बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : मधुदीप // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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जन्म- 1-5-1950

जन्मस्थान- दुजाना (हरियाणा)

उपलब्धियां- कहानी संग्रह, लघुकथा संग्रह, लघुकथा तथा कहानी संग्रह, उपन्यास प्रकाशित

संपादन- पड़ाव और पड़ताल के 27 खंड प्रकाशित

सम्प्रति- निदेशक, दिशा प्रकाशन

सम्पर्क- 138/16, ओंकारनगर-बी, त्रिनगर, दिल्ली-110 035

मधुदीप

जाग्रति

शाम का धुँधलका रात के सन्नाटे में बदल चुका था. गाँव की हर गली, हर चौराहे पर अँधेरा पसरा पड़ा था.

गाँव की चौपाल में जल रहे पेट्रोमेक्स की थोड़ी-सी रोशनी सामने की पगडंडी पर भी पड़ रही थी.

इसे गाँव का बहुत बड़ा सौभाग्य ही कहिए कि इस इलाके के विधायक, जोकि राज्य के बिजली मंत्री भी हैं, आज रात चौपाल में तशरीफ ला रहे थे. तशरीफ लानी ही पड़ रही थी क्योंकि चुनाव-प्रचार पूरे जोरों पर था और काँटे की टक्कर होने के कारण एक-एक वोट से जीत-हार की सम्भावना ने भी उम्मीदवारों की धुकधुकी बढ़ा दी थी.

चौपाल में भीड़ जुड़ने के एक घंटे बाद झंडा और लाल बत्ती लगी मंत्रीजी की कार तीन अन्य कार-जीपों के काफिले के साथ वहाँ पहुँची. भीड़ के स्वागत के लिए नीचे आने से पहले ही पूरा दल-बल ऊपर आकर वहाँ बिछी खाली चारपाइयों में धँस गया.

गण्य-मान्य व्यक्तियों द्वारा हार-फूलों से लाद दिए जाने के बाद अब मंत्रीजी अपनी लच्छेदार बातें भीड़ के सामने परोस रहे थे कि तभी बूढ़े दीनू काका उठकर खड़े हो गए.

"का हो काका, कुछ कहना है का!" मंत्रीजी के मुख से शहद टपका.

"हाँ रे! तनिक देखियो तो रमुआ, मंत्रीजी अपनी कार में बिजली भर के लाये हैं का!" दीनू काका के कहने के साथ ही चौपाल में हँसी का एक ठहाका गूँज उठा.

"का कहत हो काका. बिजली का कार में भरके आत है?" ठहाके के उतार के साथ ही रमुआ ने कहा.

"आत है रमुआ! मंत्रीजी पिछली बार कहि के जात रहिन कि अगली बार आवत रहिन तो बिजली लेकर आवत रहिन. अब मंत्रीजी कार में आत रहिन तो बिजली का पैदल आत रहिन? ढूँढ़त रहो, बिजली उस कार मा ही होत रहिन."

दीनू काका के कहने के साथ ही भीड़ ने चौपाल से नीचे उतरकर मंत्रीजी की कार को चारों तरफ से घेर लिया.

मंत्रीजी अब अपने दल-बल सहित वहाँ से खिसकने की जुगत लगा रहे थे.

टीस

पूर्व दिशा में धीरे-धीरे दिन उग रहा था. अलसाई-सी सुबह पार्क की ओर जा रही थी. दीनदयाल नंगे पांव घास पर टहल रहे थे. जयप्रकाश प्राणायाम के बाद सूर्य-नमस्कार कर रहे थे. कुछ लोग असली-नकली ठहाके लगा रहे थे.

थोड़ी देर में दीनदयाल और जयप्रकाश दोनों बेंच पर आ बैठे. दोनों खामोश थे.

"लोग इतना हँस कैसे लेते हैं जयप्रकाश भाई?" दीनदयाल ने कहा तो जयप्रकाश उनकी उदासी को पढ़ने को कोशिश करने लगे. तभी एक गेंद उनके पाँवों के पास आकर ठहर गई. दो सुन्दर फूल उनके पास आकर ठिठक गए थे.

"मुझे अपने साथ खिलाओगे?" दीनदयाल गेंद को उठाकर एक हाथ से दूसरे हाथ में उछालने लगे तो दोनों फूल एक-दूसरे की ओर देखकर खिल उठे.

"यस अंकल!" दीनदयाल ने गेंद उछाली और फूलों के साथ उछलने-दौड़ने लगे.

जयप्रकाश वहीं बेंच पर बैठे मुस्कराते रहे. कुछ देर में ही हाँफते हुए वे फिर बेंच पर जयप्रकाश के पास आ बैठे.

"असली जिन्दगी तो इन बच्चों के साथ ही है भाई!" दीनदयाल के गहरे निःश्वास ने जयप्रकाश को चौंका दिया.

"अवनीश आज विदेश जा रहा है ना!" एक की दृष्टि दूसरे के चेहरे पर टिक गई.

"हाँ भाई! अवनीश और बहू के साथ पिंकू भी चला जायेगा."

इस बार गेंद उछलकर विपरीत दिशा में गई थी और अब दो फूल उसी दिशा में जा रहे थे.

पार्क के सामने की ऊँची बिल्डिंग उदास हो गई थी.

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