के कारण कोई भी व्यक्ति उसकी शादी का रिश्ता लेकर नहीं आया था जबकि उसकी उम्र पैंतीस वर्ष हो चुकी थी। दिनेश के पिता ने विमला के रिश्ते को बिना दहेज तय किये ही आँधी के आम की तरह गपक लिया।

आज विमला के घर पर दिनेश के पिता आये हुए थे। उन्होंने रोते बिलखते हुए विमला के पिता से कहा था, ''भाई साहब! आपकी अभागिन लड़की से रिश्ता तय कर लेने के कारण मेरा इकलौता बेटा दिनेश इस संसार से सदा के लिए चला गया।''

दूसरे कमरे में बैठी विमला के यह सुनते ही होश उड़ गये थे और वह पत्थर के बुत की भाँति बैठी सोच रही थी कि मैं भी कैसे अभागिन हूँ। यह सोचने के सिवा उसके पास बचा ही क्या था।

6. ईमानदारी का मूल्य

राजेश गाँव में दूध का धन्धा करता था। वह आस पास के गाँवों से दूध खरीद कर बीस किलोमीटर दूर शहर में ले जाकर हलबाइयों को बेचता था। पड़ोस के एक गाँव से वह साठ लीटर दूध लाता था। शहर के हलवाई हफ्ते में एक दिन उसके दूध का एक लीटर का नमूना भर लेते और उसके सामने उस दूध का खोया बनाते। यदि एक लीटर दूध का दो सौ पचास ग्राम खोया बनता तो दूध शुद्ध माना जाता और यदि खोया दो सौ पचास ग्राम से कम बनता तो दूध में पानी की मिलावट मानी जाती। भैंसों के पालक दूध में पानी मिलाये बगैर नहीं मानते थे और हलवाई पानी के पैसे काटे बगैर नहीं मानते थे।

एक दिन राजेश के दूध के नमूने के एक लीटर दूध का मात्र एक सौ पच्चीस ग्राम खोया ही बना इसलिए हलवाई ने उसके आधे पैसे काटकर पूरे हफ्ते का भुगतान कर दिया। राजेश म नही मन तिलमिलाकर रह गया। उसने आज तय कर लिया था कि सारा दूध अपनी आँखों के सामने ही दुहायेगा। किसी का विश्वास करने की अब कोई आवश्यकता नहीं। जब चार पैसे बचेंगे ही नही ंतो ऐसा धन्धा करने से क्या फायदा।

अगले दिन वह एक व्यक्ति के यहाँ दूध दुहाने पहुँचा। भैंस वाले व्यक्ति ने प्रतिदिन की भाँति भैंस उटका दी और फिर थोड़ी देर बाद आने को कहा। राजेश उस व्यक्ति की नजर में तो चला गया किन्तु वह उसके दरबाजे के पास ही छिपकर खड़ा हो गया। उस व्यक्ति ने तुरन्त भैंस दुही और दूध में पानी मिलाने लगा। राजेश सब कुछ छिपकर देख रहा था। उसने उस व्यक्ति को रँगे हाथों पकड़ लिया। उस व्यक्ति पर घड़ों पानी पड़ गया और उसने उसी समय से राजेश को दूध बेचना बन्द कर दिया। इस घटना की गाँव में चर्चा हो गयी तो अन्य लोगों ने भी कोई न कोई बहाना बनाकर राजेश को दूध नहीं दिया। राजेश खाली टंकियाँ लेकर घर लौट आया। अन्ततः ईमानदारी से धन्धा करने की कसम खा लेने के कारण उसका दूध का धन्धा ही बन्द हो गया। वह सोच रहा था कि क्या समाज में ईमानदारी का यही मूल्य है।

7. सालिगराम

सालिगराम मोमबत्तियों की एक फैक्टरी में काम करता था। दीपावली के मात्र छह दिन शेष रह गये थे इसलिए रात दिन जोरों का काम चल रहा था। मोमबत्तियों की इतनी माँग थी कि आज का बनाया माल कल के लिए नहीं बचता था।

ऐसे ही समय में सालिगराम की बाँह मोमबत्तियों की मशीन के शिकंजे में फँस गयी और उसे काफी चोट लग गयी। दूसरे दिन जब वह आया तो उसकी बाँह सूजी हुई थी। उसने फैक्टरी के मालिक से गिड़गिड़ाते हुए कहा, ''बाबूजी अब मुझसे काम नहीं होगा, मेरा हिसाब कर दीजिये।''

''क्या बाबूजी बाबूजी लगा रखी है.... काम करो.... तमाम आर्डर आ रहे है.... हिसाब दीपावली के दिन कर दूँगा।'' फैक्टरी मालिक ने झुँझलाते हुए कहा। फैक्टरी मालिक को उस समय अपने मुनाफे के अलावा और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। सालिगराम ने काम न कर पाने के लिए बहुत अनुनय विनय की पर फैक्टरी मालिक को तनिक दया न आयी। विवशता के आँसू पीता हुआ व फैक्टरी मालिक को कोसता हुआ सालिगराम काम पर लग गया। उसकी वेदना को समझने वाला वहाँ कोई न था।

