लघुकथाएँ : संगीता शर्मा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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संगीता शर्मा

उपलब्धियां : हर विधा में लेखन- मुक्ता, सरंचना, प्राची, शुचि, प्राची प्रतिभा, पंजाब सौरभ, जगमग दीप ज्योति, प्रतिनिधि लघुकथाएं एवं ककुभ जबलपुर (म.प्र.) में लघुकथाएं प्रकाशित.

संपर्कः 103, रामस्वरूप कॉलोनी शाहगंज,

आगरा-282010,

संगीता शर्मा

सीख

‘आपसे यह उम्मीद नहीं थी कि मेरे वर्षों के त्याग और कर्त्तव्यनिष्ठा का यह सिला दोगे. आपके घर-परिवार को बनाने के लिए मैंने अपने आपको समर्पित कर दिया. आपने कभी परिवार या मेरे लिए समय निकाला. हमेशा ड्यूटी में व्यस्त रहे.’ मीरा शिकायती लहजे में पति से बोली, ‘अब इस उम्र में मेरा साथ देना चाहिए, लेकिन अब बहू की हां में हां मिलाते हो.

बलराम पत्नी को समझाते हुए बोला, ‘बुढ़ापा सुख शांति से काटना है, तो बहू से बनाकर रखो. उसकी हाँ में हाँ मिलाने की आदत डाल लो.’

डर

‘नाव डगमगा रही है, संभालो डूब जायेगी,’ एक आदमी चिल्लाया था. ‘बाबा तुमसे पतवार नहीं संभल रही है, तो दूसरे नाविक को पतवार क्यों नहीं दे देते?’

‘सालों से यह पतवार चला रहे हैं, इसलिए इन्हें अपने पर पूरा भरोसा है. अपने आगे यह दूसरे नाविक को अनाड़ी समझते हैं.’ उस आदमी की बात सुनकर दूसरा नाविक बोला.

‘सालों से पतवार सम्भाल रहे हैं, इसलिये नाव चलाने में निपुण हैं. यह बात अतीत की हो गई.’ वह आदमी बोला, ‘पतवार चलाने के लिये शरीर में दम चाहिए और यह बूढ़े हो गये हैं.’

‘बेटा इस हाथों में अभी बहुत दम है.’ बूढ़ा नाविक बोला था.

‘बाबा आप अपनी शान के लिये हम सबकी जान खतरे में क्यों डालना चाहते हैं?’ वह आदमी फिर बोला. ‘आप पतवार दूसरे नाविक को थमा दें.’

‘बेटा मुझ पर भरोसा रखो नाव डूबेगी नहीं.’

‘बाबा तुम पर भरोसा रखने का मतलब है, डर डर कर सफर करना’, वह आदमी बोला, ‘डर मौत से ज्यादा खतरनाक होता है.’

दुःख

‘शारदा! लगता तो नहीं था कि तुम पति की मौत के दुख से इतनी जल्दी उबर जाओगी,’ आरती बोली, ‘तुम्हें देखकर अच्छा लगा कि तुमने जल्दी ही उस दुख से अपने को बाहर कर लिया.’

‘सच कह रही हो आरती! तुम्हारे भाई साहब के इस संसार से चले जाने पर मुझे गहरा सदमा लगा था, लेकिन इस दुख से निकलने का श्रेय मेरे बेटे और बहुओं को है.’

‘वो कैसे’ आरती आश्चर्य से बोली, ‘भाई साहब ने तो तुम्हें रानी बनाकर रखा था और ये लोग? ध्यान तो दूर, तुम्हारा जीवन दूभर कर रखा है.’

‘यही वजह तो है, मेरे बड़े दुख की छोटा करने की. अगर ये लोग भी मुझे आदर सुविधा में देते तो मैं पति की मौत के दुख को कैसे भूल पाती? मेरे बेटे बहू रोज मेरे लिये एक नई मुसीबत पैदा करते रहते हैं. इनके दुखों ने पति के जाने का गम भुला दिया.’ शारदा बोली.

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