लघुकथाएँ : नज्म सुभाष // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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नज्म सुभाष

जन्म : 1 जुलाई 1986

प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं मे रचनाएं प्रकाशित, 6 कहानियों का मराठी में भावानुवाद.

संपर्कः -एसकेडी प्लाजा, ई-ब्लॉक सब्जीमंडी, राजाजीपुरम्, लखनऊ-226017,

नज्म सुभाष

सौदा

दिन पर दिन रोजी रोटी का जुगाड़ मुश्किल होता जा रहा है। मार्केट जैसे कोई आता ही नहीं... ऐसे कैसे चलेगा गुजारा ?... कमाई कुछ भी नहीं और खर्चा... सुरसा की तरह हमेशा मुंह बाये रहता... करीब हफ्ते भर से बिटिया रोज कहती है- ‘पापा मेरा बस्ता फट गया है.’

‘ठीक है बाबू... ला दूंगा.’ -कहने को तो वह वह कह देता है पर लाए कैसे?

पूरे दिन की कमाई 100-150 रुपए पर सिमट गई है। पितृपक्ष में कोई काम नहीं करवाना चाहिए. पता नहीं किस कम्बखत ने ऐसी अफवाहें उड़ा रखी हैं... क्या पितृपक्ष में लोग खाना नहीं खाते?

आजकल तो हालात यह हैं कि रोज के खर्चे ही पूरे नहीं होते मगर वो बिटिया को भी कब तक टालता. बस्ता पूरी तरह से जर्जर हाल में है। 2 चेन भी खराब हो चुकी हैं।

आज तो बिटिया ने जिद ही पकड़ ली- ‘आप रोज -रोज कहते हैं ला दूंगा पर लाते नहीं. अब मैं स्कूल तभी जाऊंगी जब बस्ता लाएंगे... बच्चे चिढ़ाते हैं... फटा बैग... फटाबैग.’

5 साल की बेटी परिस्थितियां क्या समझे? उसके लिए तो सबसे बड़ी समस्या यही थी कि बच्चे उसे चिढ़ाते हैं।

उसकी बात अनसुनी कर के वो ठीहे पर चला आया। बाजार में वो पुराने कपड़ों की मरम्मत का काम करता है। किसी तरह धकर-पकर गाड़ी चल जाती है बस....।

आज तो उसे हर हाल में बस्ता ले ही जाना पड़ेगा। शाम हो आई पर काम-धाम... ऊंट के मुंह में जीरा।

सुबह आते समय एक बुक शॉप पर उसने बस्ते का रेट पूछा था तो डिस्काउंट के बाद 250 रुपये का था। उसने सोचा था... काश! आज 250 रुपये का ही काम हो जात... पर कहां? ग्राहकों की राह तकते- तकते पूरा दिन गुजर गया पर अब कौन आएगा... अब तो उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। उसने जेब से तुड़े मुड़े सारे नोट और सिक्के निकाले। वो गिनने लगा- टोटल 135... बस्ता आज भी नहीं आ पाएगा। फिर बिटिया पढ़ने कैसे जाएगी? सवाल तो अनुत्तरित ही रह गया।

उसने दीवार की टेक लगाकर आंखें बंद कर ली, जैसे आंख बंद कर के सारी समस्याएं खत्म हो जाती हों।

कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कोई आ रहा है. उसने आंखें खोलीं।

एक बुजुर्ग उसकी तरफ आ रहे थे। आंखों में चमक उतर आयी। बुजुर्ग पास आकर उसे काम समझाने लगे ।

‘ठीक है सर हो जाएगा... मगर कल मिलेगा.’

‘वह तो ठीक है... मगर खर्चा कितना आएगा.’

‘140रुपये...’

‘बहुत ज्यादा बता रहे हो.’

‘सर एकदम सही पैसे बताए हैं.’

‘पेंशनर आदमी हूं... कुछ तो रियायत करो...’

‘सर आप तो पेंशनर हैं... आपको कुछ तो मिल ही जाता है मगर हम तो पूरा दिन बर्बाद करके भी खाली हाथ हैं।’ कहते समय उसकी आंखों में नमी उतर आयी थी।

‘क्या पेंशन मिलती है...’

बुजुर्ग जैसे कहीं खो गये। फिर बुझे स्वर में बोले-

‘ठीक है... काम अच्छा करना.’

‘बिल्कुल सर ...शिकायत नहीं मिलेगी.’

बुजुर्ग जाने लगे.

‘1 मिनट सर.’ उसने आवाज दी।

बुजुर्ग रुक गये।

‘सर, क्या पैसे मुझे आज दे सकते हैं?’

‘पर क्यों...? कपड़े तो कल मिलेगें.’

‘हां, लेकिन यदि पैसे आज देंगे तो 140 के बजाए 115 ही ले लूंगा.’

बुजुर्ग कुछ देर सोचते रहे फिर 115 रुपये निकाल कर दे दिये।

उसने रुपये ले लिये। जैसे मांगी मुराद मिल गयी। उसने उन्हें चूमा फिर आंखों से लगा लिया। 25 रुपये बस्ते में डिस्काउंट की बात हुई थी. वह इधर चले गये... लेकिन उसे उम्मीद थी बिटिया कल से स्कूल जरूर जाएगी।

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