लघुकथाएँ : नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

जन्म : 20 नवंबर 1980

प्रकाशन : हमसफर और छंटते हुए चावल (कहानी संग्रह) तथा भोजपुरी में एक उपन्यास धारावाहिक रूप में प्रकाशित. निरंतर रचनाएं प्रकाशित.

पुरस्कार : कमलेश्वर स्मृति कथाबिंब पुरस्कार (2015) से कहानी ‘बिदावन’ को श्रेष्ठ कहानी के रूप में पुरस्कृत.

नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

एक प्रश्न

इलेक्शन कार्ड बन रहा था. अनपढ़ दीनू काका खुशी-खुशी आम पंचायत से फार्म लेकर आया. किसी से भरवाकर, फोटो चिपका और अंगूठा लगा जमा करने गया.

पंचायत में बैठे बी.एल.ओ. ने कहा, ‘प्रूफ किधर है?’

‘कैसा प्रूफ सरकार?’

‘सबूत कि तुम कहां रहते हो? तुम्हारे नाम- गांव का प्रूफ. आई.डी.प्रूफ, रेसिडेन्शियल प्रूफ.’

दूसरे दिन काका बैंक का पास बुक ले गया.

‘यह नहीं चलेगा. तुम्हारा अपना घर है या भाड़े का?’ बी.एल.ओ. ने पूछा.

‘अपना.’

‘निवास प्रमाण पत्र लाओ.’

काका अपने घर के कागजात ही ले गया.

‘यह नहीं चलेगा. तुम्हारा बर्थ सर्टीफिकेट कहां है?’

‘साहेब, पहले सर्टीफिकेट कहां बनता था.’

‘जाओ वकील से लिखवाकर लाओ.’ बी.एल.ओ. ने काका को चलता किया.

वकील ने एफीडेविट बना दी. फिर बी.एल.ओ. ने कहा कि इसे किसी सरकारी स्कूल में जाकर सत्यापित कराओ.

काका बुरी तरह से टूट गया. हाथ जोड़ गिड़गिड़ाया, ‘काहे साहेब, हमको इतना दउड़ा रहे हैं...? हमार सब कगजवा असली नहीं है...?’

‘दिमाग खराब मत करो. भागो यहां से. सारे प्रूफ लाओ...’ कहते हुए बी.एल.ओ. ने सभी कागजों को टेबल पर फेंक दिया.

‘ठीक है. भागते हैं. लेकिन एगो प्रश्न आपसे पूछना चाहते हैं, माई-बाप!’ काका सारे कागज समेटते पोपले जुबान से बोला.

‘बको...’

‘हम भारत के नागरिक हैं. यहां की पैदावार हैं. फिर भी हमारा इलेक्शन कार्ड बनवाने में एतना दिक्कत आ रहा है, मगर आतंकवादी का सारा काम एके मिनट में कैसे हो जाता है? उनका सारा प्रूफ एके मिनट में असली कैसे बन जाता है...’

संपर्कः श्री भगवान प्रसाद, कोयला दुकान, राजा बाजार, करेया रोड, बिहिया- 802152, जिला- भोजपुर,

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