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लघुकथाएँ : डॉ. अमरनाथ ‘अब्ज’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

डॉ. अमरनाथ ‘अब्ज’

आत्मविश्वास

‘तुम जिन्दा कैसे हो? इतने झंझावातों के आने पर भी. जीवन रस कहां से पाते हो?

‘समाज से.’

इसी समाज में अपना परिवार भी है जो रेल दुर्घटना में कटे दोनों पैर को उसी तरह छोड़ दिया जिस तरह पटरी पर तुम्हें तड़पते हुए रेल चली गई.

‘तो क्या हुआ?’

‘कहते हो क्या हुआ? समाज से विद्रोह कर संसार बसाया. लेकिन...’

‘लेकिन क्या?’

‘प्यारी बच्ची के मुंह देखने के लिए बच्चों की तरह बिलखते रहे और परायों ने तन, मन धन एवं खून से तुम्हें सींचा.’

‘मेरा रोम-रोम उन सभी का ऋणी है. मैं कभी भी उऋण नहीं हो सकता.’

‘खैर! यह तो बताओ कि संजीवनी कहां से पाते हो?’

‘ईश्वर में आस्था और आत्मविश्वास से.’

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