लघुकथाएँ : रामयतन यादव // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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रामयतन यादव

संपर्कः मकसूदपुर, पो. फतुहा (पटना)

पिन-803201(बिहार)


रामयतन यादव

प्रतिकार

दिवाकर बाबू को रिटायर हुए अभी एक डेढ़ माह भी नहीं बीता था फिर भी आज अपने ही दफ्तर में अपने ही सहकर्मियों के बीच वे बिल्कुल अजनबी जैसा महसूस कर रहे थे.

कारण यह था कि कल तक जो उनके सामने हाथ बांधे खड़ा रहता था, मजे से कुर्सी पर बैठकर उनकी अरजी में तरह-तरह की खामियां ढूँढ़कर उन्हें परेशान करने पर तुला था. माह भर से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद भी भविष्य निधि की राशि मिलने की संभावना नहीं थी. वे हताश-निराश होकर उस नौजवान हेड क्लर्क के पास पहुंच गये, जिसका योगदान कभी उस कार्यालय में उन्हीं के अधीनस्थ क्लर्क के तौर पर हुआ था.

अभिवादन की औपचारिकता के बाद हेड क्लर्क राजन ने सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘कहिए दिवाकर बाबू कैसे आना हुआ?’

‘भाई राजन,’ दिवाकर बाबू ने शिकायती लहजे में कहा, ‘तुम्हें तो सब मालूम है कि मैं भविष्य निधि की राशि और पेंशन निर्धारण हेतु कितने दिनों से दौड़ रहा हूं.’

कुछ पल रुककर उन्होंने पुनः कहा, ‘पता चला है कि मेरी अरजी तुम्हारे पास ही पड़ी है... तुम उसे आगे नहीं बढ़ा रहे...’

‘आपकी अरजी जरूर बढ़ेगी दिवाकर बाबू, लेकिन आप पांच हजार देंगे, तब....’ अपमान का घूंट पीकर दिवाकर बोले- ‘तुम्हें इतना भी लिहाज नहीं कि इस दफ्तर में तुम्हारा योगदान मैंने ही कराया था...’

‘योगदान कराने के बदले में आपने ढाई हजार लिया भी तो था.’ दिवाकर की बात को बीच में काटते हुए राजन ने कहा, ‘उस समय आपको लिहाज नहीं करना चाहिए था क्या...?’

दिवाकर बाबू ने आंखें नीची कर उसकी तरफ देखा तो उसने अपनी बात पूरी करने के लहजे में कहा -‘दिवाकर बाबू बात यह है कि वही ढाई हजार फल-फूलकर पांच हजार हो गया है न...’ दिवाकर भीतर उमड़ते आक्रोश को खामोशी की चादर में लपेटकर जैसे ही जाने के लिए उठकर खड़े हुए कि राजन ने पुनः टोका- ‘बबूल रोपकर उसमें आम फलने की आकांक्षा क्यों रखते हैं?

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