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लघुकथाएँ : उज्ज्जवला केलकर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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उज्ज्जवला केलकर

उपलब्धियां- कहानी संग्रह-4, कविता संग्रह-2, लघुकथा संग्रह-4, उपन्यास-5, बाल साहित्य की लगभग 28 पुस्तकें प्रकाशित. आदर्श शिक्षिका पुरस्कार-1956

मूलतः मराठी लेखिका.

संपर्कः 176/2, गायत्री प्लॉट नं 12, वसंत दादा साखर कामगारभवन के पास, सांगली-416416 (महाराष्ट्र)

उज्ज्वला केलकर

पेशा

बहुत दिन के बाद मेरे स्कूल का दोस्त मिला. बोला, ‘चलो घर. घर चल के कुछ चाय की चुस्कीयां लेते हैं.’ मैं उस के साथ के घर गया. बातें करते-करते मैंने पूछा, ‘भाई, आजकल तुम क्या करते हो?’

‘राजनीति’.

‘राजनीति ठीक है, पर रोजी-रोटी कमाने के लिए क्या करते हो?’

‘वही, राजनीति!’

‘इसका मतलब है, तुम सरकार चलानेवाली पार्टी में हो.’

‘नहीं, ऐसा नहीं.’

‘फिर?’

‘कहा जाए, तो सभी पर्टियों का और कहा जाए, तो किसी भी पार्टी का नहीं!’

‘मतलब?’ मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

‘यहां आओ!’

मैं उसके पीछे अंदरवाले कमरे में गया. वहां अलमारी में गांधी टोपी, केसरिया टोपी, नीली टोपी, सफेद टोपी, जिस पर आम आदमी छपा था, ऐसी तरह-तरह की टोपियाँ और रुमाल आदि सामग्री तरीके से कतार में रखी थी.

‘यह सब क्या माजरा है.’ मैंने असमंजस में पूछा.

‘आजकल चुनाव का माहौल है. गल्ली से दिल्ली तक अनेक नेताओं की रैलियाँ निकलती हैं. रैली के लिए कार्यकर्ताओं को इकट्ठा करने का काट्रेक्ट दिया जाता है. कॉन्ट्रक्टर हमारे जैसे कार्यकताओं को बुक कराते हैं. जिस की रैली, उस नेता की टोपी पहनना और उस नेता की जय-जयकार करनेवाली घोषणा देना, बस!’

‘अरे लेकिन...’

‘रैली से पहले सुबह चाय-नाश्ता, रैली के बाद भोजन. काँट्रेक्टर उसका दस पर्सेंट कमिश्न काट लेता है और दिनभर की रोजी दे देता है.

‘पर चुनाव खत्म होने के बाद?’

‘किसी चीज की माँग के लिए, किसी निर्णय के समर्थन में रैली, किसी चीज के निषेध के लिए रैली...अपने देश में रैलियां होती ही रहती हैं. रैलियों की क्या कमी?’

फिर एक लोकप्रिय गीत की धुन पर वह गाने लगा.

‘आज-कल के दिन रैलियों के, दूसरों के इशारों पर चलने...’

मैं हतबुद्ध सा देखता...नहीं सुनता रहा.

प्रतिमा

‘साहब जी...’

‘बोल...’

‘सरकार की हर योजना, निर्णय की आलोचना करना, यही हमारी पक्षीय नीति है न्?’

‘हूं...तो फिर...’

‘तो उस दिन आपने मुख्यमंत्री जी की नयी घोषणा का स्वागत कैसे किया?’

‘मैंने किया? कैसी घोषणा? कैसा स्वागत?’

‘वही...नगर के बीचों-बीच उस नेताजी की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा...उस दिन आपने कहा था, सरकार के

विधायक कार्य में हमारा पक्ष अपना सहभाग देगा. अपनी दृष्टि से सरकार का कोई भी कार्य विधायक हो ही नहीं सकता! फिर इस बार सहयोग की भाषा कैसी?’

‘अरे मूरख, प्रतिमा बनानी है, तो चंदा इकट्ठा करना ही पड़ेगा...’

‘हां! सो तो है.’

‘इस काम में हम उन की मदद करेंगे.’

‘क्यों?’

‘तभी तो चंदे का कुछ हिस्सा अपनी तिजोरी में भी आएगा.’

‘उं...’

‘प्रतिमा स्थापना के बाद कभी न कभी, कोई न कोई, उस की विडंबना करेगा.’

‘मगर ऐसा नहीं हुआ तो?’

‘तो उस की व्यवस्था भी हम करेंगे. तब आंदोलन होगा. लूट-मार होगी. दंगा-फसाद होगा. तब तो समझो चांदी ही चांदी...

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