बुधवार, 27 दिसंबर 2017

लघुकथाएँ : वंदना सहाय // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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वंदना सहाय

उपलब्धियां- सभी विधाओं में नियमित प्रकाशन, हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी लेखन/प्रकाशन, प्रतिनिधि लघुकथाएँ/वार्षिकी में सह संपादक एवं प्रतिनिधि लघुकथा मंच से सृजन शिल्पी-अलंकरा सम्मान.

विविध विधाओं में लेखन/प्रकाशन.

वन्दना सहाय

तीन बेटों का बाप

पिछले पाँच सालों से सुरभि की कार धोने का काम करने वाले राम प्रसाद ने पहली बार ऐसा किया कि जब वह बिना बताये आठ दिनों तक काम पर नहीं आया. सुरभि को यह कुछ अजीब-सा लगा और उसका मन आशंका से भर सोचने लगा कि पता नहीं इस महानगरी में उसकी कोई खोज-खबर लेने वाला है भी या नहीं.

अभी वह अन्तर्द्वन्द से जूझ ही रही थी कि कॉल बेल बजी और पैरों ने अनायास ही उठकर दरवाजा खोल दिया. सामने रामप्रसाद किसी अपराधी की तरह नजरें झुकाये खड़ा था. बिना हजामत की गयी सफेद दाढ़ी ने उसे सहसा कई वर्ष बूढ़ा बना दिया था. धूमिल चेहरे से धूसर आँखें झाँक रही थीं. उसने कहना शुरू किया- "माफ करना मैडम जी. समय इतना कठिन था कि आपको बिना बताये घर बैठ जाना पड़ा."

"क्या हुआ?" सुरभि ने पूछा.

"अरे! मैडम जी, क्या बताऊँ. घरवाली अचानक बीमार हो गयी थी. मलेरिया सर तक चढ़ गया था. सरकारी डॉक्टरों ने प्राइवेट अस्पताल ले जाने को कहा. तीन लाख के करीब लगे, पर ऊपर वाले की दया से वह बच गयी.

सुरभि के पसीजे मन ने जीभ पर सवार हो पूछा- "इतने सारे रुपयों का इंतजाम तुमने किया कहाँ से?"

"बाप रे! इतने पैसे मेरे पास कहाँ थे? मुझे तो इस संकट की घड़ी में ही पता चला कि मैं तीन बेटों का बाप हूँ. पता नहीं मेरे बेटों ने इतने पैसों का इंतजाम कैसे किया होगा. पता चला कि मेरे बड़े वाले ने अपने फलों के जूस का ठेला और मँझले वाले ने अपनी स्कूटी गिरवी रख दी. छोटे वाले ने डबल शिफ्ट में काम करना शुरू कर दिया. सबका अपना परिवार है, पता नहीं..." आँखों को छलकने से रोकने के प्रयत्न के कारण उसके होठों की बात अधूरी रह गयी.

उसका एक-एक शब्द सुरभि की अंतरात्मा को झकझोरता चला जा रहा था. उसे याद आया, जब चार साल पहले उसकी सास गंभीर रूप से बीमार हो गयीं थीं, तो उसके पति एवं उसके अन्य दो भाई उच्चस्तरीय नौकरियाँ एवं भरा-पूरा बैंक बैलेंस रहने के बावजूद, अपनी माँ के इलाज का दायित्व एक-दूसरे पर फेंकने की कोशिश कर रहे थे, और अंत में ससुर को गाँव का मकान गिरवी रखना पड़ा था.

दर्द

आज फिर तीन बजते ही अहाना के मोबाइल कॉल ने अंकिता केा बेचैन कर दिया- "मम्मा, आप ऑफिस से घर कब आ रहे हो? मेरा पेट दर्द कर रहा है. नैनी बात नहीं सुन रही. मुझे अभी दूध नहीं पीना. वह मुझे बार-बार दूध पीने के लिए कह रही हैं. वह मुझसे बात भी नहीं करतीं, बस बैठ कर टी.वी. देख रही हैं. आप उसे मेरी बात मानने के लिए कहो..."

यह आवाज अंकिता की छः वर्षीय बेटी की थी, जो स्कूल से आने के बाद नैनी के साथ अकेली घर पर थी. अंकिता के पास कोई विकल्प नहीं होता, वह ऑफिस की जिम्मेवारियों से मुँह नहीं मोड़ सकती थी. उसके पति सौरभ के पास तो ढंग से खाने और सोने की भी फुर्सत नहीं होती. दिन-भर तो नैनी के भरोसे उसे अहाना को छोड़ना ही होता. अहाना के पेट के दर्द के लिए उसे बड़े-बड़े डॉक्टरों से दिखाया, कुछ भी न निकला. पर, अहाना के पेट का दर्द जाता ही नहीं था. रोज मोबाइल पर अहाना की आवाज उसके मन को तड़पा, उसे बेबस करती. कभी जी में आता कि छोड़कर अपनी नौकरी, वह सिर्फ अहाना की देख-रेख करे. किंतु यह संभव न था. बैंक ढेर-सारे लोन, जो पति के साथ मिलकर चुकाने थे. गाड़ी, बंगला, बैंक-बैलेंस, सबकुछ तो उन्हें अहाना के लिए करना था.

आज अंकिता की बुआ उससे मिलने आईं थीं. अहाना उनसे मिल बहुत खुश हुई.

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सम्पर्क : 613, सुंदरम- 2सी, रहेजा कॉम्प्लेक्स,

टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के निकट

मलाड (ईस्ट), मुंबई-40097 (महाराष्ट्र)

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