गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : गुरुनाम सिंह रीहल // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

गुरुनाम सिंह रीहल

गले से पांव तक

राजनीति की चर्चा पर वह नाक मुंह सिकोड़कर बोले- ‘राजनीति की बातें छोड़ और कोई बात करिये.’

‘क्यों, आज राजनीति रास नहीं आ रही है. भूल गये वे दिन जब उन हितैषी पार्टी और उनके नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के साथ रात दिन जुड़े रहते थे.’

‘वह और दौर की श्रेष्ठ राजनीति थी. सर्वविदित है कि आजादी के दो दशक तक उसमें अच्छे नेतृत्व का बोलबाला था. साथ ही उन दिनों नैतिकता बरकरार थी. अब राजनीति भ्रष्टाचार से लिप्त है.’

‘चलिये, धर्म की ओर बढ़ते हैं. उसकी गहराइयों में डूबते हैं. चिंतन मनन में रस लेते हैं.’

‘लेकिन उसमें भी ठीक नहीं हो रहा है. इनसे जुड़े तथाकथित ज्ञानी, ध्यानी, दानी तन से तो उजले हैं, पर वे मन से मैले हैं.’

‘फिर धर्म की छोड़, शिक्षा के गलियारे की तरफ कदम बढ़ाते हैं.’

‘परंतु वहां भी कुछ अच्छा नहीं हो रहा है. आज शिक्षा जगत में जो गलत कार्य हो रहे हैं उनसे आखें शर्म से झुक जाती हैं. चंद सिक्कों के सहारे यहां ऊंची से ऊंची डिग्रियां बेचने में लोग पलक नहीं झपकाते और न ही उनकी नजरें शर्मसार होती हैं. गले से पांव तक सबकुछ डूबा हुआ है जी!’

उसके बाद एक पूरा मौन वहां पसर चुका था.

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