8. जेबकतरा

मैं अपने ही नगर मैनपुरी के करहल चौराहे पर खड़ा था। वहाँ काफी चहल--पहल थी। वहाँ दो चार लोग अचानक ही एक युवक को मारने-पीटने लगे। तभी देखते ही देखते वहाँ भीड़ लग गयी और सारी भीड़ उस युवक को पीटने लगी। भीड़ में से अनेक स्वर उभर रहे थे। कोई कहता, ''मारो-मारो और मारो साले को'' तो कोई कहता कि जेब कतरा है साला। कोलाहल सुनकर मैं भी भीड़ के पास मामले की जानकारी प्राप्त करने पहुँचा। तब तक लोग उस युवक की जामा तलाशी लेने लगे थे। वह युवक रोने के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहा था। भीड़ के लोगों ने उसकी जेब में पड़े हुए रुपये भी निकाल लिये। जिसके हाथ में जितने रुपये पड़े छीन ले गया।

भीड़ में मेरे जैसे करुणाशील हृदय रखने वाले लोग भी खड़े थे। उन लोगों ने युवक को पूछा, ''तू कहाँ का रहने वाला है और असली बात क्या थी?''

युवक ने फूट-फूट कर रोते हुए बताया, ''बाबूजी मैं बिहार का रहने वाला हूँ.... रोजी रोटी के लिए एक ट्रक पर क्लीनर हूँ.... मेरा ट्रक यहाँ खराब हो गया.. जब ट्रक ठीक हो गया तो मेरे साथी मुझे छोड़कर ट्रक हाँक ले गये.... मेरी जेब में बहुत कम पैसे थे... मैं यहाँ खड़ा-खड़ा सोच रहा था कि अब क्या करूँ तभी मेरा हाथ हड़बड़ाहट में एक व्यक्ति की जेब से छू गया। उस व्यक्ति ने चिल्ला दिया- जेब क़तरा- जेब कतरा... फिर क्या था मुझ पर घूसों और थप्पड़ों की बरसात होने लगी। मेरे पास जो बहुत कम पैसे थे वे भी आप लोगों ने छीन लिये।''

उस युवक की करुण कहानी सुनकर करुणाशील हृदय रखने वालों का हृदय द्रवित हुए बिना न रह सका।

''किसने लिये हैं इसके रुपये?'' भीड़ में से एक स्वर उभरा। तभी कई मानव स्वर उस आवाज के सुर में सुर मिलाने लगे। कुछ भले लोगों को यह भी पता था कि उस युवक की जामा तलाशी लेते समय किस-किसने उसके रुपये छीने थे। वे भीड़ में से उन लोगों को पकड़ लाये।

''वापस करो इसके रुपये.... शर्म नहीं आती एक गरीब को लूटते हुए।'' एक कड़क आवाज आयी।

भले लोगों ने सख़्ती से पेश आते हुए तीन चार लोगों से उस युवक के पैसे वापस करवा दिये। मुझे वहाँ खड़े-खड़े इस बात से बेहद सुखानुभूति हो रही थी कि भलमंसाहत अभी जिन्दा है। मैं यह समझ ही नहीं पा रहा था कि असली जेबकतरा वह युवक था या भीड़ में खड़े वे लोग थे जिन्होंने उस संकटग्रस्त युवक के पैसे छीने थे।

9. किसकी गलती

नगर के तहसील चौराहे पर एक ई रिक्शा खड़ा था जिसके पास दो व्यक्ति तेज आवाज में वाद-विवाद कर रहे थे। विवाद की जड़ दरअसल वह ई रिक्शा ही था। दोनों लोग सफेद कुर्त्ते-पाजामें पहने हुए थे। आखिर क्या हुआ, यह जिज्ञासा लेकर मैं भी वहाँ पहुँचा। एक व्यक्ति कह रहा था कि इस ई रिक्शा चालक ने मेरी स्कूटी में टक्कर मार दी जिससे उसका शीशा टूट गया है।

दूसरा व्यक्ति कह रहा था, ''बेचारे रिक्शा चालक की कोई गलती नहीं है.... आप बेवजह उसे रिक्शावाला कमजोर आदमी समझ कर सता रहे हैं।''

विवाद और तेज होता जा रहा था और वहाँ भीड़ जमा होती जा रही थी। भीड़ सिर्फ यह देखती है कि गलती किसकी है। जिसकी गलती होती है उसी पर पिल पड़ती है।

