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लघुकथाएँ : डॉ. सुषमा गुप्ता // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

डॉ. सुषमा गुप्ता

फ्रॉक

‘माँ ,कल से मैं बाहर नल पर पानी भरने नही जाऊंगी.’ तेरह साल की लाली रोते हुए बोली ।

‘क्यों री, क्या हुआ?’

‘माँ ,वो ढाबे वाले बिशन चाचा है न, रोज रास्ता रोक लेते हैं। कहते है अंदर ढाबे में चल बढ़िया-बढ़िया खाना खिलाऊंगा। अजीब ढंग से हाथ लगाते हैं, मुझे बहुत गंदा सा लगता है।’

‘करमजला, हरामखोर, उसकी इतनी हिम्मत। याद नहीं उसे तू हरि सिंह ट्रक डाइवर की बेटी है। अब के फेरा पूरा करके आएगा जब अमृतसर से, सारी करतूत बताऊंगी जन्मजले की। तेरे बाप ने चीर के रख देना है।’

‘पर माँ बिशन चाचा से तो सब डरते है। उनके बड़े भाई तो वो सफेद जीप वाले नेता के काम करते है न। और उनके भाई के पास हमेशा बंदूक भी तो रहती है वो बड़ी सी।’

बिल्लो का चेहरा फक्क पड़ गया। आँख के आगे सुखिया की लाश घूम गई, जिसकी घरवाली का हाथ पकड़ लिया था बिशन ने और खूब लठ्ठ बजे थे दोनों में। फिर एक दिन अचानक सुखिया गायब हो गया। पाँच दिन बाद नदी में मछलियों खाई लाश मिली उसकी। सबको पता है क्या हुआ और किसने किया पर मजाल किसी की हिम्मत हो जाए बोलने की।

‘सुन लाली। कल से तू पानी लेने नही जाएगी और स्कूल छोड़ने लेने भी मैं आऊंगी। अब से ये फॉक्र पहनना बिल्कुल बंद। कल से सूट पाईं और दुपट्टा ले के सिर ढंक के जाईं।’

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