लघुकथाएँ : सुरेन्द्र जांगिड़ उदय // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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जन्म- 2 जून 1965, कैथल

उपलब्धियां- लघुकथाएँ-कविताएँ, टाइम मैनेजमेंट, प्रेरक प्रसंग, प्रेरक कहानियां, प्रेरक कथाएँ के अनेक संस्करण प्रकाशित.

संपादित पत्रिकाओं की वृहद सूची

विशेष- भारत में ‘अ. भा. लघुकथा पोस्टर प्रदर्शनी’ के प्रथम जनककर्ता. प्रकाशक सुकीर्ति प्रकाशन.

सुरेन्द्र जांगिड़ उदय

अपने अपने लिए

"सुनिए, आज मैं डॉक्टर के पास गई थी" पत्नी ने बड़े निराशाजनक और टूटे स्वर में जब उसे कहा तो वह खुशी से भीतर ही भीतर चहक उठा. लेकिन हजारों रुपये का दहेज लाने वाली अपनी मॉडर्न पत्नी की टूटी आवाज ने उसे बोलने न दिया.

"अभी छः महीने भी नहीं हुए शादी को और अभी से ये सब झंझट. ‘एबोर्सन’ करवा लेती हूँ." पत्नी के एबोर्सन शब्द की सहजता ने उसे बुरी तरह से चौंका दिया. वह आंखें फाड़-फाड़ कर पत्नी को यूं देखने लगा, गोया पत्नी न होकर वह कोई अजीबो-गरीब प्राणी हो जो अचानक उसके सामने आकर बैठ गया हो.

"क्यों"? तुम्हें अच्छा नहीं लगा क्या? एबोर्सन तो मैं करवाऊंगी, तुम्हें क्यों दर्द हो रहा है. कम से कम तीन-बार साल तक तो खुलकर जी लें. अभी से बच्चा होने का मतलब सोसायटी में बेइज्जती." पत्नी उठी और मुस्कराते हुए उसने उसके गले में बांहे डालते हुए कहा- "क्यों डियर ठीक है ना"

वह अपना भविष्य खंडित होने की सोच में था. पत्नी सोसायटी में इज्जत बचाने की सोच में खोई थी. और तीन महीने का भ्रूण अपने बिखर जाने के डर से कोख के भीतर सहमा हुआ था.

युगचरित्र

उसकी उंगलियां दुखने लगी थी, लेकिन वह गाय के थनों से दूध नहीं निकाल पाया. वह खीज उठा, ‘मालिक! मालिक!! वो डब्बी गाय दूध नहीं दे रही है?’ बबुआ बाहर से ही चिल्लाकर बोला.

-अरे लठ्ठ मार सोरी नूं चार-पांच. उसका तो बाप भी दूध देगा.’ मालिक अंदर से ही चिल्लाया.

बबुआ की खीज, उंगलियों की पीड़ा और गाय का मस्त पगुराना उसके गुस्से को बढ़ा चुके थे. उसने सचमुच लाठी से उसकी धुनाई शुरू कर दी. लाठी एक ओर टेककर उसने गाय के थन को हाथ लगाया तो सचमुच बाल्टी में दूध की धार पड़ने लगी थी.

दूसरों के लिए

छः महीने दिन रात के अनथक परिश्रम के परिणामस्वरूप जब रामसिंह के घर तीस मन गेहूं हुआ तो किसी अबोध बालक को उसका मन पसंद खिलौना पाने से जो खुशी होती है वैसी ही खुशी से चहक उठा था. लेकिन अगले पल ही वह बेहद उदास और सदा की भांति मुरझा भी गया था.

तीस मन गेहूं में से तीन मन मशीन से गेहूं निकालने वाले को, पांच मन बढ़ई, लोहार, नाई, चूड़े और चमकार को, दस मन गेहूं गांव की पंचायत द्वारा मंदिर के निर्माण हेतु थोपी गई, और दस मन गेहूं बिजली के बिल, लाइनमैन का कमीशन, बनिये की उधार देने में लगेगी. राम सिंह मन ही मन में हिसाब लगा रहा था.

वह मन में यह सोचकर और भी उदास हो गया कि दो मन बची गेहूं से छः महीने घर का खर्च कैसे चलेगा? अगली फसल के लिए बीज भी बिना कर्जे के नहीं ले सकेगा. तो क्या वह कोल्हू का बैल है? जाने क्यूं आज उसे अपने भीतर कुछ उबलता हुआ महसूस हो रहा था.

सुरक्षा

‘तुम नहीं जानते गाड़ी में गैस का सिलेण्डर ले जाना सख्त मना है?’ अचानक दो सिपाही डिब्बे में आ गये थे और मेरी भरसक चतुराई के पश्चात भी उन्होंने गैस के सिलेण्डर को देख लिया था.

-‘पता नहीं कब फट-फटा गया तो जानते हो कितनी औरतें विधवा होंगी? तीन हजार रुपये जुर्माना भी है.’ सिपाही ने रूखे अंदाज से कहा तो मैं घबरा गया था. मैं डरता-डरता बोला- ‘भाई साहब, जरा जल्दी थी तो करके गाड़ी में आना पड़ा.’

‘मुझे कुछ नहीं पता. हमारी तो ड्यूटी है कि गलत कामों को रोका जाये ताकि जनता सुरक्षित रहे. तुम्हें अगले स्टेशन पर उतार दूंगा. ताकि हमारी ड्यूटी पूरी हो. वे तुम्हें पुलिस के हवाले कर देंगे.’ सिपाही कड़कदार आवाज में पूरे रोब से बोला.

मैंने बीस का नोट निकाला और उसका हाथ अपने हाथ में पकड़कर बोला- ‘भाई साहब गलती हो गई.’

वे आगे बढ़ गये थे. अब जनता पूरी तरह सुरक्षित थी.

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