लघुकथाएँ : पारस दासोत // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

पारस दासोत

वो जो लघुकथा ने कर दिया

वह फोन पर दूर देश पिताजी का निवेदन सुनकर बोला- ‘पापाजी मैं बच्चों से आपकी बात तो करा देता, पर...’

‘बेटे!’ इससे पहले वह अपनी बात पूरी करता, फोन पर आवाज उभरी, ‘बेटे मेरे हाथ में एक पत्रिका है जिसमें एक लघुकथा छपी है, पहले मैं तुझे वो पढ़कर सुनाता हूं. बेटे, जरा अपने फोन को स्पीकर पर तो कर ले. बच्चे पास में होंगे तो वे भी सुन लेंगे. हां तो...

वह फोन उठाकर अपने पास ही बैठी पत्नी से बोला- ‘पांच महीने बीत गये आज बच्चों की उनके दादाजी से फोन पर बात तो करा दें. ‘नहीं कभी नहीं. शायद बच्चे अभी अपना होमवर्क कर रहे हैं, थोड़ी देर बाद करा देंगे.’ बेटे सुन रहे हो न! बेटे... जब बच्चे थोड़ी देर बाद बाहर ग्राउण्ड में खेल रहे थे, पत्नी अपने पति से बोली- ‘चलो अब करा दो बच्चों की उनके दादा जी से बात.’ पत्नी पुलक रही थी. अब, जब उसने अपने बच्चों को फोन पर बात करने लिए पुकारा, बच्चे चिल्लाते हुए बोले- ‘डैडी, अभी हम खेल रहे हैं, बाद में बात करेंगे. बेटे, लघुकथा....’

‘पापाजी, ऐसी...ऐसी...’

फोन कट चुका था.

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