लघुकथाएँ : मुरलीधर वैष्णव // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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मुरलीधर वैष्णव

जन्म : 9 फरवरी 1946

उपलब्धियां : कहानी संग्रह, दो लघुकथा संग्रह, चार बाल कथा संग्रह, दो निबंध संग्रह प्रकाशित

संपादन : लघुकथा संग्रह एवं अन्य

संपर्कः ए-77, रामेश्वर नगर, बासनी प्रथम, जोधपुर

पिन- 342005,

मुरलीधर वैष्णव

पागल

बेटे ने अपने व्यापार के लिए चालीस लाख रुपयों के बैंक लोन का आवेदन किया था. जमानत उसके पिता रिटायर्ड मेजर विक्रम सिंह ने दी थी. उन्होंने इसके लिए अपने मकान-मालकियत के मूल कागजात भी बैंक को सौंप दिये थे. फिर भी बैंक के अनुसार उनके मकान की बाजारू कीमत का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक था. मेजर ने यह बात सुनी तो उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा.

‘सर, क्या आप ही मेजर विक्रम सिंह जी हैं?’ मूल्यांकन अधिकारी ने रोबदार मूंछों वाले निक्कर-टीशर्ट पहने बगीचे में खुरपी कर रहे प्रौढ़ से पूछा-

‘यस, व्हाट कैन आई डू फॉर यू, यंग मैन’ मेजर ने अपने काम में मशगूल रहते हुए पूछा.

‘सर, मैं आपके मकान का वेल्यूएशन करने आया हूं.’

मेजर ने उस पर एक नजर डाली और मन ही मन मुस्करा दिए. साथ ही वे मूल्यांकन अधिकारी की नीयत भी भांप गये थे.

‘ठीक है, मकान का वो क्या... मूल्य...मूल्य...हां, मूल्यांकन बाद में कर लेना. पहले इधर आओ.’ मेजर उसे अपने बगीचे में उगे पहाड़ी चमेली, हर श्रृंगार, रातरानी, बादाम, आंवला, जूही, मोगरा आदि के पेड़-पौधों की तरफ ले गया.

‘अहा! कितना सुंदर! क्या खुशबू है!’ अधिकारी विभिन्न रंगों के गुलाब की क्यारी को देखते हुए बोला.

‘चलो यहीं से शुरू करते हैं. इस क्यारी में खिल रहे चार तरह के गुलाब सिर्फ हिल नहीं रहे हैं मिस्टर! ये आपको झुककर सलाम कर रहे हैं. इनकी कीमत कोई छः लाख रुपये समझिये... और हां, इस पहाड़ी चमेली के यंग पेड़ को देखिए. सबसे ज्यादा महक इस पर खिले सैकड़ों फूलों की ही है. यह बेशकीमती है. दस लाख की तो खाली इसकी महक ही है...एक मिनट एक मिनट... इस हर-श्रृंगार के नीचे बिछी नन्हें फूलों की यह चादर!... कम से कम पांच लाख की तो होगी ही...

अचंभित अधिकारी सम्मोहित सा कभी मेजर को तो कभी पेड़-पौधों को देखता रहा.

‘इधर, इस बादाम के पेड़ की डालियों की ओर भी देखो यंग मैन! एक, दो, तीन, चार... चार कमेड़ी, पांच कबूतर बैठे हैं और इनके आस-पास कोई दस-बारह गौरेया फुदक रही हैं... बोलो, इस दृश्य की क्या कीमत लगाओगे. तीन लाख तो होगी ही... रुको, रुको, नाप जोख का सामान अभी मत निकालो. मकान की दीवार और इस छप्पर के नीचे लटक रहे यह बारह मिट्टी के घरौंदे देख रहे हो? इनमें सात में गौरेया अपने छोटे बच्चों के साथ रहती हैं, तीन में कल ही अंडे दिये हैं... एक-एक लाख का एक-एक घरौंदा है मिस्टर!’

अब अधिकारी मेजर को विस्फारित नेत्रों से देखने लगा.

‘इधर आओ... एक और कोना दिखाना हूं तुम्हें. इस नीम के पेड़ की डालों पर तीन बड़े छीकें लटक रहे देख रहे हो. एक में चिड़िया के लिए बाजरी, दूसरे में कबूतर-कमेड़ी के लिए ज्वार-गेहूं और तीसरे में तोतों के लिए चने की दाल, मिर्ची, फल रखे हैं. और हां...इनके पास ही इनके लिए पानी की कूंड़िये भी लटक रहे हैं. बोलो...क्या कहते हो पांच लाख तो इसके भी लगाओगे ही.’

अब मेजर ने पास ही पड़ी अपनी गन उठा ली, ‘उधर जंगल है न! कभी-कभी इसमे इस्तेमाल की भी जरूरत पड़ जाती है.’ मूल्यांकन अधिकारी गन देखकर घबरा गया. वह बगीचे से आया और अपनी मोटरसाइकिल को किक लगाने लगा.

‘मकान का नाप जोख नहीं करोगे?’ मेजर मुस्कराते हुए बोला.

‘सर नहीं... बस हो गया...’

‘आज सुबह-सुबह किस पागल से पाला पड़ा है’ मन ही मन यह बड़बडा़ते हुए उसने जल्दी से मोटर साइकिल को किक मारी.

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