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लघुकथाएँ : रमेश मनोहरा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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रमेश मनोहरा

जन्म : 7 जून 1950, (जावरा, जिला रतलाम)

उपलब्धियां : कविता संकलन-8, कहानी संकलन-6, लघुकथा संकलन-1, अनुवाद- अनौपचारिक कहानी संग्रह का मराठी में अनुवाद

संपर्कः शीतला माता गली, जावरा, जिला-रतलाम

(म.प्र.), पिन- 457226,

रमेश मनोहरा

आश्वस्त

‘अब आप सेवानिवृत्त हो गये, क्या करेंगे?’

‘अभी सोचा नहीं.’ उनका जवाब सुनकर वे चौंक गये.

‘अरे भाई, यह सब तो सेवानिवृत्ति के बहुत पहले सोच लेना चाहिए था.’

मित्र गिरधारी की सलाह को सेवानिवृत्त हो रहे मित्र प्रभात ने कहा- ‘इसमें क्या सोचना?’

‘अरे भाई, बात सोचने की नहीं, उस खाली समय में अब आप क्या करेंगे, कैसे आपका समय कटेगा और जब समय काटने को दौड़ेगा, काटे नहीं कटेगा, उस समय आप परेशान हो जायंगे.’ सलाह देते हुए मित्र गिरधारी बोले.

‘मगर मित्र, मैं कभी परेशान नहीं होऊंगा?’

‘अरे, आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे यह बहुत आसान है.’

‘अरे भाई, हर कठिन चीज को आसान बनाया जा सकता है.’

‘अब ये तुम्हारी फिलॉसफी मेरी समझ में नहीं आ रही है.’

‘और तुम समझ भी नहीं सकोगे.’ प्रत्युत्तर में प्रभाव ने अपना उत्तर दिया. गिरधारी कुछ क्षण सोचते रहे. आगे प्रभात बोले- ‘मगर सेवानिवृत्ति के बाद मुझे समय नहीं मिलेगा.’

‘वो कैसे?’

‘मित्र, मैं एक लेखक हूं. कहानीकार हूं, देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहता हूं, लिखूंगा, पढूंगा और अधिक खुलकर साहित्य का लेखन करूंगा.’

‘मगर इससे आय कहां होगी?’

‘पेंशन मिलेगी.’

‘मुट्ठी भर पेंशन से गुजारा कैसे करोगे?’

‘वैसे ही करूंगा, जैसे इस देश के मजदूर करते हैं.’ अपने लेखन के प्रति आवश्स्त थे प्रभात, मगर इस संवाद से गिरधारी कितने आश्वस्त हुए यह नहीं कह सकते हैं.

भेदभाव

‘बहिनजी, पानी पीने को मिलेगा?’ एक बुढ़िया इस भरी गर्मी में श्रीमती वंदना शर्मा के घर आकर बोली जो घर के बाहर ही खड़ी थी. श्रीमती वंदना शर्मा ने जरा भी सोच-विचार नहीं किया. भीतर जाती हुई बोली- ‘रुको अम्मा, मैं अभी लाती हूं.’

श्रीमती वंदना शर्मा भीतर गई. क्षण भर में पूरा लोटा लाकर बुढ़िया के हाथों में थमा दिया. बुढ़िया ने लोटा मुंह के ऊपर किया और पानी उंढ़ेल गई. फिर वापस करती हुई बोली- ‘बहुत भला हो बेटी.’

कहकर बुढ़िया धीरे-धीरे चल दी. यह सब पड़ोसन श्रीमती सुधा शुक्ला देख रही थी. पास आकर बोली- ‘तुमने क्यों पिलाया उस बुढ़िया को पानी?’

‘गर्मी में पानी पिलाना धर्म का काम है.’

‘जानती हो वो बुढ़िया कौन थी?’

‘हां जानती हूं. वो दलित थी.’

‘तुमने पूरा लोटा उसके हाथ में दे दिया.’

‘क्या करती अगर नहीं देती तो...’

‘अरे लोटा खुद पकड़कर पिला सकती थी. तूने अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया है.’

‘अरे शुक्ला मैडम, तुम किस जमाने में जी रही हो?’

‘क्यों, मैंने गलत कहा क्या?’

‘गलत नहीं कहा है... आजकल इन्हीं लोगों का जमाना है. अगर ऊपर से पानी पिलाती तब वह मेरी शिकायत कर देती कि मेरे साथ भेदभाव किया. फिर गर्मी में किसी प्यासे को पानी पिलाना धर्म का काम है...’

श्रीमती शुक्ला कोई जवाब नहीं दे पायी. चुपचाप अपने घर को चल दी.

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