बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : आभा सिंह // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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आभा सिंह

जन्म- 6 नवम्बर 1944

प्रकाशित पुस्तकें- कहानी संग्रह-तीन, कविता संग्रह-एक, लघुकथा संग्रह-एक

सम्पर्क : 80/173, मध्यम मार्ग, मानसरोवर

जयपुर- 302020, राजस्थान,

आभा सिंह

हमला

रात का समय था. बस पूरी स्पीड से जा रही थी. यात्री नींद में थे. अचानक पीछे से गोलियाँ छूटने की आवाज आई. यात्री हड़बड़ा कर स्थिति समझने का प्रयास करने लगे. उन्हें पीछे जीप में सवार आठ-नौ आदमी दिखाई दिये. उन सब ने मुँह पर कपड़ा बाँध रखा था. सभी जान गये कि वे डाकू थे. ड्राईवर बस भगाये लिये जा रहा था पर जीप ने ओवरटैक करके रुकवा ली. धीमे होते ही वे सब बस में चढ़ गए और मारपीट व लूटपाट शुरू कर दी. चीख-चिल्लाहटों के बीच नकदी, जेवर, घड़ियाँ बेहरमी से लूटी जा रही थीं. लूटपाट करके वे सब ये जा...वो जा...

बस पास के थाने ले जाई गई. ड्राईवर ने कमीज उतारकर सिर के घाव पर बाँध ली थी. यात्रियों ने डाकुओं के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करानी चाही पर थाने में कोई सुनवाई न हुई. बहुत मिन्नतों के बाद थानेदार ने रिपोर्ट लिखी. थाने के रवैये से लग नहीं रहा था कि कोई कारवाही होगी. वे सभी खौफजदा थे और थाने की लापरवाही से क्षुब्ध भी.

अचानक कुछ शोर मचा. डाकुओं के दल ने थाने पर हमला बोल दिया. सिपाहियों की पिटाई होने लगी. थानेदार का सिर फूट गया. डाकू मारपीट के साथ-साथ भद्दी गाली-गलौच कर रहे थे, साथ ही एफ.आई.आर दर्ज करने के खिलाफ ताने-तिश्ने कस रहे थे. जान से मारने की धमकियां दे रहे थे.

पन्द्रह-बीस मिनट के ताँडव के बाद डाकू दल उड़नछू हो गया. अब तक सवारियाँ सकते में थीं अब पूरा थाना सकते में हो गया.

यादें

गुमान रोज देखता कि सामने के घर में रहने वाली उसके स्कूल के दिनों की टीचर आजकल बहुत व्यस्त हो गई थीं. अपनी बाल्कनी में बैठी वे कुछ-कुछ बुनती रहतीं. इस उम्र में इतनी कठिन मेहनत... उसे बहुत आश्चर्य होता था.

वे उसकी फेवरेट टीचर रही थीं, यहाँ भी उनसे कभी-कभी बातचीत हो जाती थी. एक दिन वे सोसाइटी के पार्क में दिखाई दे गईं.

-मैम, गुड इवनिंग...

-गुड इवनिंग बेटे

-मैम, कुछ बात करना चाहता था.

-हाँ, हाँ, कहा, क्या कहना चाहते हो.

-आप मेहनत करके दिन-रात क्या बुना करती हैं. आपके बच्चे तो विदेश में हैं और उनके बच्चों के लिये तो वहाँ का मार्केट भरा पड़ा है. वे घर का बुना तो क्या पहनते होंगे.

शिक्षिका हँस दीं.

-मेरे पस ढेरों ऊन है तो मोजे, दस्ताने और टोपी बुनती रहती हूँ, जिसे चाहिए उसे दे देती हूँ. लोगों को जाड़े में मनपसंद चीज मिल जाती है. ऊन का सही इस्तेमाल हो जाता है और मेरा समय भी तो कट जाता है...बस.

कितनी मीठी हँसी थी उनकी. सचमुच आदमी हर उम्र में सुंदर लगता है, उस शिष्य ने सोचा.

-नानी, मेरे मोजे बन गये क्या, परपल और ब्लैक कलर के.

-बन रहे हैं बेटे, तुम्हें कब चाहिये.

-मैं तो कल स्कूल जाऊँगा न...सवेरे...एट थर्टी पर.

वे फिर मुस्करा दीं, बच्चा उछलता-कूदता खेलने चला गया.

-मैम, अगर आप मेरे लिये भी दस्ताने बुन दें, मुझे दस्ताने चाहिए. रंग जो भी आपको पसंद हो.

-क्या तुम दस्ताने पहनते हो.

-अब पहनूँगा. मुझे हर वक्त महसूस होगा कि आपने मुझे थाम रखा है...जैसे एक बार स्कूल में गिर जाने पर थामा था...पिछले साल जाड़ों में मम्मी चली गईं...उनकी याद से अब भी हाथ ठंडे हो जाते हैं.

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