पहला व्यक्ति उस ई रिक्शा वाले पर रौब जमाते हुए शीशे का हर्जाना माँग रहा था। न देने पर उसे कोतवाली ले जाने को कह रहा था। दूसरा व्यक्ति जो उस ई रिक्शा की सवारी था वह भी कहाँ था अन्याय होता देख कर चुप रहने वाला।

पहला व्यक्ति भड़क कर बोला, ''आप कौन होते हैं इसकी हिमायत करने वाले।'' मुझसे भी फिर रहा नहीं गया और फिर मैं भी बीच में बोल पड़ा, ''ये प्रत्यक्षदर्शी गवाह हैं।'' मैंने फिर दूसरे भले सज्जन से कहा, ''भाई साहब! आप इनके साथ कोतवाली चले जाइए।''

भीड़ ने जान लिया था कि गलती पहले वाले व्यक्ति की है। भीड़ ने यह भी जाँच कर ली कि यदि शीशा यहाँ टूटा होता तो उसकी किरचें तो सड़क पर पड़ी होनी चाहिए थी। भीड़ का न्याय त्वरित न्याय होता है। पहले वाले व्यक्ति ने समझ लिया कि उस पर भीड़ की मार पड़ने ही वाली है तभी वह अपनी स्कूटी पर सवार होकर भाग गया। ई रिक्शा चालक ने राहत की साँस ली और उन भले सज्जन को भगवान समझ कर अपना ई रिक्शा आगे बढ़ा ले गया। उस असली हीरो जिसका ई रिक्शा चालक कुछ नहीं लगता था की सभी तारीफ करते खड़े रह गये।

10. दोष

नाले के पुल पर प्रतिदिन चाट पकौड़ी का खोमचा लगाने वाला मोहन आज अपने खोमचे का सारा सामान पानी से भरे हुए गन्दे नाले में फेंक रहा था। मेरी नजर जैसे ही मोहन पर पड़ी तो मैंने कौतूहल से दूर से ही मोहन को देखा और सोचने लगा कि आज इस मोहन को न जाने क्या हो गया है। कहीं उस पर पागलपन का दौरा तो नहीं पड़ा है।

अपनी जिज्ञासा शान्त करने हेतु मैं मोहन के पास पहुँचा तो देखा कि उसी क्षेत्र का एक दबंग किस्म का पैंतीस वर्षीय युवक आँखें नीली-पीली करते हुए उसे आज्ञा देने में लगा हुआ था। दबंग युवक मोहन से जो-जो कहता जाता मोहन वही-वही करता जाता। समोसों से भरा थाल मोहन ने नाले में ऐसे झोंक दिया जैसे कूड़े-करकट का ढेर हो। गोल गप्पों से भरी काँच की पेटी, लोहे का स्टोब, भगौने आदि सभी बर्तन मोहन ने पल भर में ही नाले में फेंक दिये।

मोहन ने जब सारा सामान नाले में फेंक दिया तब दबंग युवक ने उसका ठेला लात मारकर दूर भगा दिया और मोहन से शेर की भाँति गरजते हुए बोला, ''भाग यहाँ से.... कल से यहाँ आया तो मैं तेरी जुबान खींच लूँगा।'' यह कहते-कहते उसने मोहन के गाल पर दो चार तमाचे भी जड़ दिये।

मोहन सब कुछ ऐसे सह गया जैसे उसके अन्दर पुरुषत्व ही नहीं हैं। वहाँ खड़ी सारी भीड़ मूक दर्शक बनी तमाशा ही देखती रही। किसी की भी यह हिम्मत नहीं पड़ी कि कोई उस दबंग युवक से पूछ ले कि एक गरीब को क्यों सता रहे हो। मैंने भी वहाँ चुपचाप खड़े रहना ही उचित समझा क्योंकि मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने का मतलब मैं भली-भाँति समझता था।

मोहन के साथ जो बदसलूक हो चुका था वह ही कम नहीं था किन्तु दबंग युवक का कलेजा अभी भी नहीं ठंडाया था। मोहन जैसे ही उस युवक के पैर छूकर अपना ठेला लेकर जाने लगा दबंग युवक ने उसे फिर रोक लिया और थोड़ा आगे चलकर बीच चौराहे पर उसे मुर्गा बना दिया।

मोहन के साथ ऐसा बदसलूक क्यों किया गया यह सब जानने को मेरा मन मस्तिष्क बेचैन था। मैं जिसको भी पूछता वही कह देता, ''पता नहीं।'' जब दबंग युवक दूर चला गया तब बड़ी मुश्किल से एक व्यक्ति ने अपना मुँह खोला। उसने बताया कि मोहन का दोष यह था कि अभी कुछ देर पहले दबंग युवक का अंगरक्षक यहाँ चाट पकौड़ी खाने आया था। जब वह खा चुका तो मोहन ने उससे पैसे माँग दिये थे।

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- डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0

शाक्य प्रकाशन, घण्टाघर चौक,

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स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर, मैनपुरी (उ0प्र0) भारत


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