गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : डॉ. भावना शुक्ल // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. भावना शुक्ल

जानी मानी लेखिका, मुख्यतः स्त्री विमर्श पर लेखन. अनेक पुस्तकें प्रकाशित.

संप्रति : प्राची की सह-संपादिका

संपर्कः डब्ल्यू जेड/21, हरी सिंह पार्क, मुल्तान नगर,

पश्चिम विहार (पूर्व), नई दिल्ली-11 00 56

डॉ. भावना शुक्ल

लगन

हम गर्मी की छुट्टियों में अपनी माँ के यहाँ गये. वहाँ उस वक्त घर पर पुताई चल रही थी. राजेश नाम का लड़का वहाँ पुताई कर रहा था. माँ ने उसे मेरा परिचय देते हुए कहा- ये दीदी हैं, मुंबई कॉलेज में पढ़ाती हैं. तो उसने मेरे पैर छुये और कहा- दीदी मुझे आपसे कुछ पूछना हैं. मैंने कहा- पूछो. -दीदी मैं इस साल बी.ए. फाइनल में हूँ. आगे क्या करूं. मैंने कहा- क्या करना चाहते हो. उसने कहा- पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है. तो हमने बी.एड. की सलाह दी. बोला- और एम.ए. मैंने कहा कर सकते हो. पहले बी.एड कर लो और हम यह कहकर भूल गये.

कुछ समय बाद मेरी माँ से बात हुई तो उन्होंने बताया कि राजेश बी.एड. भी पास हो गया. हमने कहा- अरे वाह, इसे कहते हैं लगन.

मैंने कहा- अब वह शिक्षक संविदा के फार्म निकलते हैं देखता रहे और भर दे. इस बार गर्मी में गये तो पता चला उसकी संविदा नियुक्ति हो गई है. उसने तुम्हें धन्यवाद कहा. दीदी ने रास्ता बताया. नहीं तो मैं देखा-देखी पढ़ रहा था.

नौकरी जारी है. आज माँ से बात हुई तो पता चला कि घर पर पुताई का काम चल रहा है, और राजेश ही घर पर अपनी छुट्टी के बाद हमारे घर की पुताई कर रहा है। तो मुझे आश्चर्य हुआ. कुछ पूछती उससे पहले माँ ने बताया कि मेरे बार-बार मना करने पर भी वो जिद्द करके पुताई करने आया है. बोलता है की आज वो जो कुछ भी है तुम्हारी वजह से है। एक सलाह से उसको एक नई मन्जिल मिली. इसलिए वो कहता है कि मुझसे इस घर की सेवा करने का मौका ना छीने.

फोन रखकर मैं यही सोचती रह गयी कि क्या सच में आज भी इतने साफ दिल के और लगन वाले इंसान होते हैं.

उलझन

‘मैं कई दिनों से बड़ी उलझन में हूँ. सोच रहा हूँ, क्या करूँ, क्या न करूँ। आज न चाहते हुए भी आपसे कहने का साहस कर रहा हूँ क्योंकि आप माँ जैसी है आप समझोगी और रास्ता भी बताओगी।’

‘क्या हुआ है तुझे, निःसंकोच बता, मैं हूँ तेरे साथ!’

‘आप तो जानती हैं कि हमारी शादी को 15 वर्ष हो चुके हैं. हमें संतान नहीं है और हमारी बीबी को कोई गंभीर बीमारी है. सन्डे के दिन ये सास बहू की जाने क्या खिचड़ी पकती है और मेरा घर में रहना दूभर हो जाता है।’

‘क्या करती हैं वे?’

‘क्या करूँ, बीबी कहती है तुम्हारी प्रोफाइल शादी.कॉम में डाल दी है. मैं चाहती हूँ, तुम लड़की सिलेक्ट कर लो और हमारे रहते शादी कर लो और माँ का भी यही कहना है।’

‘तो, तुमने क्या कहा?’

‘हमने कहा यह नहीं हो सकता तुम्हारे रहते ऐसा कैसे कर सकते हैं, तुम पागल तो नहीं हो गई हो?’

‘फिर?’

‘फिर क्या, वह कहती है, नहीं, मैं कुछ नहीं जानती मैं तलाक दे दूँगी. सामने वाले अपने दूसरे घर में रह जाऊंगी, पर मैं तुम्हें खुश देखना चाहती हूँ। तुम्हारे बच्चे को खिलाना चाहती हूँ।’

‘उसका कहना भी सही है।’

‘पर मासी, यह समझ नहीं रही मेरे मन की हालत, इसके रहते मैं कैसे यह कदम उठा सकता हूँ।’

‘मेरी मानो तो एक ही सामाधान है इसका!’

‘क्या?’

‘मातृछाया से एक नवजात शिशु गोद ले लो!’

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