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लघुकथाएँ : डॉ. गायत्री तिवारी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

डॉ. गायत्री तिवारी

स्वार्थ का गणित

माही एक लिफाफे में एक नोट रखती, फिर निकालती, फिर रखती. वह सोच रही थी कि मेरे जन्मदिन पर निधि ने कितने का तोहफा दिया था. वह मन ही मन गणित लगा रही थी कि उसने निधि को और निधि ने उसे कितनी बार क्या दिया. इसी उधेड़बुन में लिफाफे में कभी ज्यादा नोट रखती, फिर निकालती और फिर रखती. थोड़ी दूर पर बैठी मां माही की हरकत को देख रही थी. वह बोलीं, ‘माही, जहां प्रेम होता है, वहां हिसाब नहीं होता और जहां हिसाब होता है, वहां प्रेम नहीं होता. तुम तो खुले दिल से लिफाफे में नोट रख दो.’

माही को लगा, मां ने उसे स्वार्थ के गणित से अलग प्रेम का गणित समझा.

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