गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : राकेश भ्रमर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

clip_image002

राकेश भ्रमर

जन्म : 1 जनवरी, 1956, रायबरेली

प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं मे रचनाएं प्रकाशित. 23 पुस्तकें प्रकाशित. अंग्रेजी में भी लेखन.

संपर्कः -24, जगदीशपुरम्, लखनऊ मार्ग, निकट त्रिपुला चौराहा, रायबरेली-229001.

राकेश भ्रमर

बेरोजगार

वह बेरोजगार था. रोज काम की तलाश में निकलता और शाम को निराश घर लौट आता.

एक दिन तपती दोपहरी में वह एक चौक से गुजर रहा था. चौक के एक कोने में बहुत सारे कबूतर दाना चुग रहे थे. उसने गौर से इधर उधर देखा कि वहां दाने कौन डाल रहा था. कुछ दूर पर एक जवान लड़का बैठा था. वह पत्तल के दोनो में अनाज के दाने रख कर बेच रहा था. लोग आते, उससे दाने खरीदते और कबूतरों के आगे डाल कर आगे बढ़ जाते. वह आश्चर्यचकित रह गया.

आगे बढ़ते हुये उसके दिमाग में एक विचार कौंधा गया.

दूसरे दिन उसने पंसारी की दूकान से पांच किलो अनाज खरीदा. शहर के एक दूसरे भीड़ वाले चौराहे में गया. वहाँ कोई कबूतर उसे नजर नहीं आया. परंतु उसने बचपन में पढ़ा था कि कबूतरों की निगाह बहुत तेज होती है. उसने अनाज के कुछ दाने खाली जगह में बिखेर दिये और एक किनारे बैठकर पत्तल में अनाज के दानों की ढेरियां बनाकर इंतजार करने लगा. कहते हैं कि भगवान के घर देर है, पर अंधेर नहीं. कुछ पल में ही पता नहीं कहां से ढेर सारे कबूतर आ गये और वहां पड़े अनाज के दाने चुगने लगे.

लोगों के मन से अभी धर्म-कर्म समाप्त नहीं हुआ था. कबूतरों को वहां दाना चुगते देख लोग रुकने लगे और फिर उसके दाने भी बिकने लगे. अब वह बेरोजगार नहीं था.

भगवान की आरती

भीड़ भरे बाजार में एक जवान व्यक्ति गेरुआ वस्त्र पहने, एक थाली में बाती जलाकर जबरदस्ती लोगों के सामने अड़ाकर उसमें पैसे चढ़ाने की जैसे धमकी दे रहा था. उसके स्वर में कोई विनती नहीं थी. फिर भी लोग बाती को प्रणाम कर दस-दस रुपये थाली में डालकर आगे बढ़ जाते.

मैं उस व्यक्ति से बचकर निकलना चाहता था, क्योंकि मुझे इस तरह के पाखंड पर आस्था नहीं थी. परन्तु वह व्यक्ति मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आरती लो.’’

‘‘कौन-सी आरती?’’ मैंने अपने क्रोध को दबाते हुए कहा.

‘‘अरे, भगवान की आरती.’’ उसने थाली में जलती बाती की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसको प्रणाम करो और दक्षिणा दो.’’

‘‘इससे क्या होगा?’’

‘‘भगवान तुम्हारा भला करेगा.’’

‘‘तुम्हारा भला हुआ?’’ मैंने चिढ़ते हुए कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ उसने अकड़कर पूछा.

‘‘देख लो, पता नहीं कितने वर्षों से तुम भगवान की आरती लेकर गली-गली भटक रहे हो. लोगों को मूर्ख बना कर भीख मांग रहे हो. क्या तुम्हारा भला हुआ? भला होता, तो इस तरह गलियों में मारे-मारे न फिरते. जवान हो, कभी मेहनत से काम करके देखो. मेहनत के पैसे का सुख कैसा होता है, तब पता चलेगा. चलो हटो, मुझे न भगवान की आरती चाहिए, न उनकी मुफ्त की भलाई.’’ और मैं आगे बढ़ गया.

पहचान का संकट

एक दिन वह मेरे पास आया. उसके होंठों पर भेदभरी मुस्कान थी. उसने मुझसे कहा- "वह मेरे बारे में बहुत कुछ जानता है.’’

मैंने पूछा- "कितना?’’

आँखों को चमकाते हुये उसने कहा- "जितना आप स्वयं को नहीं जानते.’’

"अच्छा!’’ मैंने भी आंखें फैलाकर कहा.

और वह मेरे बारे में बहुत कुछ बताता रहा. मैं चुपचाप सुनता रहा.

उसकी बातें सुनकर मैं हैरान होता रहा. फिर वह चला गया. मैं बैठा सोचता रहा कि सचमुच मैं अपने बारे में कितना कम जानता था. उतना भी नहीं, जितना लोग मेरे बारे में जानते थे.

क्या यह हमारा दुर्भाग्य नहीं कि हम दूसरों के बारे में ज्यादा जानते हैं और स्वयं के बारे में बहुत कम.

अगर हम स्वयं को पहचान जाएँ तो जीवन कितना सरल और सुखमय हो जाय.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.