लघुकथा : पूर्णिमा मित्रा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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पूर्णिमा मित्रा

मौका

कामिनी ब्यूटी पार्लर का उद्घाटन-समारोह बस शुरू होने वाला था. अचानक मोबाइल कैमरे से फोटो खींचते हुए गिरधारी की दृष्टि, शिवशंकरजी पर पड़ी. वह तुरंत उनके पास जाकर हैरानी से बोला, ‘अरे, नेताजी, आप इस वक्त यहां... आपको तो इस वक्त अपने खास चेले जयदीप की माताजी के फ्यूनरल में शामिल होना था. बेचारा...’

कद्दावर नेता शिवशंकर ने अपनी डिजाइनर खादी जैकेट पर एक गर्वीली दृष्टि डाली. एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए बोले, ‘यार गिरधारी, डॉन्ट बी इमोशनल, बी प्रैक्टीकल. फ्यूनरल के बाद, इस कड़ाके की ठण्ड में नहाना अपने बस की बात नहीं है प्यारे.’

जुझारू सिद्धान्तवादी पत्रकार गिरधारी को यह सुनकर एक झटका-सा लगा. वह अपनी वितृष्णा को व्यंग्य की तीखी चटनी के साथ पेश करता हुआ बोला, ‘पिछले चुनाव में इसी सेठ पोंगामल ने आपके विपक्षी दल का जमकर प्रचार किया था, तब इस जयदीप ने ही आपकी डूबती नैया पार लगाई थी.’

‘यार, फिर वही बात. मेरे वहां जाने से डोकरी जिंदा थोड़े ही हो जाएंगी. लेकिन मेरे यहां रहने से सेठ पोंगामल की पुत्रवधू कामिनी, जरूर हमारी पार्टी में शामिल हो गई. जानते हो देवीजी ने हमारी पार्टी को कितना चन्दा दिया है?’

‘मतलब!’ गिरधारी ने अचकचाते हुए पूछा.

‘यही कि राजनीति में कोई किसी का परमानेंट शत्रु या मित्र नहीं होता. यहां तो मौका देखकर चौका मारना पड़ता है.’

संपर्कः ए-59, करणी नगर, नागणेची जी रोड,

बीकानेर-334003 (राजस्थान)

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