लघुकथाएँ : डॉ. के.बी. श्रीवास्तव // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. के.बी. श्रीवास्तव

जन्म : 22 अक्टूबर 1948

उपलब्धियां : कविता संग्रह, लघुकथा एवं कहानी संग्रह

निदेशक : जे.पी. आई.पी. हॉस्पिटल मुजफ्फरपुर एवंड रिसर्च (बिहार)

संपर्कः जे.पी. हॉस्पीटल रोड नं.-2, जूरन छपरा,

मुजफ्फरपुर- 8420021,

डॉ. के. बी. श्रीवास्तव

फरेब

रविवार था. मैं पार्क में टहल रहा था. कुछ थकान महसूस हुई तो कुंज के पास बेंच पर आराम करने के लिए बैठ गया.

मुझे लगा कि मेरे पीछे दो महिलाएं गपशप कर रही हैं. महिलाओं की गपशप सुनने का किसका मन नहीं करेगा. अतः उस दिशा में मैंने अपने कान लगा दिए. थोड़ी देर के बाद ही मुझे महसूस हुआ कि उनमें से एक तो मेरे मित्र डॉ. शर्मा की पुत्री हैं.

अभी एक माह पहले उसकी शादी इंजीनियर राकेश से हुई थी. पूरा मुहल्ला जानता था कि नेहा का लव अफेयर साथ ही पढ़ने वाले डॉ. मुकेश से था. यह भी लोग बखूबी जानते थे कि मां-बाप की जिद्द के कारण ही वह राकेश से शादी के लिए तैयार हुई थी. इसी संदर्भ में कुछ भेद की बात नेहा अपनी सहेली से धीरे-धीरे शेयर कर रही थी.

नेहा बोली- ‘मां-बाप दोनों दिल के मरीज हैं इसलिए मुझे उनकी बात माननी पड़ी पर....’

पर अब क्या! उसकी सहेली प्रत्युत्तर में बोली. ‘अब केवल छः माह के बाद लड़ाई-झगड़ा., पुलिस रिपोर्ट, फिर दहेज प्रताड़ना का आरोप फिर घर वापसी. ‘फिर’ डायबोर्स का केस दर्ज, दस लाख का हर्जाना, और फिर मां-बाप धीरे-धीरे दूसरी शादी के लिए दबाव डालेंगे और मैं डॉ. मुकेश का नाम प्रस्ताविक कर दूंगी. जिसे हर हाल में मां-बाप को मानना पड़ेगा. सांप भी मरेगा, लाठी भी नहीं टूटेगी.’

उसकी सहेली पूरी बात सुनकर शाक्ड हो गई थी. फरेबी लड़की का यह ‘फरेब’ सुनकर मैं भी शाक्ड हुए बिना नहीं रह सका था.

घना अंधेरा

‘माताजी, अब कहां आएगा तुम्हारा पुत्र...वह तो छोड़ गया है तुम्हें गंगा किनारे...गंगा माई के सहारे यहां दो-चार बूढ़े-बूढ़ियां रोज छोड़ दिए जाते हैं. उनके सगे संबंधियों द्वारा हम अभी आते हैं कहकर जो जाते हैं तो फिर वापस कहां आते हैं.

वह बूढ़ी माई जब-जब किसी से अपने लड़के के बाबद पूछती तो बस यही एकमात्र जवाब उसे मिलता. सांझ होते-होते उसे अब यही सच लगने लगा था. वह हर किसी से एक ही बात कहती, ‘नहीं रे....मेरा बचवा ऐसा नहीं हैं, क्यों करेगा वह ऐसा मेरे साथ कल ही तो मैंने सब खेती-बाड़ी उसके नाम लिख दी है.’

‘बस यही एक गलती कर बैठी हो माता...हम लोगों ने भी यही कुछ कर दिया था. उसके बाद बेटवा गंगा नहलाने के लिए यहां लाया तो फिर इसी जगह बैठाकर जो गया तो अभी तक नहीं लौटा है. अब तुम्हें अपनी जिंदगी यहीं गुजारनी होगी हम सबों के बीच’.

सड़क की बिजली जल गई थी सड़क पर का अंधेरा मिट गया था, पर उसके दिल में घना अंधेरा छाता जा रहा था. वह भी अपने बेटे की सोची-समझती चाल में बुरी तरह फंस गई थी. वह एक ही दिन में रंक बना दी गई थी.

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