लघुकथाएँ : अतुल मोहन प्रसाद // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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अतुल मोहन प्रसाद

तीसरा बेटा

दरवाजे पर खट्-खट् की आवाज सुन महेन्द्रजी ने दरवाजा खोला. बचपन के दोस्त आशुतोष को देख प्रसन्नचित्त महेन्द्र बोले- ‘कहो कैसे भूलकर आना हुआ. कितने दिन बाद आये हो आशुतोष?’

‘सबकुछ खड़े-खड़े ही पूछ लोगे क्या?’

‘नहीं...नहीं. अंदर आ जाओ.’ महेन्द्र ने आशुतोष की आगवानी की.

‘कहो कैसे आना हुआ?’

‘देखो. मैं भूलकर नहीं आया हूं. आज सोचा महेन्द्र के घर जाकर उसका हाल-चाल जानकर आऊंगा. यह सोचकर ही चला था. कोई दिख नहीं रहा अकेले हो क्या?’ आशुतोष ने जिज्ञासा जाहिर की.

‘अकेले कहां? पत्नी है न. आ रही है. संतानें अपनी-अपनी जगह हैं और ठीक-ठाक है.’

‘मतलब.’

‘बेटी अपने ससुराल यानी घर है. दोनों बेटे अपने नौकरी वाले स्थान पर बहू-बच्चों के साथ मस्ती के साथ रहते हैं. बाकी बचे हम दोनों.’

‘बेटे आते नहीं क्या?’

‘क्या जरूरत है. तीसरा बेटा है न?’

‘तीसरा बेटा? कौन? तुम्हारे तो दो ही बेटे थे न?’

‘नौकरी ही तो मेरा तीसरा बेटा है. उसे बेटे की तरह ही पाला-पोसा है. अभी भी प्रत्येक महीने तीस हजार पहली तारीख को दे जाता है.’

‘ओह!’

‘जब तक हम लोग जियेंगे तीसरा बेटा साथ निभायेगा. नौकरी के साथ भी नौकरी के बाद भी.’ चेहरे पर मुस्कान लाते महेन्द्र बोले.

पराया धन

विवाह से पूर्व ही पुत्र ने बीस लाख रुपये की मांग अपने घर में रख दी थी जिससे वह महानगर में एक अदद फ्लैट खरीद सके. विवाह के चार दिन बाद ही वह बहू को लेकर नौकरी वाले स्थान पर जाने को इच्छुक था, क्योंकि उसकी छुट्टियां समाप्त होने को थीं. छुट्टी समाप्त होने के पहले उसने अपने पापा के सामने फ्लैट की समस्या रखी. उन्होंने कल प्रातः इस बारे में बताने को कहा.

रात्रि में सोने के समय लड़के के पापा ने अपनी पत्नी के सामने लड़के की समस्या की चर्चा की.

‘देखो जी, विवाह में जो कुछ दहेज में मिला. शादी में जो कुछ खर्च हुआ है उसमें से काटकर लड़के को दीजिये.’

‘किंतु उतने से तो फ्लैट नहीं मिलेगा.’

‘मिलेगा क्यों नहीं? नौकरी तो पांच साल से कर रहा है. जो मिलता है वह तो आपके पास जमा नहीं है. सब तो उसी के पास है न? उसमें से देगा या महीने में जो आमदनी है उसमें से किश्तों में अदा करेगा. अभी दो-दो बेटियां शादी के लिए हैं. उसमें तो खर्च होगा ही. लड़का जब अकेले था तब तो अपनी तनख्वाह से एक पैसा दिया नहीं, अब तो दो हो गये हैं. शादी के बाद दो दिल ही एक नहीं होते बल्कि दो दिमाग भी एक हो जाते हैं. अतः सोच-समझकर पुत्र को जवाब दीजिएगा. अभी तो शादी में का जो बचा है वह उसे दे दीजिए. फ्लैट के लिए कहिए, साल भर बाद विचार कर बतलायेंगे.’

‘ऐसे तो लड़का अपने हाथ से निकला जायेगा.’

‘वैसे भी कौन आपके साथ में है. लड़कियां ही शादी के बाद परायी नहीं होती शादी के बाद लड़के भी पराये हो जाते हैं. जैसे तुम हो गये थे. दहेज लेने से लड़के तो बिक ही जाते हैं न?’ पत्नी ने सफाई पेश की.

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